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घोटाले से भरी शराब की दुनिया

  • अफसरों की साजिश से सरकार  को करोड़ों का घाटा
  • मामला खुल जाने से दुकानों का आबंटन किया रद्द
  • महीने भर के लिए  कमाई की  छूट  देने पर अंगुली
  • सरकार ने मान लिया फर्जी बैंक  गारंटी घोटाला हुआ था

चेतंग गुरुंग

देहरादून। उत्तराखंड में शराब की दुनिया कितनी रहस्यभरी है, इसका अंदाजा अब तक सरकार को खुद भी नहीं था। मंझले स्तर के अफसर निचले स्तर के अफसरों से मिल कर करोड़ों का फर्जी बैंक घोटाला करते रहे। किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी। कायदे कानून की धज्जियां उड़ती रही। अब तो सरकार ने भी इस कड़वी सच्चाई को मान लिया है। हर साल की तरह इस बार भी दुकानों को मनमाने तरीके से कौडिय़ों के भाव अपने चेलों को सौंपने की साजिश पूरी कर ली गई थी। सोशल मीडिया में जब यह मामला उछला तो सरकार को मजबूर होना पड़ा कदम उठाने के लिए। यह बात अलग है कि घोटाला और भ्रष्टाचार का खुलासा होने के बावजूद किसी अफसर के खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। इतना जरूर हुआ कि सरकार ने कई ऐसी दुकानों का आवंटन रद्द कर डाला, जो बहुत सस्ती दर पर दी जा रही थी। अब सवाल यह उठाया जा रहा है कि आखिर सालों से सरकारी खजाने को एक किस्म से लूट रहे अफसरों को सरकार दण्डित करने से क्यों बच रही है। इस सबके बावजूद माफिया-अफसर गठजोड़ इस लिहाज से सफल हो गया कि वह दुकानों को और एक महीने के लिए अपने पास बिना किसी दिक्कत के लेने को कामयाब हो गया। सरकार देखती रह गई।

हकीकत यह है कि सारा खेल महकमे के मंझले अफसर खेल डालते हैं। एक देहरादून में है मुख्यालय में, वही शराब की दुनिया का असली खिलाड़ी है। मास्टरमाइंड कहते हैं उसको। किसको जम कर फायदा दिलाना है। कौन स्याना चवन्नी नहीं पूछ रहा या फिर इकन्नी-दुवन्नी में ही हांफ कर हाथ जोड़ दे रहा है। ऐसों को कैसे चलता करना है, वह जानता है। क्या करना ऐसों का। जब गड्डी-हड्डी की तरह पड़ रही है। कहीं और से खूब उनको फायदा दिया जाता है। यह तथ्य है। कड़वी और घातक सच्चाई है ये। माफिया-अफसरों-राजनेताओं (मंत्रियों) के कथित गठबंधन का। फर्जी बैंक गारंटी का खेल खुल चुका है। जाने कब से चला आ रहा था। कितने ही सालों से। शराब की दुकान के मालिक सरकार को चूना लगा रहे थे। शराब महकमे के अफसरों संग गलबहियां कर। फर्जी तो फिर भी ठीक है। मतलब कुछ तो डर है। सिस्टम का सम्मान है। कइयों ने तो फर्जी भी जमा नहीं कराई न कैश ही जमा किया अधिभार का।
फर्जी बैंक गारंटी के अस्तित्व से भी इनकार किया सरकार ने पहले। अपर मुख्य सचिव डॉ.रणवीर सिंह से पहली बार पूछा तो उन्होंने इस बारे में अनभिज्ञता जताई। फिर आयुक्त (आबकारी) षणमुगम ने पूछे जाने पर उनको बताया कि यह सच नहीं है। हां, बैंक गारंटी जमा ही नहीं हुई है। आबकारी मंत्री प्रकाश पन्त ने भी इस तरह के घोटाले से इनकार किया, शुरू में। बाद में जब वीक एंड टाइम्स लिखता रहा, तब जांच बिठाई गई। जांच में साफ हो गया कि फर्जी बैंक गारंटी जमा कराई गई थी। रिपोर्ट सरकार के पास आ गई है। देखे उसमें क्या निकलता है। इस घोटाले के पीछे आबकारी मुख्यालय और जिला आबकारी अधिकारी कार्यालयों की अहम भूमिका थी। उनके राजीनामे के बिना यह मुमकिन नहीं था।
इस मंझले अधिकारी पर बीजेपी के एक बड़े नेता का हाथ होने की हवा है। इसके चलते वह जमकर मनमानियां कर रहा है। मंत्री के लिए भी उसको काबू में रखना मुश्किल साबित होता है। कभी कभी। इतना सब होने के बावजूद मंझला अधिकारी दुकानों का विस्तार एक महीने के लिए कराने में सफल हो गया। इसके बाद दुकानों को जिस तरफ पुराने मालिकों को ही सौंप दिया गया वह भी सरकार पर ऊंगली उठाने के लिए काफी है। जब दुकानें लेने वाले सैकड़ों तैयार हैं। कहीं अधिक कीमत पर। फिर क्यों उनको दुकान दे दी गईं। गजब तब हुआ जब सरेंडर की गई दुकानें औने-पौने भाव में दे दी गईं। पौन दो करोड़ की दुकान 30 लाख रूपये में। दुकानें तय कीमत से 14 फीसदी पर ही दे दी गईं। मंत्री पन्त को जब पता चला तब उन्होंने उस पर तुरंत रोक लगा दी। सरकार ने जिस तरह पहले बीच सीजन में देसी शराब की कीमत में इजाफा किया था, उस पर भी ऊंगली उठी थी। अब मॉल और डिपार्टमेंटल स्टोर की परदेसी शराब की दुकानों से जुड़ी पॉलिसी भी शक के दायरे में है। देहरादून के एक कारोबारी के पास मॉल में चार दुकानें हैं। यह आरोप लगाया जा रहा है कि सिर्फ उसको फायदा पहुंचाने के लिए पॉलिसी बनाई गई। स्टोर के लिए शराब के अलावा पांच करोड़ की बिक्री को जरूरी किया गया है। इससे देहरादून के एक स्टोर को छोड़ पूरे उत्तराखंड के स्टोर बंद हो जाएंगे। मॉल के दुकानों के साथ कोई शर्त नहीं रखी गई है। आबकारी मंत्री और अपर मुख्य सचिव डॉ.सिंह ने माना कि इसमें कुछ संशोधन की जरुरत देख रही सरकार। हल्ला यह है कि मॉल के शराब दुकान मालिक के साथ एक संयुक्त आबकारी आयुक्त की पार्टनरशिप है।
सरकार की नई नीति को शराब सिंडीकेट के हक में बताया जा रहा है। दुकानों का समूह बना के ई-टेंडरिंग की नीति सिर्फ सिंडीकेट को फायदा पहुंचाएगी। वही इतना पैसा एक साथ सरकार को दे सकती है। इन सभी कारणों से त्रिवेंद्र सरकार की जीरो टॉलरेन्स की नीति पर शक पैदा करा रही। इस बार की जो पॉलिसी बनी है, उसका हर पैरा कमाल का लगता है। किसी न किसी को फायदा पहुंचाने वाला। आरोप है कि सरकार ने डिजाइनर पॉलिसी बनाई है। आबकारी मंत्री पन्त, जिनकी प्रतिष्ठा-छवि पर कोई धब्बा नहीं, मंझले अफसर जैसे उनको अंधेरे में रखने में सफल हो रहे। उनके सामजिक-सियासी भविष्य से खिलवाड़ कर रहे। पहले ही पन्त कईयों की आंख में कांटा बने हुए हैं। पार्टी में ही बड़े और अहम महकमे उनके पास जो हैं। मलाईदार-वित्त-टैक्स जैसे कंट्रोलिंग मंत्रालय। आबकारी में आए दिन इतने बड़े-बड़े खेल हो रहे हैं। कभी उन पर ही आंच न आ जाए।
महकमे के अफसरों का दुस्साहस ऐसा कि देहरादून में सरेंडर की हुई दुकानों में टेंडर डालने न देने की शिकायत कइयों ने की।।इसके कारण ही दुकानों को 12 फीसदी तक में आवंटित करने की साजिश हुई। वह तो सरकार को पता चल गया वक्त पर। उसने रोक लगा दी। इतना ही नहीं अंदरूनी कहानी यह है कि कई बड़ी दुकानें उन लोगों को फिर नए नाम से दे दी गईं, जो पहले मालिक थे। सरकार को उसकी एक्साइज ड्यूटी न देने के कारण वे अपात्र हो गए हैं। अफसरों की मिलीभगत से वे फिर मालिक बन गए। साजिश को सरकार नहीं रोक पाई.सफल होने से। सरकार पर यह भी शक जताया जा रहा कि वह परदे के पीछे से बैंक गारंटी घोटालेबाजों का साथ दे रही। ऐसा न होता तो उनके खिलाफ आरसी जारी कभी की कर दी होती। दुकान शुरू में ही निरस्त कर दी होती।

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