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रोल बैक की शौकीन त्रिवेंद्र सरकार

  • शराब नीति में भी बदलाव को मजबूर
  • छवि सुधारने में जुटे मुख्यमंत्री रावत और मंत्री पन्त
  • मेडिकल फीस पर हो चूका है रोल बैक
  • माफिया -अफसर गठजोड़ पर आखिर कर ही दिया हमला

चेतंग गुरुंग

त्रिवेंद्र सरकार ने एक और रोल बैक किया। इस बार शराब नीति को बदल कर। अब सरकार पर रोल बैक के शौकीन होने का धब्बा लगने का खतरा मंडराने लगा है। इससे पहले वह मेडिकल फीस में इजाफा करने का फैसला वापस ले चुकी है। दोनों रोल बैक से उसने गलती सुधारने की कोशिश की। इस बार जिस तरह सरकार ने कदम वापस खींचे उससे शराब की दुनिया में माफिया-अफसर गठजोड़ को गहरी चोट पहुंची। इतना कि अफसरों ने ही सरकार के इस फैसले के खिलाफ मीडिया को भडक़ाने की कोशिश की। मॉल के एमटीओ-डिपार्टमेंटल स्टोर पर अलग-अलग पैमाने का बहुत विरोध हो रहा था। साथ ही बार फीस में इजाफा बहुत ज्यादा बताया जा रहा था। बार बंद होने की कगार पर थे। दुकानों को ग्रुप में देना भी शक के दायरे में था। कहा जा रहा था कि इसके जरिये पोंटी चड्ढा के शराब सिंडीकेट को फायदा पहुंचाने की साजिश हो रही है। पोंटी जो कत्ल कर दिए गए थे, कुछ साल पहले। माना जा रहा है कि उसकी कंपनी और खानदान को उत्तर प्रदेश में भाव नहीं मिल रहा इसलिए देवभूमि में फिर कदम जमाने की कोशिश में है वे।

चड्ढा सिंडीकेट के लिए उत्तराखंड नया नहीं है। कभी यहां उसका साम्राज्य था। कांग्रेसराज में टीपीएस रावत शराब मंत्री थे। उन्होंने बोली वाली पॉलिसी को निकाल बाहर किया था। लॉटरी ले आए थे। उससे पहले पहाड़ों की हर वादियों में चड्ढा सिंडीकेट के शराब की महक थी। लॉटरी सिस्टम आया। उसका एकछत्र राज डोल गया। निकल लिया यहां से। फिर उत्तर प्रदेश उसका असली घर हो गया। चड्ढा ग्रुप को एक बार फिर उत्तराखंड दिखा तो उसकी खास और दिलचस्प वजह है। योगी सरकार को उत्तराखंड का लॉटरी सिस्टम भाया। उसको लगा वाकई बढिय़ा है यह मॉडल। सिंडीकेट को तोडऩे बल्कि ध्वस्त करने का। तकदीर का खेल है ये। ई-टेंडर खत्म कर दिया जिसमें पैसे की ताकत चलती थी। त्रिवेंद्र सरकार पर अंगुली उठना स्वाभाविक है। हमने अपने शानदार मॉडल को छोड़ दिया। योगी के नाकाम ई-टेंडर को अपना लिया। विशेषज्ञों के मुताबिक ई-टेंडर से भी फुर्सत पाना होगा त्रिवेंद्र सरकार को, अगर वाकई भला चाहते हैं राज्य का। लॉटरी ही बढिय़ा है। सिंडीकेट को दूर रखने के लिए। भले वह स्थानीय लोगों को कंपनी से जोडक़र दुकानों पर कब्जा करने की कोशिश करेगा। भले यह मुश्किल हो।
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत-आबकारी मंत्री प्रकाश पन्त पर और भी आरोप लग रहे थे। आबकारी नीति के कई प्रावधानों को ले कर। इसमें खास था मॉल में परदेसी शराब की दुकान (मॉडर्न ट्रेड आउटलेट्स) को पूरी छूट। उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं। खूब बेचो-खुल कर बेचो। उसी मॉल में अगर डिपार्टमेंटल स्टोर है तो परदेसी शराब तभी बेच सकेंगे, जब आप साल में पांच करोड़ की बिक्री करेंगे। शराब से इतर बाकी सामान की। सरकार को भूल महसूस हुई जल्दी। इसके बाद उसने इस प्रावधान को खत्म किया। इसको मीडिया में जिस तरह से रंग दिया गया उसके पीछे भी माफिया-अफसर गठजोड़ को जिम्मेदार समझा गया। महकमे के एक मंझले स्तर के अफसर की मॉल में शराब बेचने वाले के साथ गलबहियां होने के कारण उस पर शक जा रहा है। स्टोर को राहत दे कर सरकार ने दायरा 50 लाख कर दिया। इससे मॉल के मालिकों का खेल चौपट हो गया। इसको मीडिया में ऐसे प्रचारित किया गया, जैसे राशन और परचून की दुकान में शराब बेचने की छूट दे दी गई। मुख्यमंत्री को सामने आकर सफाई देनी पड़ी। मीडिया ने भी एक शब्द इस पर नहीं लिखा कि आखिर मॉल के शराब दुकानों को क्यों राहत दी जा रही है।
ऐसा समझा जा रहा था कि माफिया-अफसर गठजोड़ सरकार को गुमराह कर पांच करोड़ की बिक्री वाला प्रावधान बहुत सोच समझ कर लाया था। ज्यादातर स्टोर वाइन शॉप के लिए पांच करोड़ की बिक्री मुमकिन ही नहीं साल में। खास तौर पर देहरादून से इतर अन्य शहरों में। ऐसे में देहरादून के एक एमटीओ मालिक की मौज ही मौज समझी जा रही थी। देहरादून में तीन और हरिद्वार में एक दुकान है उसकी। इससे भी बड़ी साजिश सिंडीकेट को सुविधाजनक तरीके से कदम जमाने देने की थी। ग्रुप में दुकानों की ई-टेंडरिंग इसका ही हिस्सा था। सोचने की बात है। एक ही दुकान में अगर आपको एकमुश्त पांच करोड़ देने हैं। मिलने पर तो चार या पांच दुकानों के कितने? 20 करोड़ तो चाहिए ही। वह भी सफेद में। उत्तराखंड में लोग लोग पांच-दस पैसे की पत्ती में दुकान पर दांव खोलते हैं। कई मिलकर। एक करोड़ का भी बंदोबस्त करना हंसी-खेल नहीं। एक तो ई-टेंडर में दुकानों का महंगा होना तय। दूसरा-ग्रुप उठाने पर 20-25 करोड़ का बंदोबस्त! उनके बूते से बाहर का खेल था यह। मामला उछला तो सरकार को कदम पीछे
खींचने पड़े।
छीछालेदर हो गई। होनी ही थी। इस शर्त को खत्म कर सरकार ने निश्चित रूप से सिंडीकेट को काफी हद तक झटका दिया है। वह ई-टेंडर में शरीक हो सकता है, लेकिन उसमें भी सरकार ने स्थानीय होने की शर्त जोड़ दी है। इससे भी सिंडीकेट के इरादों को धक्का लगा है। अब उम्मीद इस बात की है कि स्थानीय लोग ही ज्यादा दुकानों पर काबिज हो सकेंगे। सरकार के फैसला वापसी ने शराब माफिया-अफसर गठजोड़ पर जबरदस्त प्रहार किया। इसके साथ ही पूरे देहरादून और हरिद्वार में ताबड़तोड़ छापों ने कारोबारियों को खौफ में डाल दिया। अफसरों को भी सन्देश दे दिया कि वे माफिया संग गठजोड़ से बाज आए। देहरादून में आराघर और रायवाला के साथ ही रायपुर रोड के चूना भट्टा दुकान पर छापे मारे। इन दुकानों के मालिकों के साथ अफसरों के गठबंधन का बहुत हल्ला था। इसके बावजूद मंत्री पन्त ने कोई रियायत नहीं दी। कारोबारी मारे-मारे फिरे अपना माल बचाने की कोशिश में। बचा नहीं पाए। 10 करोड़ से ज्यादा का माल तो सिर्फ देहरादून में ही बरामद हुआ। हालांकि, जिस तरफ तमाम कामयाबियों के बावजूद अभियान अचानक रोक दिया गया, उसको ले कर भी तमाम तरह की बातें हवा में तैर रही हैं।
कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री के एक करीबी शराब कारोबारी को बचाने के लिए अभियान बीच में ही रोक दिया गया। इस कारोबारी की देहरादून में कई दुकानें हैं। उसके पास हजारों पेटियां शराब की थीं जिनका हिसाब सरकार के पास नहीं था। जिस तरह ताबड़तोड़ छापे पड़ रहे थे और सोशल मीडिया में तुरन्त छापों की खबर आ रही थी, उसको देख कर कारोबारी घबरा गया था। उसने तुरंत पहुंच का इस्तेमाल किया और अभियान रुक गया। इसी बीच आबकारी मंत्री पन्त ने शराब की उन दुकानों का आवंटन रद्द कर दिया, जो कौडिय़ों के भाव दे दी गई थीं। शिकायत आई थी कि मिलीभगत कर अफसरों ने ये दुकानें लुटा डाली थीं। हालांकि, देहरादून के आबकारी अधिकारी मनोज उपाध्याय की कार्यशैली को ले कर खूब अंगुली उठी। कहा गया कि उन्होंने टेंडर में ज्यादा लोगों को शामिल होने नहीं दिया। इस शर्त पर भी खूब अंगुली उठी, जिसमें लिखा गया था कि टेंडर में पहले से दुकान चला रहे लोगों को तरजीह दे जाएगी। टेंडर में जो ज्यादा राजस्व दे उसको ही दुकान दी जाती है। उपाध्याय ने जो शर्त जोड़ी वह जान बूझ के खास लोगों को फायदा पहुंचाने वाले माना गया।

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