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गलत फैसलों से फीका पड़ा सालगिरह का जश्न

चेतन गुरुंग

वेंद्र सरकार ने इसी महीने अपना एक साल पूरा किया है। इसका जश्न जल्दी फीका पड़ गया तो सिर्फ उनकी अपनी गलती से। जाने किसने उनको यह सलाह दी, मेडिकल यूनिवर्सिटी को फीस तय करने का अधिकार देने वाला। इसके कारण सरकार और त्रिवेंद्र को अप्रिय स्थिति से गुजरना पड़ा। बहुत फजीहत हुई। फिर रोल बैक से गुजरना पड़ा। त्रिवेंद्र सरकार का यह पहला बड़ा फैसला था। सच कहता हूं, बहुत शर्मनाक होता है, तकलीफदेह भी, अपने फैसले को पलटना। यह एक किस्म से अपशब्द है। गाली कह लीजिये सीधे-सीधे। आखिर कोई सरकार अगर यह स्वीकार करे कि ओह, सॉरी, गलती हो गई थी, हमसे। तनिक माफी दे दीजिये। कितना संकट है साख के लिए। सरकार-मुख्यमंत्री-पार्टी तीनों के लिए। सियासत कोई नीचे और राज्य में ही थोड़ी न होती। ऊपर भी होती है। मेरा आदमी मुख्यमंत्री-2 किसिम का।
जब मुख्यमंत्री और सरकार पर ऊंगली उठती है न, ऊपर भी आकाओं पर भी खूब ऊंगली उठती है। बस दिखाई नहीं देती सबको। सो कहने का मतलब रोल बैक बहुत पीड़ा देता है, सबको। नीचे से ले कर ऊपर तक इसलिए मेडिकल स्टूडेंट्स की फीस तय करने का हक यूनिवर्सिटी को देने का फैसला पिट जाना मुख्यमंत्री के लिए निजी तौर पर भी कतई ठीक नहीं बिल्कुल नहीं। सियासी तौर पर भी। इस तरह के हालात मुख्यमंत्री को ताकत नहीं देते बल्कि कमजोर करते हैं। विरोधियों को ऑक्सीजन मिलती है। एक सादे तरीके से जीने वाले मुख्यमंत्री को नाहक विवादों में डाल दिया। सलाहकारों ने। विश्वासपात्रों ने..नौकरशाहों ने..जिनकी हुकूमत चल रही इन दिनों। रोल बैक की नौबत क्यों आई? इसका जवाब तलाशने से ज्यादा जरूरी क्या है? यही कि आखिर वह कौन विद्वान-उच्च कोटि का सलाहकार था, जिसने यह लाजवाब राय दी। जिसने सरकार को ही निरुत्तर कर दिया।
किसी सलाहकार ने यह नहीं सोचा कि आखिर अवाम के सवालों, राष्ट्रीय-स्थानीय मीडिया के सवालों के सामने कैसे आयेंगे। ऐसा फैसला करने के बाद। कैसे अपने पहाड़ के बूढ़े-बुजुर्गों की सवाल पूछती आंखों का सामना कर सकेंगे त्रिवेंद्र अब? क्यों हमारे बच्चों का, हमारा ख्वाब तोड़ रहे थे हुजूर? तुम तो हमारे सरताज थे। अपने थे। जब तुम मुख्यमंत्री बने न..हमको लगा हमारा बेटा-भाई बन गया। बच्चों ने तुम्हारे भीतर चाचा-मामा-अंकल देखा था। अपनापन से सन गए थे सब..फिर क्यों ऐसा कदम उठाया..तुमने..मुख्यमंत्री के इस बयान ने आग में घी का काम किया कि निवेशकों को आकृष्ट करने के लिए मेडिकल यूनिवर्सिटी वालों को फीस तय करने का अधिकार देना जरूरी है। न जाने किसने ऐसा बयान देने की सलाह दी उनको। यह अपरिपक्व बयान था। इससे बेहतर था वे कहते हम निवेशकों को राहत और प्रोत्साहन देंगे लेकिन राज्य के लोगों और युवाओं के भविष्य की जिक्र सबसे ऊपर है अगर कुछ गलत हुआ होगा तो समीक्षा के बाद फैसला बदला जा सकता है।
त्रिवेंद्र की तारीफ करूंगा, प्रतिष्ठा को अहम् का सवाल नहीं बनाया, ले डाला फैसला वापिस। कर दिया रोल बैक। भले बुराई हो। गलती हो गई तो मान लिया। भले विरोधी बोल रहे। पार्टी-सरकार को डुलवा दिया। मीडिया श्रेय लेने की होड़ में। हमने सरकार को हिला डाला। खबरें दिखा-दिखा के, लिख-लिख के..खाक दें तुमको श्रेय। यह तो बच्चों की लड़ाई, उनके कमजोर और उम्मीदों भरी आंखों में टूटते सपनों की आशंका लिए चेहरे वाले माता-पिता का संघर्ष था, जिसने सरकार को मजबूर कर दिया। अभी इस मामले को और पकाने की दरकार है। अंतिम छोर तक ले जाना होगा इसलिए कि रोल बैक भले हो गया लेकिन कागजों में जब तक वापिस नहीं होगा तब तक कुछ नहीं। मेरी संसदीय कार्यमंत्री प्रकाश पन्त और उच्च शिक्षा के अपर मुख्य सचिव डॉ. रणवीर सिंह से बात हुई। दोनों से बातचीत का निष्कर्ष यह निकला कि फीस वापसी का मामला अभी उलझा हुआ है।
अभी यह सिर्फ मुख्यमंत्री के जुबान से निकले शब्द भर हैं, उनको आकार देना आसान नहीं। पन्त ने कहा, विधेयक लाकर फीस बढ़ाने का अधिकार दिया गया है। मेडिकल यूनिवर्सिटी को संशोधन विधेयक लाना होगा या फिर अध्यादेश। दोनों ही जल्द न होने वाले मुश्किल कार्य हैं। डॉ. सिंह ने भी अनभिज्ञता जताई। उनके मुताबिक यूनिवर्सिटी वालों से बात करने के बाद ही कुछ कह पाएंगे। त्रिवेंद्र सरकार ने मेडिकल फीस मामले में रोल बैक से गुरेज नहीं किया। जनहित में। अब वैसे ही कदमों को उठाने की दरकार कई मामलों में है। मसलन शराब महकमे में एक से बढक़र एक अजीबो गरीब फैसले हो रहे हैं। अध्ययन कर सकते हैं। पता चल जाएगा। क्या-कहां गड़बड़ हो रही है। शराब महकमे में मंत्री प्रकाश पन्त की तमाम कोशिशें महकमे के अफसर काटने की साजिश करते रहते हैं।
जिस संयुक्त आयुक्त को महकमे के तमाम साजिशों का मास्टर माइंड समझा जाता है, उस पर बीजेपी के ही एक बड़े नेताजी का वरदहस्त है। ऐसे में मंत्री भी कई बार बेबस नजर आते हैं। मुख्यमंत्री को देखना चाहिए कि मंत्रियों के कामों में संगठन के लोग गैर जरूरी दखल और सलाह न दें। मंत्रियों का मनोबल कम होता है इससे। महकमों का कामकाज प्रभावित होता है।
शराब की दुकानों को एक महीने के लिए फिर पुराने दुकानदारों को दे देना हो या फिर बहुत सस्ती कीमत पर दुकानें सौंप देना, यह सब मास्टर माइंड का ही खेल है। सब जानते हैं। इससे सरकार को और घाटा हुआ। सवाल है कि आखिर कैसे महकमे में फर्जी बैंक गारंटी घोटाला हो गया। कैसे यह साल भर दबा रहा। वसूली नहीं हुई किसी के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई। इस घोटाले से भी त्रिवेंद्र सरकार को काफी आरोप सहने पड़ रहे हैं। वैसे ये सब पता करने, सरकार के क्रिया कलापों पर नजर रखने के लिए ही तो सलाहकार होते हैं। मोटी तनख्वाह पर सुविधाओं से लादे जाते हैं वे। शक्ति भी खूब होती है उनके पास। कई आईएएस अफसर भी होते हैं, जिनको विशेषज्ञ और भरोसेमंद समझा जाता है। फिर कैसे चूक होती जा रही है सरकार से। हैरानी होती है।
क्या मुख्यमंत्री सचिवालय के पास इंटेलिजेंस इनपुट्स नहीं आते? क्या चल रहा, क्यों चल रहा है, जनभावनाएं क्या हैं। जन असंतोष कितना है? आखिर सारा काम देखना मुख्यमंत्री के वश का नहीं। उनको स्पेशल टीम मिली होती है जिसको वह अपनी पसंद से तैयार करते हैं। तो क्या टीम तैयार करने में ही तो चूक नहीं गए त्रिवेंद्र जी?
जरा सोचिये, जिन पर आप भरोसा कर रहे, आंख मूंद के, कहीं वे लुटिया न डुबो दें। अपना खेल खेलते जा रहे हों। आपको पता ही न चल रहा हो। कुछ लोग सिर्फ सत्ता के साथ होते हैं। कल किसी मुख्यमंत्री के खासमखास थे। आज आपके, कल आप ऐसी ही कुछ अन्य कारणों से हटा दिए गए न तो फिर ये नए लम्बरदार की किचन कैबिनेट
में होंगे। आपको पिछली सदी में देखा था, नब्बे के दशक में। साधारण कुरता-पायजामा में। पहली बार, वह सादगी आपमें आज भी झलकती है। उसको बचा के रखना, वही आपकी असली संपत्ति है, बपौती। जिस दिन यह खत्म..उस दिन आप सिर्फ मुख्यमंत्री-वीआईपी रह जाएंगे। किसी के भाई-किसी का बेटा–किसी का चाचा-मामा-अंकल नहीं। आपको पसंद करता हूं, इसलिए मुफ्त की सलाह दी वरना खामोश रह जाता। जय बद्री-जय केदार–जय हिन्द..जय उत्तराखंड।

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