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मिशन 2019: सीट बंटवारे की जोड़-तोड़ में जुटे भाजपा के सहयोगी दल, सपा-बसपा गठजोड़ ने खड़ी की चुनौती

  • सुभासपा और अपना दल (एस) एक दर्जन से अधिक सीटों की शीर्ष नेतृत्व से कर रहे मांग, चिंहित किए क्षेत्र
  • दोनों दलों को जातीय समीकरण का फायदा मिलने का है पूरा भरोसा, सहयोगियों की अनदेखी नहीं कर सकती भाजपा

वीकएंड टाइम्स न्यूज नेटवर्क

लखनऊ। आगामी लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा की दोस्ती को देखते हुए भाजपा के सहयोगी दलों ने भी अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। जातीय समीकरणों को देखते हुए भाजपा के सहयोगी दलों सुभासपा और अपना दल (एस) ने शीर्ष नेतृत्व से एक दर्जन से अधिक सीटों की मांग की है ताकि जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर बने सपा-बसपा गठजोड़ को आम चुनाव में टक्कर दी जा सके। फिलहाल भाजपा अपने सहयोगी दलों की अनदेखी करने की स्थिति में नहीं है। भाजपा भी इस मामले में जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है।
गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में जीत के बाद सपा-बसपा के बीच मजबूत हो रही नजदीकियां भाजपा के लिये चुनौती साबित होती जा रही हैं। हालांकि, भाजपा के दिग्गज नेताओं का मानना है कि सपा-बसपा गठबंधन से उन्हें कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है। 2019 में भारतीय जनता पार्टी भारी बहुमत से जीत हासिल करेगी। सपा-बसपा दोस्ती से प्रदेश का सियासी परिदृश्य बदल गया है। लोकसभा चुनाव में जहां भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिये सपा-बसपा के बीच गठबंधन की तैयारियां जोर-शोर से शुरू हो गई हैं, वहीं दूसरी ओर केंद्र-राज्य में सहयोगी दल (अपना दल-एस और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी- सुभासपा) लोकसभा चुनाव में एक दर्जन से अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं। अनुप्रिया पटेल का अपना दल (एस) और ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) चाहती है कि लोकसभा चुनाव में उन्हें पर्याप्त भागीदारी मिले ताकि पटेल-राजभर के साथ पिछड़े वर्ग के वोट एकमुश्त मिल सकें। सहयोगी दलों ने ऐसी 12 सीटें चिन्हित कर ली हैं, जहां वे अपना प्रत्याशी उतारना चाहती हैं। भाजपा के सहयोगी दलों का मानना है कि इसके जरिए वे सपा-बसपा के जातीय समीकरणों को उसी की भाषा में जवाब दे सकेंगी। साथ यह भी साफ कर दिया है कि यदि इतनी सीटों पर बात नहीं बनी तो इनमें से आधी सीटों पर दोस्ताना मुकाबला भी हो सकता है। सूत्रों की मानें तो सपा-बसपा दोनों दल साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। हालांकि इस मामले में अभी बसपा प्रमुख मायावती का रुख साफ नहीं है।
कैराना लोकसभा उपचुनाव में किसी दल को समर्थन नहीं देने का ऐलान कर मायावती ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर दबाव बढ़ा दिया है। इसके अलावा गठबंधन को लेकर बसपा ने अभी तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। कांग्रेस की स्थिति भी फिलहाल साफ नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जिस तरह प्रदेश संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं, उससे गठबंधन पर तस्वीर साफ नहीं है। बावजूद इसके यदि कांग्रेस भी सपा-बसपा के साथ आ गई तो भाजपा के खिलाफ यादव-दलित और अल्पसंख्यकों का गठजोड़ बन सकता है। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए भाजपा सहयोगी दलों की अनदेखी करने की हालत में नहीं है। गौरतलब है कि 2017 के विधानसभा में अनुप्रिया पटेल के अपना दल (एस) ने पूर्वांचल की 11 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिनमें उसे नौ सीटों पर जीत हासिल हुई थी, जबकि ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा आठ में
चार सीटों पर जीत दर्ज करने कामयाबी हासिल की थी।

गठबंधन का फॉर्मूला तैयार करेंगी मायावती

14 अप्रैल को डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती है। इसी दिन मायावती पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से मुलाकात करेंगी। माना जा रहा है कि इसी दिन वह पार्टी नेताओं के काडर के बीच कोई बड़ा बयान दे सकती हैं। पार्टी सूत्रों की माने तो अप्रैल के बाद यानी मई माह में बसपा सुप्रीमो पार्टी की अहम बैठक करेंगी। इस बैठक में वह सपा-बसपा गठबंधन का फॉर्मूला जारी कर सकती हैं।

गठबंधन धर्म निभाने के लिए तैयार अखिलेश

अखिलेश यादव पहले भी ऐलान कर चुके हैं कि वह भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिये किसी भी दल से गठबंधन कर सकते हैं। लोकसभा उपचुनाव में मिले बसपा के समर्थन के बाद अखिलेश यादव खुले मंच से कह चुके हैं कि वह कोई भी त्याग करने और गठबंधन धर्म निभाने को तैयार हैं।

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