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तेजी से कस रहा HIV का शिकंजा पांच साल में दोगुनी हुई मरीजों की संख्या

  • केजीएमयू के नेट टेस्टिंग से हुआ खुलासा, युवा सबसे अधिक चपेट में
  • जागरूकता के अभाव ने बढ़ाई समस्या, रक्तदान के दौरान ट्रेस किए जा रहे मरीज

वीकएंड टाइम्स न्यूज नेटवर्क
लखनऊ। खतरनाक एचआईवी राजधानी में अपना शिकंजा साल-दर-साल कसता जा रहा है। पिछले पांच सालों में मरीजों की संख्या दो गुनी हो चुकी है। इसका खुलासा केजीएमयू के ब्लड ट्रांसफ्यूजन विभाग ने किया है। यहां नेट टेस्टिंग में नए मरीजों को ट्रेस किया गया है। वहीं जागरूकता के अभाव के कारण लोग विभिन्न वजहों से एचआईवी से संक्रमित हो रहे हैं। इस खुलासे ने स्वास्थ्य विभाग के जागरूकता अभियान की पोल खोल दी है।
केजीएमयू के ब्लड ट्रांसफ्यूजन विभाग में रक्तदान करने वाले लोगों में एचआईवी के मरीज पहले की अपेक्षा ज्यादा ट्रेस किए जा रहे हैं। विभाग में न्यूक्लिक एसिड एम्प्लीफीकेशन टेस्टिंग (नेट) आने के बाद से जांच की गुणवत्ता पहले की अपेक्षा काफी अच्छी हो गई है। वहीं नेट टेस्टिंग के गत पांच वर्ष के आंकड़े में यह भी सामने आया है कि एचआईवी के मरीजों की संख्या दोगुनी हुई है। ब्लड ट्रांसफ्यूजन विभाग सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में वर्ष 2012 में नेट टेस्टिंग की सुविधा शुरू हुई थी। नेट टेस्टिंग ब्लड की जांच करने की एडवांस तकनीक है। इसमें कई बार एलाइजा और कैमी ल्यूमिनेंस टेस्ट में भी पकड़ न आने वाले संक्रमण जैसे एचआईवी और हेपेटाइटिस भी पकड़ में आ जाते हैं। विभागाध्यक्ष डॉ.तूलिका चंद्रा ने बताया कि नेट टेस्टिंग से संक्रमण की अच्छी जांच होती है। हर साल एलाइजा और नेट टेस्टिंग के लिए अलग-अलग लोगों की जांच की जाती है। वर्ष 2013 से लेकर अब तक एचआईवी के मरीजों की संख्या दोगुनी हो गई है। इसमें अधिकतर युवा वर्ग के हैं। काउंसिलिंग में अधिकतर एचआईवी के मामलों में असुरक्षित यौन संबंध और मल्टीपल पार्टनर सामने आए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि लोगों को एचआइवी संक्रमण के बारे में तभी पता चला जब उन्होंने ब्लड ट्रांसफ्यूजन करवाया। इन लोगों की काउंसिलिंग की जाती है। रक्तदान करने वाले लोगों को रक्त संक्रमण से होने वाली बीमारियों से बचने की जानकारी दी जाती है। इस खुलासे से स्वास्थ्य विभाग के जागरूकता अभियानों की पोल खोल दी है।

टेस्ट आंकड़े

वर्ष एचआईवी टेस्ट
2013 40,980
2014 47,838,
2015 47,904
2016 51,719
2017 70,974

बिना आईडी रक्तदान नहीं

ब्लड ट्रांसफ्यूजन विभाग में प्रतिवर्ष 45 से 70 हजार के बीच ब्लड ट्रांसफ्यूजन की प्रक्रिया होती है। इसमें स्वैच्छिक रक्तदान और बड़ी संख्या में मरीजों के लिए आए हुए डोनर होते हैं। विभाग में तीन साल पहले बायोमीट्रिक सिस्टम लगाए गए थे, जिसमें रक्तदाताओं के फिंगर प्रिंट और आंखों की स्क्रीनिंग होती है, जिससे झूठ बोलकर रक्तदान करने वाले पेशेवर रक्तदाता पकड़ लिए जाते थे। डॉ.तूलिका ने बताया कि प्रतिदिन पांच से 10 पेशेवर रक्तदाता किसी न किसी के रिश्तेदार बनकर और झूठा नाम बताकर रक्तदान करने आ जाते हैं। ऐसे लोग ट्रेस होने पर भगा दिए जाते हैं, लेकिन अब से रक्तदान के लिए आने वाले लोगों के लिए पहचान पत्र लेकर आना अनिवार्य हो गया है। आईडी में आधार कार्ड सबसे अच्छा रहेगा। इसके अलावा ड्राइविंग लाइसेंस और किसी और तरह का पहचान पत्र भी मान्य रहेगा।’

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