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दांव पर सरकार की साख

  • हाईकोर्ट की टिप्पणी, यूपी में कानून व्यवस्था धवस्त 
  • पीड़िता के पिता के मौत के बाद टूटी पुलिस की नींद

संजय शर्मा

दलित संगठनों द्वारा भारत बंद आंदोलन में भडक़ी हिंसा को लेकर कठघरे में खड़ी योगी सरकार की साख फिर दांव पर है। इस बार सरकार की मुसीबत खुद भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर और उनके भाई बने हैं। विधायक के खिलाफ गैंगरेप और उसके भाई अतुल सेंगर के खिलाफ पीडि़ता के पिता को पीट-पीटकर मार डालने के आरोप में एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। एफआईआर दर्ज करने के बाद भी पुलिस द्वारा विधायक की गिरफ्तारी नहीं करने और केस को सीबीआई के हवाले करने से मामला और बिगड़ गया। रही सही कसर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में कानून व्यवस्था ध्वस्त होने की टिप्पणी कर निकाल दी है। इस प्रकरण में सरकार चारों ओर से उलझ गई है। सरकार और पुलिस दोनों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इसका सरकार की साख पर नकारात्मक असर पडऩा तय है।

प्रदेश में योगी सरकार की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। गैंगरेप के आरोपी उन्नाव के बांगरमऊ से भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई को लेकर सरकार की अपराधियों से निपटने की मंशा पर सवाल उठने लगे हैं। मामला तब सुर्खियों में आया जब आरोपियों के बजाय अपने पिता के खिलाफ कार्रवाई किये जाने से क्षुब्ध होकर पीडि़त युवती ने मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह का प्रयास किया। इस घटना के बाद भी पुलिस सक्रिय नहीं हुई। इसी बीच पीडि़ता के पिता की जेल में मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साबित हो गया कि पीडि़ता के पिता की मौत विधायक के भाई अतुल सेंगर और उसके गुर्गों द्वारा की गई पिटाई के कारण हुई। अब सरकार पूरी तरह घिर गई। आनन-फानन में विधायक के भाई को गिरफ्तार किया गया और उस पर गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज किया गया। इसके बाद विधायक के खिलाफ भी कार्रवाई का दबाव सरकार पर बना। हालात बिगड़ते देख खुद सीएम योगी ने कमान संभाली और पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी की टीम का गठन किया। साथ ही 24 घंटे के अंदर रिपोर्ट तलब की। टीम ने घटनास्थलों का निरीक्षण किया और अपनी रिपोर्ट सरकार के सामने पेश की। रिपोर्ट में विधायक के प्रभाव का खुलासा हुआ है। हालांकि रिपोर्ट में जिला अस्पताल, पुलिस और जेल प्रशासन की लापरवाही को इंगित किया गया है। इसी बीच यह मामला सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट तक पहुंच गया। इसने प्रदेश सरकार को पूरी तरह दबाव में ला दिया। हालांकि इसके बाद भी पुलिस ने विधायक को गिरफ्तार करने की जहमत नहीं उठाई। सरकार ने डैमेज कंट्रोल के लिए मामले को सीबीआई के हवाले कर पल्ला झाड़ लिया। डीजीपी ओपी सिंह ने साफ तौर पर कह दिया कि मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया गया है और विधायक की गिरफ्तारी केंद्रीय जांच एजेंसी ही करेगी। अपराधियों के प्रति सख्त दिखने वाली सरकार के अपने ही विधायक के खिलाफ बैकफुट पर आने से सरकार की छवि धराशायी हो गई है। रही सही कसर इस पूरे मामले में पुलिस की लीपापोती ने कर दी। इस मामले ने सियासत में भूचाल ला दिया है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि सरकार ने फजीहत से बचने के लिए सीबीआई के पाले में गेंद डाल दी है। यह भी कहा जा रहा है सीएम ने विधायक की गिरफ्तारी का आदेश जारी कर दिया था लेकिन किसी बड़े नेता के दबाव के बाद मामले को केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंपने का फैसला लिया गया है। सपा के राष्टï्रीय उपाध्यक्ष किरणमय नंदा ने सरकार को बर्खास्त करने की मांग की है। दूसरी ओर कानून व्यवस्था को लेकर सरकार के इस कदम से कोर्ट भी हैरत में हैं। कोर्ट ने सरकारी वकील की इस दलील को खारिज कर दिया कि विधायक को गिरफ्तार करने के लिए कोई सबूत नहीं है। अहम सवाल यह है कि क्या इस प्रकार की सुविधा प्रदेश की पुलिस आम अपराधियों को भी देगी? गैंगरेप मामले में सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीबी भोसले ने प्रदेश सरकार पर बेहद सख्त टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यूपी की कानून व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। सामूहिक दुष्कर्म पीडि़ता छह महीने तक इंसाफ की गुहार लगाती रही, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। पीडि़ता के पिता की मौत के बाद ही पुलिस की नींद टूटी। कोर्ट की इस टिप्पणी से अपराध मुक्त प्रदेश बनाने का दावा करने वाली सरकार की छवि को जबरदस्त झटका लगा है। वहीं इस प्रकरण का प्रदेश और देश की सियासत पर भी दूर तक संदेश गया है। इससे प्रचंड बहुमत से आई सरकार के मुख्यमंत्री की छवि को भी नुकसान पहुंचा है। साथ ही इस प्रकरण ने विपक्ष को बैठे बिठाए एक बड़ा मुद्दा दे दिया है। वह लोकसभा और अन्य चुनाव के दौरान इस मामले पर भाजपा को घेरने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगा। हालांकि सीबीआई ने सेंगर पर शिकंजा कस दिया है और उसे हिरासत में लेकर लंबी पूछताछ की है। बावजूद सरकार के लिए डैमेज कंट्रोल करना मुश्किल हो गया है। कुल मिलाकर इस प्रकरण ने न केवल योगी सरकार की साख को दांव पर लगा दिया है बल्कि भविष्य में इसका खामियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ सकता है।

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