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सौतेलेपन के खिलाफ बगावत

  • पीसीएस से आईएएस बने नौकरशाहों में भड़की असंतोष की आग
  • महकमों के बंटवारे में भेद-भाव का आरोप
  • डायरेक्ट आईएएस अफसरों के पास हैं ज्यादातर मलाईदार कुर्सी
  • मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं विवाद सुलझाना

चेतन गुरुंग

देहरादून। उत्तराखंड राज्य के गठन के तत्काल बाद जो सबसे पहला विवाद हुआ था, वह उत्तर प्रदेश कैडर के नौकरशाहों को मलाईदार महकमे दिए जाने को लेकर था। उत्तर प्रदेश कैडर के कई नौकरशाह थे, जिनके पास अच्छी कुर्सियां थीं। जो लोग उत्तराखंड कैडर खुशी-खुशी लेकर नए राज्य में आए थे या फिर बंटवारे में आए थे, उनको इस बात पर रंज था कि उन्हें कम अहम या बेकार किस्म की कुर्सी दी गई। आज जब राज्य को 18 साल हो चुके हैं तो फिर से यह झगड़ा उभार पर आ चुका है। फर्क सिर्फ यह है कि इस बार विवाद उत्तराखंड कैडर के ही नौकरशाहों में है। उनके बीच जो रेग्युलर भर्ती (आरआर) वाले आईएएस और पीसीएस से चयनित होकर आईएएस बने हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए इस झगड़े का संतोषजनक समाधान जल्दी निकालना बहुत जरूरी हो गया है।

डायरेक्ट और इन-डायरेक्ट कहे जाने वाले इन आईएएस अफसरों में वैसे कभी भी पटी नहीं। जो लोग पीसीएस से आईएएस बने हैं, उनका आरोप है कि उनको आईएएस की सेवा में सीधे आए लोग कभी भी अपनी बिरादरी का मानते ही नहीं। उनको दोयम दर्जे का तो मानते ही हैं। साथ ही उनके साथ पीसीएस की तरह ही बर्ताव किया जाता है। उनका कहना है कि उनके कामकाज और मेहनत में कभी कोई कमी नहीं निकाल पाया है। इसके बावजूद उनको सिर्फ पीसीएस से आईएएस में चयनित होने के बिना पर इस तरह से नजरअंदाज किया जाना उनके साथ नाइंसाफी है। यह राज्य गठन के शुरू से हो रहा है लेकिन अब पानी सिर के ऊपर से निकल चुका है।

हालिया विवाद के जंगल के आग की तरह फैलने की वजह ताजा तबादले हैं। सरकार ने पहले तो सचिव (पीसीएस से आईएएस) हरबंस सिंह चुग से आयुष और आयुष शिक्षा छीना। फिर राजस्व महकमा भी छीन डाला। आयुष और आयुष शिक्षा को हाल ही में केंद्र सरकार से प्रतिनियुक्ति से लौटे आरके सुधांशु को दिया गया। राजस्व महकमा जरूर पीसीएस से आईएएस बने विनोद रतूड़ी को दिया गया। इन-डायरेक्ट अफसरों को इससे पहले इस बात का भी रंज था कि लम्बे समय से विनय शंकर पाण्डेय, सचिव उषा शुक्ल, विनोद रतूड़ी, इन्दुधर बौड़ाई समेत अनेक पीसीएस से आईएएस बने अफसरों को काली कोठरी में डाला हुआ था। अभी भी उनके पास जो महकमे हैं, उनकी तुलना डायरेक्ट आईएएस अफसरों के महकमों से की जाए तो तस्वीर साफ हो जाती है।

सचिव स्तर के एक इन-डायरेक्ट नौकरशाह के मुताबिक आईएएस एसोसिएशन सिर्फ डायरेक्ट वालों के हित और हकों का ख्याल रखती है। हमारे अहम मुद्दों की तरफ उसका ध्यान है ही नहीं। सही मायने में वह डायरेक्ट आईएएस अफसरों का संगठन बन के रह गया है। हमारा काम सिर्फ सालाना बैठकों में जाना। डिनर और लंच करना भर रह गया है। सरकार को इस पर निश्चित तौर पर ध्यान देना होगा। इन-डायरेक्ट आईएएस अफसरों को अगर सरकार से मलाल है तो इसमें गलत कुछ नहीं है। उषा शुक्ल अब रिटायर होने वाली हैं। कुछ ही दिन रह गए हैं। रतूड़ी और शुक्ला के साथ ही इन्दुधर को भी लोग बिसरा चुके थे। उनके पास संस्कृत शिक्षा और सचिवालय या सामान्य प्रशासन सरीखे महकमे थे। इन-डायरेक्ट आईएएस अफसरों का आरोप है-सरकार उनको सिर्फ दबा के रखने की कोशिश कर रही है। डायरेक्ट आईएएस अफसरों को पूछ-पूछ कर महकमे दिए जाते हैं। दिए जा रहे हैं। उनको कौन सा महकमा पसंद नहीं है। कौन सा महकमा वे हटवाना चाहते हैं। उनसे पूछा जाता है। इसके बाद वही होता है, जो वे चाहते हैं। इन-डायरेक्ट आईएएस अफसरों को आम तौर पर वे महकमे दिए जा रहे हैं जिनको डायरेक्ट आईएएस अफसर छोड़ रहे हैं। लेना नहीं चाहते हैं। लेने के बाद देख चुके हैं कि इनमें कुछ खास नहीं है। इन-डायरेक्ट आईएएस अफसरों की नाराजगी और तर्कों में दम दिखाई देता है। मुख्यमंत्री के सचिवालय में बड़ी और अहम जिम्मेदारी डायरेक्ट वालों के पास ही हैं। अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश मुख्यमंत्री सचिवालय के बॉस ही नहीं हैं। उनके पास पीडब्ल्यूडी, तकनीकी शिक्षा, नागरिक उड्डयन समेत कई बड़े अहम महकमे भी हैं।

राधिका झा मुख्यमंत्री की सचिव हैं। उनको बहुत शक्तिशाली नौकरशाहों में शुमार किया जाता है। उनके पास उर्जा सरीखा महकमा भी है। अमित नेगी भी मुख्यमंत्री के यहां हैं। सभी डायरेक्ट आईएएस हैं। पिछली कांग्रेस सरकार में इन-डायरेक्ट आईएएस अफसरों को बहुत तवज्जो मिली हुई थी। भले मुख्यमंत्री सचिवालय के बॉस ओमप्रकाश और उनसे पहले सुखबीर सिंह संधू रहे। फिर भी भास्करानंद जोशी और दरबान सिंह गर्ब्याल जैसे इन-डायरेक्ट आईएएस अफसर भी बतौर सचिव मुख्यमंत्री की टीम में शामिल थे। जोशी काफी दबंग और काबिल अफसर समझे जाते थे। इतना ही नहीं उनके पास वित्त और राजस्व के साथ ही गृह सरीखे महकमे भी रहे। गृह और राजस्व महकमा मंजुल
कुमार जोशी के पास भी रहा। वह भी इन-डायरेक्ट आईएएस अफसर थे।

गब्र्याल के पास भी आवास और शहरी विकास और विनोद शर्मा के पास भी कई बड़े महकमे थे। शर्मा भी इन-डायरेक्ट वाले थे। जिलों और मंडल आयुक्तों की पोस्टिंग्स में भी इन-डायरेक्ट को खूब तवज्जो मिलती थी। इतनी कि डायरेक्ट आईएएस अफसर दबी जुबान यह नाराजगी जताने से नहीं चूकते थे कि उनकी उपेक्षा की जा रही है। इन-डायरेक्ट आईएएस अफसरों का आरोप है कि डायरेक्ट वाले उनको सीधे-सीधे निशाने पर ले रहे हैं। सरकार में मजबूत दखल रखने वाला एक ग्रुप अपने हिसाब से सरकार चला रहा है। मुख्यमंत्री को वे गुमराह कर रहे हैं। मुख्यमंत्री रावत और उनसे पहले वे आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. रणवीर सिंह से भी मिल चुके हैं।

मुख्यमंत्री ने उनको आश्वासन दिया है कि उनके साथ कोई नाइंसाफी होने देंगे। उन्होंने माना कि किसी भी कैडर के अफसरों को पूरी तरह बहुत अच्छा या बहुत खराब नहीं कहा जा सकता है। यह दोनों कैडर में हो सकता है। चाहे आईएएस में सीधे आए हों या फिर पीसीएस से। आईएएस एसोसिएशन की बैठक बुलाने का फैसला भी हुआ, लेकिन इस बीच नाराज समझे जा रहे चुग लम्बी छुट्टी चले गए। पाण्डेय भी छुट्टी पर पहले ही निकल गए। इसके चलते पहली बैठक नहीं हो पाई। डायरेक्ट और इन-डायरेक्ट अफसरों के बीच इस मनमुटाव से पार पाना मुख्यमंत्री के लिए बहुत आसान नहीं होगा। खास कर जब यह समझा जा रहा है कि वह डायरेक्ट वालों के पूरे प्रभाव में हैं। दूसरी तरफ इन-डायरेक्ट अफसर भी अभी नहीं तो कभी नहीं के मूड में उतर चुके हैं। इसको उनकी बगावत माना जा रहा है। इस विवाद को शांतिपूर्वक हल कर पाते हैं तो त्रिवेंद्र को एक बेहतर प्रशासक निश्चित तौर पर समझा जाएगा।

 

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