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अब दिल्ली के तख्त-ओ-ताज पर नजर

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बसपा के साथ तालमेल करके भारतीय राजनीति में हडक़ंप तो मचा ही दिया, साथ ही 2019 के लिए भाजपा को नये सिरे से मंथन करने के लिए मजबूर कर दिया है। सभी के जेहन में सवाल था कि बुआ और भतीजे में कौन दिल्ली की राजनीति करेगा और कौन यूपी की। पहली बार 4पीएम के संपादक संजय शर्मा से बातचीत करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि वह और बसपा सुप्रीमो मायावती दोनों ज्यादा सीटें जीतने पर दिल्ली की राजनीति करेंगे।

पूरे देश में माहौल को देखकर लग रहा था कि भाजपा को दोबारा सत्ता हासिल करने में कोई समस्या नहीं आयेगी। मगर आपकी एक मीटिंग ने सारा समीकरण बिगाड़ दिया। क्या सोचकर की यह मीटिंग?

देखिए यूपी की राजनीति को देखकर यह समझा जा सकता है। सबसे ज्यादा लोकसभा की सीटें यूपी से आती हैं। जो दल सबसे ज्यादा सीटें जीतता है, स्वाभाविक है वही दल या तो सरकार बनाता है या सरकार में शामिल होता है।

तो सारी बात सरकार बनाने की है?

देखने को तो यही मिला है कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर जाता है। सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री अगर किसी प्रदेश ने दिए हैं तो वह उत्तर प्रदेश ने ही दिए हैं, तो स्वाभाविक है लोकसभा की ये सीटें महत्वपूर्ण हैं।

तभी आपने गोरखपुर और फूलपुर का चुनाव जीतने के लिए दिन रात एक कर दिया?

जहां तक चुनावों की बात है, यह दोनों उप चुनाव सपा के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। लगातार इन पर काम चल रहा था। कार्यकर्ताओं के स्तर पर। नेताओं के स्तर पर। मुद्दों को लेकर। खुशी की बात यह रही कि बसपा का सहयोग मिला। अन्य दलों ने भी सहयोग किया। नतीजा यह रहा कि सीएम और डिप्टी सीएम को अपने क्षेत्र में उप चुनाव के दौरान मुंह की खानी पड़ी।

अब तक यह देखा गया था कि आप चुपचाप कोई काम नहीं करते थे। आपके हर कदम का सभी को पता रहता था। पर यह बुआ जी से मीटिंग कैसे इतने चुपचाप कर ली कि किसी को कानो-कान खबर तक नहीं हुई ?

देखिये भाजपा से सपा को या किसी भी दल को बहुत सावधान रहना पड़ेगा। यह लोग पता नहीं देश को किस रास्ते पर कब ले जाएं और कौन का गड्ढा सामने आ जाये, यह प्रयोग करते रहते हैं सोसाइटी में कि कौन सा दांव कब चला जाये जो उन्हें लाभ पहुंचा दे। इसलिए सपा ने सोच समझकर रणनीति बनायी। निषाद पार्टी को साथ लिया। बिंद पार्टी को भी साथ लिया। वाम दलों व राष्ट्रवादी कांग्रेस का सहारा लिया। बसपा ने भी सहयोग किया और हमने सीएम को और डिप्टी सीएम को उनके घर में ही हरा दिया।

मगर सब कुछ इतना चुपचाप?

भाजपा सत्ता में है और उसके पास एडमिनिस्टे्रशन है। प्रशासन की ताकत से विपक्ष बहुत जल्दी लड़ नहीं पाता और भाजपा तो शातिर पार्टी है ही, इसलिए बहुत गोपनीय रखा गया। इस रणनीति ने भाजपा को सोचने पर मजबूर कर दिया कि देश में अगर कहीं जाति या धर्म का जहर फैलाओगे तो कहीं न कहीं जनता में ऐसा समीकरण बनेगा। ऐसी ताकत आएगी कि वो आपका सफाया कर देगी।

एक घटना सामने आयी कि एक नौजवान ओला से उतर गया क्योंकि ड्राइवर मुसलमान था। क्यों होता है ऐसा ?

अगर यह नौजवान था तो इससे बुरा कुछ और नहीं हो सकता। यह कहां जा रहे हैं हम? मुझे लोगों ने बताया कि इस नौजवान के भाजपा के कुछ बड़े नेताओं से संबंध हैं, हो सकता है कर्नाटक चुनाव से पहले इन लोगों ने भावनायें भडक़ाने को जान बूझ कर यह किया हो..आपको याद होगा गुजरात चुनाव से पहले ऐसे ही पद्मावती मूवी का तमाशा किया गया था। अब न पद्मावती है कहीं और खिलजी भी घर चला गया। यह लोग हर राज्य के चुनाव से पहले ऐसा ही ड्रामा करते हैं।

भाजपा कह रही है आपको और मायावती जी को सीबीआई का डर था इसलिए आप दोनों एक हो गए? 

देखिए मैं एक बात कहना चाहूंगा कि जितने भी दल हैं राजनीति करने वाले, कहीं न कहीं उन्हें इस तरह की चीजों का सामना करना पड़ता है। देश के अधिकांश क्षेत्रीय दलों को सीबीआई या ईडी जैसी संस्थाओं का सामना करना पड़ा है। अपने आप को साबित करना पड़ा है कि हम गलत नहीं हैं। जहां तक सपा का सवाल है हम तो पहले भी सीबीआई क्लब में रह चुके हैं । फिर शामिल हो जाएंगे तो फिर अपने कागज दिखा देंगे।

तो क्या तभी सीबीआई को तोता कहा था सुप्रीम कोर्ट ने?

मैं संस्था पर कुछ नहीं कहूंगा, पर संस्था की जिम्मेदारी है कि वो अपनी साख ऐसी बनाकर रखे कि उस पर कोई उंगली न उठा सके। अभी तक राष्ट्रीय पार्टियों पर सीबीआई का इस्तेमाल करने का आरोप लगता है। यह ठीक नहीं है। इसलिए कहता हूं कि जनता के काम करो तो जनता मदद करेगी। यह सीबीआई या ईडी मदद नहीं करेगी।

मगर जनता को लगता है कुछ गड़बड़ है तभी सीबीआई तलाश रही है कुछ मसाला?

हम तो अपनी सच्चाई पहले ही बता चुके हैं, लेकिन अब जनता को तो भाजपा की बेईमानी दिखती है। नोटबंदी के बाद दुष्प्रचार किया गया कि इससे भ्रष्टाचार खत्म हो जायेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि देखिये देश को कहां ला कर खड़ा कर दिया। सरकार ने कहा कि जीएसटी से सुविधाएं हो जाएंगी व्यापार की लेकिन देखिये व्यापारी कितने संकट में हैं। उनका व्यापार चौपट हो गया है। इन्होंने कहा कि किसानों का कर्जा माफ कर देंगे। मगर कर्जा तो माफ हुआ नहीं बल्कि रिकवरी हो रही है। यह लोग किसानों के दर्द को महसूस ही नहीं करते हैं।

मगर सीएम तो खुद गांव जा रहे हैं, किसानों से मिल रहे हैं ?

एक उपचुनाव के नतीजों ने यह हालात पैदा कर दिए कि सरकार को समझ आ गया कि किसान नाराज हैं। तभी सीएम शाहजहांपुर गये, और भी गांवों में जा रहे हैं। मैं केवल सरकार से यह पूछना चाहता हूं कि किसानों का कितना आलू खरीदा उन्होंने? कितना चीनी मिलों का बकाया है। यह खेल ध्यान हटाने के लिए है, इसलिए वे इधर-उधर गांंव में जा रहे हैं। निरीक्षण की जगह इनको समीक्षा करनी चाहिए कि किसानों की तकलीफें 
क्या हैं?

क्या आपको नहीं लगता किसानों को राहत दी है भाजपा ने?

राहत तो छोडिय़े और खराब हालात पैदा कर दिए हैं। किसान पूछ रहे हैं कि पीएम ने लाल किले से और सदन में कहा था कि किसानों की आय दोगुना हो जायेगी, पर वो तो पहले की कीमत भी नहीं पा रहे हैं।

आप इंजीनियर हैं। यूपी के चुनाव में विकास की बात करते थे, पर दो उपचुनाव की जीत के बाद आप भी जाति की गणित में उलझ गये। लोगों को आपसे तो उम्मीद नहीं थी कि आप विकास की जगह जाति की राजनीति करने लगेंगे?

यह सब हमने भाजपा से ही सीखा है और इस सवाल का जवाब देने से पहले मैं यह कहना चाहता हूं कि देश की सबसे बड़ी जातिवादी पार्टी कोई है तो वो भाजपा है। देश में अगर कोई नफरत फैलाता है तो वह भाजपा है। यूपी में राजभर वोट चाहिये तो ओमप्रकाश राजभर की पार्टी साथ में, कुर्मी वोट चाहिये तो अनुप्रिया पटेल साथ में, यह जातिवादी राजनीति नहीं है तो और क्या है।

लेकिन लोग तो आपमें एक ऐसा युवा नेता देखते थे जो जाति नहीं विकास की बातें करता है। नौजवानों को दर्द नहीं होगा जिनके आईकॉन आप थे, आप उसी तरह की बातें करने लगे जो देश को पीछे ले जाती हैं?

मैं तमाम नौजवानों को आपके माध्यम से यह कहना चाहता हूं कि सपा कभी जाति की राजनीति नहीं करती। मैं भविष्य के लिए भी यह विश्वास दिला सकता हूं कि हम जाति के आधार पर फैसले नहीं लेंगे। मगर हां जो देश का संविधान कहता है कि इस रास्ते पर चलना होगा तो हम जरूर चलेंगे। भाजपा तो सिर्फ जाति की ही राजनीति करती है। इन्होंने हर जाति का सीएम बनाया। यूपी से जरूर मौर्य जाति का सीएम बनाने की जगह उन्हें डिप्टी सीएम बना दिया। तभी परेशान रहते हैं वो।

एक तो सीएम और डिप्टी सीएम में वैसे ही सब ठीक नहीं चल रहा। आप और आग को हवा दे रहे हैं?

यह बात तो सही है कि शास्त्री भवन की जिस कुर्सी पर अपनी नेम प्लेट लगाकर डिप्टी सीएम बैठे थे इस पर दोबारा नहीं बैठ पाये। इसका तो दर्द उन्हें होता ही होगा। इधर एक बड़े अफसर ने मुझे बताया कि डिप्टी सीएम ने कुछ टेंडर अपने लोगों को दिये थे। सीएम को पता चला तो उन्होंने रोक दिये। यह तो कहते थे कि ई-टेंडर होते है तो सीएम को यह कौन सी तकनीक आती है कि उन्हें पता चल गया कि ई-टेंडर से भी अपनों को ठेके दे रहे हैं डिप्टी सीएम। हां, इधर यह जरूर हुआ है कि जब दोनों हार गये अपनी सीट तो दोनों में कुछ प्यार बढ़ा है।

मतलब आप ईवीएम की तरह ई-टेंडर पर भी सवाल उठा रहे हैं?

सवाल तो खुद सीएम ने उठाया। ईवीएम के बाद एटीएम की हालत भी खराब है एटीएम खाली है तो यह नोट कहां गायब हो गये? कहीं यह रुपया कर्नाटक चुनाव जीतने के लिये तो नहीं भेज दिया गया। यह सवाल तो सभी के मन में आयेगा ही।

एक नये मोर्च की बात होती रहती है। क्या आप विपक्ष को मजबूत करने के लिए कर्नाटक जा रहे हैं?

यह मेरे लिए बहुत संकट का समय है। कांग्रेस ने अपने प्रचार की लिस्ट में मेरा नाम डाल दिया। मैंने अपनी राज्य यूनिट से कहा, जहां मजबूती हो वहां चुनाव लड़ाओ। वहां पर देवगौड़ा जी से बसपा का गठबंधन है। मैं वहां किसी मोर्चे में नहीं जाना चाहता। देखते हंै अभी क्या स्थिति बनती है।

कहा जा रहा है कि जब से आपकी बसपा से दोस्ती हुई है आपने कांग्रेस को लिफ्ट देना बंद कर दिया है?

नहीं मेरे कांग्रेस से संबंध पहले जैसे थे वैसे ही रहेंगे। यह मैं भरोसा दिलाना चाहता हूं। भाजपा को हराने के लिए मजबूत मोर्चा बनेगा।

मतलब यूपी में सपा, बसपा के साथ कांग्रेस भी रहेगी? कितनी सीटें देंगे आप बसपा को?

अभी जब हमारी बसपा के नेताओं से विस्तार से बातचीत होगी तभी इस गठबंधन की व्यापक चर्चा की जाएगी और उसी में तय होगा।

सब जानना चाहते हैं कि मायावती जी के साथ उस रात की मीटिंग में क्या हुआ था और दूसरी बात यह कि क्या अभी भी आप उन्हें बुआ जी कहते हैं या नहीं ?

मैंने उनको हमेशा बुआ जी के संबोधन से ही बुलाया है। मगर जब दो राजनैतिक दलों की बात होती है तो वो अलग ढंग से होती है। जो सम्मान मैं उन्हें पहले देता था वही आज भी देता हूं।

आपका गठबंधन चुनाव तक कायम रह पायेगा ?

स्वाभाविक है भाजपा बड़ी पार्टी है तो वो कभी नहीं चाहेगी कि हमारा गठबंधन हो क्योंकि सबसे ज्यादा नुकसान उसी का होगा। मगर हमारी कोशिश रहेगी कि भाजपा को हराने के लिए मजबूत गठबंधन हो। कांग्रेस के अलावा अन्य छोटी पार्टियां भी गठबंधन का हिस्सा बनें।

तो यह गठबंधन जाति की बात करेगा या विकास की ?

भाजपा को उसी के दांव से हराकर हम लोग भाजपा से ज्यादा विकास का मुद्दा जनता के सामने रखेंगे।

एक आखिरी सवाल, लोगों के मन में यह जानने की बहुत इच्छा है कि आप और मायावती जी में कौन दिल्ली संभालेगा और कौन यूपी?

यूपी से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने पर हम दोनों दिल्ली की राजनीति करेंगे और देश के विकास में अपना योगदान देंगे। भाजपा बड़ी पार्टी है तो वो कभी नहीं चाहेगी कि हमारा गठबंधन हो क्योंकि सबसे ज्यादा नुकसान उसी का होगा। मगर हमारी कोशिश रहेगी कि भाजपा को हराने के लिए मजबूत गठबंधन हो। कांग्रेस के अलावा अन्य छोटी पार्टियां भी गठबंधन का हिस्सा बनें।

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