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महिलाओं के प्रति निष्ठुर क्यों हैं

आशुतोष चतुर्वेदी

श में दुष्कर्म के दो मामले सुर्खियों में हैं। दुर्भाग्य यह है कि दोनों मामलों में भारी राजनीति हो रही है और महिलाओं के सम्मान का मुद्दा पीछे छूट गया है। उत्तर प्रदेश में तो भाजपा के एक विधायक पर ही दुष्कर्म का आरोप है। हाईकोर्ट और सीबीआई के हस्तक्षेप के बाद उनकी गिरफ्तारी संभव हुई है। दूसरी घटना जम्मू कश्मीर के कठुआ की है, जहां एक आठ वर्षीय बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ। दुर्भाग्य यह है कि दुष्कर्म की खबर के बाद भी लोगों में वह प्रतिक्रिया देखने में नहीं मिली, जो आमतौर पर ऐसे मामलों में दिखायी देती है। जम्मू कश्मीर में निर्भया जैसी घटना होने के बाद भी समाज उद्वेलित नहीं हैं। लोग सडक़ों पर नहीं उतरे हैं। कुछेक लोग तो आरोपियों के पक्ष में खड़े हैं।
इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को राजनीति से लेकर सांप्रदायिक रंग तक दिया जा रहा है, जबकि दोनों घटनाएं सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली हैं। इन घटनाओं को लेकर राजनीतिक दलों ने तो कैंडिल मार्च किया, लेकिन सामाजिक संगठनों ने ऐसा कुछ नहीं किया। यह हम सब जानते हैं कि राजनीतिक दलों का हर बात में अपना नफा-नुकसान सर्वोपरि होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इन घटनाओं पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि ये घटनाएं सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली हैं। कोई भी दोषी बख्शा नहीं जायेगा, इंसाफ होगा।
भारत का संविधान सभी महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के सामान अधिकार की गारंटी देता है। इसके अलावा संविधान में राज्यों को महिलाओं और बच्चों के हित में विशेष प्रावधान बनाये जाने का अधिकार भी दिया है, ताकि महिलाओं की गरिमा बरकरार रहे। लेकिन इन सब के बावजूद देश में महिलाओं की स्थिति अब भी मजबूत नहीं है। उन्हें अक्सर निशाना बनाया जाता है। उत्तर प्रदेश में भाजपा विधायक कुलदीप सेंगर को दुष्कर्म के मामले में गिरफ्तार किया गया है।
वह दबंग विधायक माने जाते हैं। मामले ने तूल तब पकड़ा, जब आरोपी के पिता की अस्पताल में मौत हो गयी। उनके साथ मारपीट की गयी थी और उनके शरीर पर चोट के निशान पाये गये। दूसरी ओर कठुआ में आठ साल की मासूम के साथ निर्ममता से दुष्कर्म हुआ और फिर हत्या कर दी गयी। यह बच्ची बकरवाल समुदाय से थी, जो जम्मू-कश्मीर का घुमंतू समुदाय है. बकरवाल भेड़-बकरियां पालकर अपनी जीविका चलाते हैं। यूं भी कह सकते हैं कि यह जम्मू-कश्मीर का आदिवासी समुदाय है। यह सदियों से जंगल के संसाधनों का इस्तेमाल करता आ रहा है। बदलते वक्त के साथ ये लोग जम्मू के आसपास अपना स्थायी ठिकाना बसाने लगे हैं। जम्मू में बकरवाल समुदाय और अन्य स्थानीय लोगों के बीच जमीन को लेकर विवाद है। कहा जा रहा है कि बच्ची से दुष्कर्म के तार इस विवाद से जुड़े हुए हैं। आठ साल की बच्ची से दुष्कर्म सभ्य समाज के माथे पर कलंक है।
हमारे देश में बलात्कार, यौन शोषण और छेड़छाड़ कोई नयी बात नहीं है। इन मामलों को बेहतर ढंग से सुलझाने के लिए भारत में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्राम सेक्सुअल ऑफेंसेस यानी पाक्सो एक्ट बनाया गया। हालांकि यह एक्ट जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं है। पास्को एक्ट के तहत 18 साल से कम उम्र के बच्चों और बच्चियों से दुष्कर्म, यौन शोषण और पॉर्नोग्राफी जैसे मामलों में सुरक्षा प्रदान की जाती है। इस कानून में सात साल या फिर उम्र कैद की सजा का प्रावधान है। आशय यह कि हमारे पास एक मजबूत कानून है। बावजूद इसके ऐसी घटनाएं रुक नहीं रहीं हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो, 2017 के अनुसार मध्य प्रदेश में दुष्कर्म के सबसे ज्यादा मामले दर्ज हुए। इसके बाद नंबर आता है उत्तर प्रदेश का, जहां दुष्कर्म के 4,500 से ज्यादा मामले दर्ज हुए।
गैंगरेप के मामलों में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। दूसरे नंबर पर राजस्थान है। एनसीआरबी के अनुसार 2016 में भारतीय अदालतों में दुष्कर्म के 18,552 मामलों पर फैसले सुनाये गये। इनमें 4,739 मामलों में सजा हुई और 13,813 मामलों में आरोपी बरी हो गये। बहुत कम मामलों में सजा होना और बड़ी संख्या में आरोपियों का छूट जाना बेहद चिंताजनक हैं। कुछ समय पहले राज्यों के लिए लिंग भेद सूचकांक यानी जेंडर वल्नरेबिलिटी इंडेक्स तैयार किया है और इस कसौटी पर सभी राज्यों की कसा गया। इसके नतीजों के अनुसार गोवा महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित राज्य है, जबकि देश की राजधानी दिल्ली महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से खराब राज्यों में से एक है। हिंदी भाषी राज्यों का रिकॉर्ड खराब है। झारखंड जैसे राज्यों को कुछ अलग तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में झारखंड से बच्चियों की तस्करी के कई मामले सामने आये, जिनमें मां-बाप को बहला-फुसलाकर बच्चियों को दिल्ली से सटे गुरुग्राम ले जाया गया। यहां बड़े मल्टीनेशनल अथवा बड़ी आईटी कंपनियों में काम करने वाले अधिकारी रहते हैं। उन्हें घरेलू काम के लिए दाई की जरूरत होती है। इस इलाके में तमाम प्लेसमेंट एजेंसियां हैं, जो उन्हें यह उपलब्ध कराती हैं। इनके एजेंट देशभर में सक्रिय हैं। ऐसी अनेक घटनाएं सामने आयीं हैं, जिनमें इनमें से कुछ लड़कियों का शारीरिक शोषण तक किया गया। कानूनन 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों से घरेलू काम नहीं कराया जा सकता है, लेकिन देश में ऐसे कानूनों की कोई परवाह नहीं करता। यह केवल झारखंड की बच्चियों की समस्या नहीं, पूरे देश की बेटियों और महिलाओं का यह दर्द है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सरकारी कोशिशों और सामाजिक जागरूकता अभियानों के कारण महिलाओं की स्थिति में धीरे-धीरे ही सही, सुधार आया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है।
शिक्षण संस्थानों तक लड़कियों की पहुंच लगातार बढ़ रही है। मिड डे मील योजना बड़ी कारगर साबित हुई है। एक दशक पहले हुए सर्वेक्षण में शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी 55.1 प्रतिशत थी, जो अब 68.4 तक पहुंच गयी है, यानी शिक्षा के क्षेत्र में 13 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गयी है। बाल विवाह की दर में गिरावट को भी महिला स्वास्थ्य और शिक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकारों के लगातार जागरूकता अभियानों के कारण इसमें कमी तो आयी है। सर्वेक्षण के अनुसार सन 2005-06 में 18 वर्ष से कम उम्र में शादी 47.4 प्रतिशत से घट कर 2015-16 में 28.8 रह गयी है। इसका सीधा लाभ महिला स्वास्थ्य पर पड़ा है। शिक्षा और जागरूकता का सीधा संबंध घरेलू हिंसा से है। अब इन मामलों में भी कमी आयी है लेकिन जब तक महिलाओं और बच्चियों के प्रति समाज में सम्मान की चेतना पैदा नहीं होगी, तब तक ये सारे प्रयास नाकाफी हैं।

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को राजनीति से लेकर सांप्रदायिक रंग तक दिया जा रहा है, जबकि दोनों घटनाएं सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली हैं। इन घटनाओं को लेकर राजनीतिक दलों ने तो कैंडिल मार्च किया, लेकिन सामाजिक संगठनों ने ऐसा कुछ नहीं किया। यह हम सब जानते हैं कि राजनीतिक दलों का हर बात में अपना नफा-नुकसान सर्वोपरि होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इन घटनाओं पर चिंता जाहिर की है और कहा है कि ये घटनाएं सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली हैं। कोई भी दोषी बख्शा नहीं जायेगा, इंसाफ होगा। भारत का संविधान सभी महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के समान अधिकार की गारंटी देता है। इसके अलावा संविधान में राज्यों को महिलाओं और बच्चों के हित में विशेष प्रावधान बनाये जाने का अधिकार भी दिया है, ताकि महिलाओं की गरिमा बरकरार रहे। लेकिन इन सब के बावजूद देश में महिलाओं की स्थिति अब भी मजबूत नहीं है। उन्हें अक्सर निशाना बनाया जाता है।

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