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‘बाहरियों’ को विधान परिषद में भेजकर एक तीर से कई निशाने लगा रही भाजपा

  • सपा-बसपा को छोडक़र आए नेताओं पर मेहरबानी कर अन्य को दिया संदेश

वीकएंड टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। गैरो पे करम अपनों पे सितम, फिलहाल भाजपा के कार्यकर्ता इसी गाने को गुनगुना रहे हैं और इसके पीछे की वजह है एमएलसी चुनाव में भाजपा का बाहरियों को ज्यादा तवज्जों देना। दरअसल एसएलसी चुनाव में भाजपा ने उन चार चेहरों को उच्च सदन भेजने का फैसला किया है जो कुछ महीने पहले दूसरे दलों से भाजपा में शामिल हुए थे। सरोजनी अग्रवाल, बुक्कल नवाब, यशवंत सिंह और जयवीर सिंह ने भाजपा का दामन थामा था। जिन 10 सदस्यों ने भाजपा से एमएलसी के लिए नामांकन किया था, उनमें ये भी शामिल है। सभी निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं। इसके जरिए भाजपा संदेश देना चाहती है कि वह जो वादा करती है उसे निभाती है। माना जा रहा है कि इस संदेश के जरिए वह विधानसभा चुनाव में दूसरे नंबर पर रहने वाले दलों के नेताओं को पार्टी से जोडऩे की जुगत में लगी हुई है।
भाजपा ने अपने जिन 10 नेताओं को उच्च सदन में भेजने का फैसला किया है उनमें सरकार में मंत्री डॉ.महेंद्र सिंह, मंत्री मोहसीन रजा, संगठन में सक्रिय भूमिका निभा रहे विजय बहादुर पाठक, अशोक कटारिया, विद्यासागर सोनकर, अशोक धवन, सपा छोडक़र भाजपा में शामिल हुई सरोजनी अग्रवाल, बुक्कल नवाब, यशवंत सिंह और बसपा छोडक़र भाजपा में शामिल हुए जयवीर सिंह के नाम हैं। जाहिर है पार्टी ने जिन चार चेहरों को विधान परिषद भेजा है वे विधान परिषद के सदस्य थे और भाजपा के कहने पर विधान परिषद से इस्तीफा देकर पार्र्टी में शामिल हुए थे। हालांकि सूत्रों की माने तो अपनी पुरानी पार्टी को छोड़ भाजपा में शामिल होने के लिए सबके साथ अलग-अलग डील हुई थी, लेकिन अब वे इसे मानने को तैयार नहीं हैं। भाजपा की एमएलसी उम्मीदवार सरोजनी अग्रवाल ने कहा कि कोई डील नहीं हुई थी। पार्टी ने हम पर विश्वास जताया है। वहीं इन नामों की घोषणा के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल भी उठाए। सपा को छोडक़र भाजपा में शामिल हुए बुक्कल नवाब को लेकर तब भी सवाल उठे थे और जब उन्हें भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया है तो फिर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि बुक्कल नवाब का इसे इंकार करने का अपना ही अंदाज है, बुक्कल नवाब ने कहा बीजेपी सब पर भारी, योगी सब पर हावी।
सूत्रों का कहना है कि बुक्कल नवाब को सीबीआई जांच का डर सता रहा था। लिहाजा सपा के इस पुराने नेता ने मुलयाम का साथ छोडक़र भाजपा का दामन थाम लिया था। हालांकि आज वे इन आरोपों से इंकार कर रहे हैं। वैसे इन सभी के पास भी विधान परिषद के उम्मीदवार बनाये जाने के पीछे अपना ही तर्क है, लेकिन सच्चाई तो यही है कि भाजपा उसी वादे को पूरा कर रही है, जो इन्हें पार्टी ज्वाइन कराते हुए इनसे किया गया था। कुछ दिनों पहले ही सपा छोड़ भाजपा में शामिल हुए अशोक बाजपेयी को भाजपा ने राज्यसभा भी भेजा है। ऐसे में पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं के मन में असंतोष है।

दूसरे पार्टी के अन्य नेताओं पर भी नजर

भाजपा फिलहाल अपने वादे को ही पूरा कर रही। इसके पीछे वजह भी है। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी कुछ और दलों के नेताओं को जो पिछले विधान सभा चुनाव में दूसरे नंबर पर थे उनको पार्टी में ज्वाइन कराने वाली है। ऐसे में वादे को पूरा कर भाजपा ये मैसेज भी देना चाहती है कि वह जो वादा करती है उसे निभाती भी है।

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