You Are Here: Home » UTTAR PRADESH » केजीएमयू: चहेतों पर उड़ाया जा रहा गरीबों का फंड, अफसरों की साठगांठ से चल रहा खेल

केजीएमयू: चहेतों पर उड़ाया जा रहा गरीबों का फंड, अफसरों की साठगांठ से चल रहा खेल

  • खुद के पैसे से इलाज कराने को मजबूर हैं बीपीएल कार्ड धारक
    बजट की कमी बता दौड़ा रहे गरीबों को, केजीएमयू प्रशासन नहीं कर रहा कोई कार्रवाई

वीकएंड टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। केजीएमयू में प्रतिवर्ष गरीबों के इलाज के लिए आ रहे कई करोड़ के फंड में खेल किया जा रहा है। अफसर इसका प्रयोग अपने चेहतों को लाभ पहुंचाने के लिए कर रहे हैं। लिहाजा गरीबों को गंभीर रोगों में भी सरकार से मिली सहायता उपलब्ध नहीं हो पा रही है। यही नहीं जब अफसरों के सामने वह सहायता उपलब्ध कराने की गुहार लगाता है तो उसे बजट की कमी बताकर चलता कर दिया जा रहा है। यह सारा खेल अफसरों की साठगांठ से चल रहा है। वहीं केजीएमयू प्रशासन सबकुछ जानते-बूझते आंख मूंदे बैठा है। लिहाजा गरीब मरीज इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहा है।
केजीएमयू में गरीब मुफ्त इलाज के लिए दर-दर भटक रहे हैं जबकि अफसरों की मेहरबानी से अमीर लोग इस फंड से अपना इलाज करा रहे हैं। केजीएमयू में पहुंच वाले व्यक्तियों पर अफसर मेहरबान हैं। स्थिति यह है कि चहेतों के लिए गरीबों के लिए जारी विपन्न श्रेणी का बजट भी खर्च करने में अफसर संकोच नहीं कर रहे हैं। यह हाल तब है जब बजट का रोना रोकर गरीबों को इलाज के लिए महीनों दौड़ाया जाता है। गौरतलब है कि केजीएमयू में हर वर्ष गरीबों के इलाज के लिए सरकार सात से आठ करोड़ रुपये का बजट जारी करती है। इसमें गत वर्ष विपन्न व बीपीएल के तहत करीब दो करोड़ रुपये खर्च किए गए। केजीएमयू में असाध्य रोग, बीपीएल, विपन्न श्रेणी में करीब चार से पांच हजार मरीजों का हर वर्ष इलाज किया जाता है। इसमें असाध्य रोग का पर्चा, बीपीएल कार्ड व आय प्रमाणपत्र लगाया जाता है। मगर विपन्न श्रेणी का इलाज अफसर व डॉक्टरों की मेहरबानी पर है। ऐसे में विपन्न श्रेणी में अफसर करीबियों, वीवीआईपी व पहुंच वाले व्यक्तियों को भी मुफ्त इलाज मुहैया कराने में संकोच नहीं करते हैं। यह स्थिति तब है जब प्रदेश सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने और आम आदमी तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने का निर्देश जारी किया। ऐसा नहीं है कि केजीएमयू प्रशासन इससे अनजान है। सारा खेल बड़े अफसरों को पता है। बावजूद आज तक इस मामले पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। हालांकि मुद्दा उठने पर जांच कमेटी जरूरी बना दी गई है। लेकिन इस जांच कमेटी पर भी सवाल उठने लगे हैं। गौरतलब है कि केजीएमयू में प्रदेश की राजधानी लखनऊ व अन्य जिलों से इलाज के लिए सैकड़ों लोग पहुंचते हैं। इसमें काफी संख्या में गरीब होते हैं। वे गंभीर रोगों पर खर्च होने वाली धनराशि को वहन करने की स्थिति में नहीं होते हैं। ऐसे में वे सरकार की मदद के भरोसे रहते हैं। लेकिन अफसरों के साथ मिलीभगत कर उनके हक पर भी डाका डाला जा रहा है। लिहाजा कई मरीज अपना घर, जमीन बेचकर इलाज कराने पर मजबूर हैं।

8 करोड़ रुपये का बजट सरकार जारी करती है  केजीएमयू को हर वर्ष गरीबों के इलाज के लिए

2 करोड़ रुपये खर्च किए गए। गत वर्ष विपन्न व बीपीएल श्रेणी के तहत

5 हजार मरीजों का हर वर्ष इलाज किया जाता है। असाध्य रोग, बीपीएल, विपन्न श्रेणी में

इनकी मेहरबानी पर मिलता है इलाज

विपन्न श्रेणी में ऐसे मरीजों को मुफ्त इलाज मुहैया कराया जाता है, जिनके पास गरीबी रेखा में दर्शाने का कोई प्रमाण पत्र नहीं होता है। मरीजों की आर्थिक स्थिति देखते हुए इलाज कर रहे डॉक्टर, विभागाध्यक्ष, सीएमएस, एमएस व कुलपति मुफ्त इलाज के लिए मंजूरी देते हैं। इसमें 50 हजार से एक लाख तक का इलाज सीएमएस व एमएस के हस्ताक्षर पर मिलता है। इससे अधिक के लिए कुलपति की संस्तुति जरूरी है। लेकिन गरीबों के हक को भी मारा जा रहा है। कुछ अधिकारी अपने चहेतों को इसका लाभ दे रहे हैं।

सवालों के घेरे में स्क्रीनिंग

पात्र-अपात्र की स्क्रीनिंग कमेटी हवा हवाई साबित हो रही है। जिन लोगों ने मुफ्त इलाज की फाइलें पास की हैं, वही अफसर कमेटी में शामिल हैं। ऐसे में फाइलों की स्क्रीनिंग सवालों के घेरे में है।

पात्रों की स्क्रीनिंग करने का आदेश दिया गया है। इसके लिए ट्रॉमा सेंटर के सीएमएस डॉ. यूबी मिश्रा, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. विजय कुमार व डॉ. यूएस पाल की कमेटी बनाई गई है। यह कमेटी पात्र व अपात्रों की  जांच करेगी। विपन्न श्रेणी की फाइलों के वेरीफिकेशन के निर्देश दिए गए हैं।
-मो. जमा,
वित्त नियंत्रक, केजीएमयू

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.