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सुमेरु प्रोजेक्ट में अरबों का खेल!

  • सैकड़ो करोड़ के हाउसिंग प्रोजेक्ट पर उठ रही है अंगुलियां
  • सरकार भी आ रही शक के दायरे में
  • सुप्रीम कोर्ट ने किया केस मंजूर
  • एमडीडीए जिला प्रशासन व सिंचाई महकमे ने किया खेल!

चेतंग गुरुंग

देहरादून से जब आप चंडीगढ़ और शिमला की ओर रुख करते हैं तो रास्ते में खेतों और नदी को पार करते हुए जाना पड़ता है। बड़ोवाला और उससे जुड़े कई गांव बीच में पड़ते हैं। कभी यहां की जमीन को कोई मुफ्त में भी लेना नहीं चाहता था। उत्तराखंड बनने के बाद तस्वीर बदली। आज भले रियल एस्टेट बाजार धड़ाम कहा जाता है, लेकिन यहां जमीन की कीमत बढ़ती ही जा रही है। शहर में जो लोग जमीन बहुत महंगी होने के कारण अपना ही आशियाना नहीं बना पा रहे, वे यहां का रुख कर रहे हैं। बाजार का मूड देखा और सुमेरु इंफ्रास्ट्रक्चर ने यहां अपना प्रोजेक्ट खड़ा कर दिया। इसमें खास बात यह है कि जिस जमीन पर प्रोजेक्ट खड़ा है, उसके स्टेट्स को लेकर गहरे आरोप लग रहे हैं। आरोप है कि प्रोजेक्ट नदी पर और सरकारी जमीन पर खड़ा है। सुमेरु वाले इस मामले को हाईकोर्ट में जीत गए लेकिन अब मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया है। इससे उनकी मुसीबतें कम होने का नाम लेती नहीं दिखाई दे रही हैं।

नदी पर न तो कोई निर्माण हो सकता है न ही इसके लैंड यूज को बदला ही जा सकता है, जिन सात खसरा नंबरों पर यह प्रोजेक्ट खड़ा है उनमें से बड़ा हिस्सा नदी का है। सुमेरु वालों ने नदी के 80 बीघे की जमीन को 50 बीघा दिखाने की कोशिश की है, लेकिन वे नदी क्षेत्र में निर्माण पर घिरे हुए हैं। ये प्रोजेक्ट तकरीबन बन चुका है। सामान्य तौर पर इस प्रोजेक्ट को 500 करोड़ का बताया जाता है, लेकिन हकीकत में यह इससे ज्यादा का समझा जा रहा है। सुमेरु वालों पर आरोप है कि उन्होंने पहले तो नदी की जमीन पर पट्टे बंटवा डाले, जो मुमकिन नहीं है। फिर वे पट्टे ही खुद ले लिए। कैसे लिए, ये जांच का विषय है। फिर उस जमीन पर निर्माण कर लिया। प्रोजेक्ट से जुड़ी जमीन के बारे में सुप्रीम कोर्ट बोल चुका है। नदी और पोखरों का लैंड यूज बदला नहीं जा सकता। 1950 का जमींदार एक्ट पढऩा होगा। जगपाल सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब मामले में तो जमीन का आवंटन निरस्त ही कर दिया था। सर्वोच्च अदालत ने बोल दिया था जलमग्न जमीन का लैंड यूज बदल नहीं सकते।
इस मामले में मालिकों में राजीव जैन का नाम भी उछल रहा है। हालांकि, उन्होंने इस बात से इनकार किया। उनका कहना है कि उनका या उनकी पत्नी का प्रोजेक्ट से कोई लेना देना नहीं है। ताज्जुब है कि कंपनी में अपना नाम होने पर भी उन्होंने अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है। इस बाबत मसूरी देहरा विकास प्राधिकरण और सिंचाई महकमे के साथ ही जिला प्रशासन की भूमिका पर भी जम कर अंगुली उठ रही। प्राधिकरण ने आखिर कैसे नक्शा पास कर दिया। खसरा नंबर कुल सात थे। नक्शा सिर्फ तीन में पास किया। बाकी चार नंबर बीच में हैं। इस पर राजस्व महकमे की रिपोर्ट आई। उसने बताया भी। ऐसा सूत्र बताते हैं। मामला उछलने पर प्राधिकरण ने जांच तो बिठाई, लेकिन उसकी रिपोर्ट पर आज तक कुछ नहीं हुआ है।
जांच को लेकर शक जताया जा रहा है। इसकी वजह है। जिस सचिव के रहते प्रोजेक्ट का नक्शा पास हुआ। उसने ही जांच भी बिठाई थी। अब ऐसे में रिपोर्ट ईमानदारी से तैयार होगी, कोई मान नहीं रहा है। सिंचाई महकमे की लापरवाही भी गजब की रही। नदी उसके अधिकार क्षेत्र का मामला है। प्रोजेक्ट का बहुत बड़ा हिस्सा नदी में है। इतना ही नहीं नदी पर एक किलोमीटर से ज्यादा लम्बा पुश्ता बना हुआ है, जिसकी ऊंचाई भी सवा मीटर के करीब होगी। यह कैसे मुमकिन है कि सिंचाई महकमे को हवा नहीं लगी कि कब पुश्ता बन गया। इतना तो तय है कि इतना खर्च कर के पुश्ता वही बनेगा, जिसको करोड़ों का फायदा हो रहा होगा। सिंचाई महकमे से पूछा जा सकता है कि पुश्ते के निर्माण को लेकर उसने क्या कदम उठाए। क्यों उसको भनक नहीं लगी। इतना लम्बा पुश्ता बन जाने के बावजूद।
जिला प्रशासन ने भी इस मामले में जांच कराई थी। इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। सूत्र बताते हैं कि उसको भी यह पता नहीं चल पाया कि पुश्ता किसने बनाया। हैरानी इस बात पर है कि यह कोई मुश्किल काम नहीं था। ईमानदारी और थोड़ी सी मेहनत से जांच करते तो पता चल जाता। आखिर कोई हफ्ते भर में थोड़े न बन सकता है इतना बड़ा पुश्ता। हजारों लोगों ने देखा होगा। गांव वाले और वहां के प्रधान बता देते। फिर भी पता नहीं चला कहना साजिश की और इशारा करता है। खनन महकमे को भी बख्शा नहीं जा सकता। नदी में पुश्ते का निर्माण हुआ तो रेत-बजरी भी वहीं से निकाली गई। मोटा सा अनुमान कहता है कि करोड़ों का चूना सरकार को लगाया गया। अवैध खनन से। फिर भी सुमेरु वालों का बाल भी बांका नहीं हुआ। सूत्रों के अनुसार पहले तो कांग्रेस की सरकार थी। इसलिए सुमेरु वालों का कुछ बिगड़ा नहीं। ऐसा इसलिए कि प्रोजेक्ट से जुड़े राजीव जैन तब हरीश रावत के खासमखास थे। रावत मुख्यमंत्री थे।
हैरानी इसलिए ज्यादा हो रही कि अब बीजेपी की सरकार है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की प्रतिष्ठा भ्रष्टाचार के कट्टर विरोधी की है। वह भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टालरेंस की बात करते हैं। उन्होंने एक्साइज पॉलिसी और मेडिकल फीस पॉलिसी में बदलाव कर सन्देश दिया कि वह गलत फैसलों को तत्काल पलटने में हिचकेंगे नहीं। अगर उसमें कुछ गड़बड़ी की बू आती है। इतना ही नहीं उन्होंने तीन जिला आबकारी अधिकारियों को मुअत्तल भी कर दिया। इन अफसरों पर कई तरह के गंभीर आरोप लगे हुए थे। ऐसा तब हुआ जब ये अफसर बहुत रसूख वाले समझे जाते हैं। सुमेरु इन्फ्रा वाले मामले में कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री को अभी तक हकीकत के बारे में बताया नहीं गया है।
इस मामले में मुख्यमंत्री सचिवालय में मौजूद एक शख्स पर अंगुली उठाई जा रही है। फुसफुसाहट है कि वह सुमेरु प्रोजेक्ट के रहनुमाओं को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। उनके कारण ही सरकार ने अभी तक प्रोजेक्ट के खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। अब जबकि मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है तो उम्मीद की जा रही है कि सरकार फटाफट इस मामले में ठोस कदम उठाएगी। ऐसा होता है तो उसको सर्वोच्च अदालत में अपमानजनक हालात का सामना करना नहीं पड़ेगा। फजीहत से भी बचेगी।

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