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कौन बना रहा शिक्षण संस्थाओं को सियासी अखाड़ा

  • पहले जेएनयू फिर बीएचयू और अब एएमयू को सुलगाने की साजिश
  • सत्ता के लिए धर्मनिरपेक्षता और गंगा-जमुनी तहजीब को खत्म करने की कोशिश

संजय शर्मा

लखनऊ। पहले जेएनयू फिर बीएचयू और अब एएमयू यानी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को सियासी अखाड़ा बना दिया गया है। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मोहम्मद अली जिन्ना की खामोश टंगी एक तस्वीर ने बवाल करा दिया है। इस तस्वीर को हटाने को लेकर सियासत को गरमाने की भरपूर कोशिश की जा रही है और यह सफल होती भी दिख रही है। पहले जिन्ना के कारण देश का विभाजन हुआ और अब उनकी तस्वीर के बहाने सांप्रदायिकता का जहर घोला जा रहा है। धरना-प्रदर्शन, हठधर्मिता और बयानबाजी जारी है। आग में घी डालने की लगातार कोशिशें की जा रही हैं। सवाल यह है कि संवेदनशील मुद्दों को लेकर शिक्षण संस्थाओं को सियासी अखाड़ा बनाने की कोशिश कौन और क्यों कर रहा है? क्या सत्ता के लिए देश की धर्मनिरपेक्षता और गंगा-जमुनी तहजीब का गला घोंटने की कोशिश हो रही है। यदि ऐसा है तो यह बड़ा महंगा साबित होगा।

पिछले कुछ सालों से देश के बड़े और नामचीन शिक्षण संस्थाओं को निशाने पर लिया जा रहा है। इन संस्थानों को सियासत का अखाड़ा बनाया जा रहा है। शुरुआत जेएनयू से हुई। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में अफजल गुरू की बरसी पर कार्यक्रम रखा गया। कार्यक्रम में कश्मीर की आजादी और देश विरोधी नारे लगाए गए। इसका मास्टर माइंड उमर खालिद को बताया गया। कई वीडियो वायरल हुए। इस वीडियो में अफजल तेरे खून से इंकलाब आएगा, भारत तेरे टुकड़े-टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह, इंडिया गो बैक, गोबैक कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी, भारत की बरबादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी जैसे नारे लगाए गए। इस मामले में छात्रनेता कन्हैया कुमार को भी गिरफ्तार किया गया। बाद में कांग्रेस, भाजपा और वामपंथी सभी ने इसे अपने-अपने तरीके से भुनाने की कोशिश की। विभिन्न छात्र संगठनों, शिक्षक संघ और कर्मचारी यूनियन के नेताओं ने जेएनयू के छात्रों के साथ एकजुटता का प्रदर्शन किया। पूरा परिसर सियासी अखाड़ा बन गया और पुलिस के बूटों की आवाजें यहां कई दिनों तक गूंजती रहीं। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजकर मांग की कि भारत के विश्वविद्यालयों में समस्या पैदा करने में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से संबंद्ध संगठनों की भूमिका की जांच हो। इसके कुछ महीने बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में छेड़छाड़ के मामले को लेकर छात्राओं ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया। कुछ दिन बाद ही इस आंदोलन को बाहरी तत्वों ने हाईजैक कर लिया। देखते-देखते आंदोलन हिंसक हो गया। पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। हालांकि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी ने इस हंगामे को विश्वविद्यालय को बदनाम करने की साजिश करार दिया। उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा। खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मामले में वाराणसी मंडल के आयुक्त से रिपोर्ट मांगी। तब तक इस मामले को कुछ दलों और अन्य विश्वविद्यालय से आए विभिन्न विचारधाराओं के लोगों ने जमकर हवा दी। बाद में आई रिपोर्ट ने इसकी पुष्टिï की है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी समेत विभिन्न दलों ने केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, बीएचयू में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का भाजपा वाला रूप। बनारस के कमिश्नर नितिन गोकर्ण ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि बीएचयू परिसर में छात्राओं के साथ हुई छेडख़ानी के विरोध में शुरू हुए उनके धरना-प्रदर्शन को कुछ घंटे बाद राजनीतिक दलों और नकारात्मक गुट के लोगों ने हाइजैक कर लिया था। खुफिया रिपोर्ट के अनुसार जेएनयू प्रकरण की तरह ही बीएचयू को भी सुलगाने की कोशिश की गई और विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी लापरवाही से इसे बढऩे दिया। आंदोलन में शरीक छात्राओं ने भी माना कि इस आंदोलन को बाहरी लोगों ने हाईजैक कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकीं। अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय निशाने पर है। यहां मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को लेकर घमासान मचा है। जिन्ना की तस्वीर को लेकर यहां भारत-पाकिस्तान की सीमा सा तनाव दिख रहा है। विवाद की शुरुआत भाजपा सांसद सतीश गौतम की ओर से कुलपति को लिखे खत से हुई। खत में लिखा गया था कि जिसने भारत का विभाजन करवाया, उस जिन्ना की तस्वीर यूनिवर्सिटी में क्यों लगी रहे। इस पर हिंदुत्व की दुहाई देने वाले संगठनों ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। छात्र संघ और हिंदू संगठनों के बीच हिंसक झड़प हुईं। जिन्ना का पुतला भी फूंका गया। इसी दौरान पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी का कार्यक्रम था, जिसे रद्द करना पड़ा। छात्रों का कहना है कि जिन्ना भारतीय इतिहास का हिस्सा हैं। लेकिन हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता और अन्य संगठन जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग करते हुए लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। सियासत गर्म हो रही है।कांग्रेस के पूर्व सांसद चौधरी बिजेंद्र सिंह जिन्ना की तस्वीर लगाने के पक्ष में उतर आए हैं। उन्होंने जिन्ना को महान क्रांतिकारियों की सूची में शामिल कर दिय। दूसरी भाजपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने जिन्ना को महापुरुष करार देकर इस विवाद को और हवा दे दी। सपा सांसद प्रवीण निषाद ने जिन्ना की तुलना गांधी और नेहरू से की। कुल मिलाकर सच यह है कि जो जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग कर रहे हैं, वे वहीं कर रहे हैं जो जिन्ना चाहते थे। उनकी विचारधारा चाहती थी? जिन्ना चाहते थे कि हिंदुस्तान दो हिस्सों में बंट जाए, एक मुसलमानों का देश हो और दूसरा हिंदुओं का राष्ट्र। देश बंटा, लेकिन हिंदुस्तान ने जिन्ना को नकार दिया था। भारत विभाजन के खिलाफ हिंदू ही नहीं थे, बल्कि बड़ी तादाद में मुसलमान भी थे और जिन्ना उसके अकेले गुनहगार नहीं थे, बहुत हद तक कांग्रेस भी थी और वे हिंदूवादी नेता तो थे ही जो अलग हिंदू राष्ट्र का सपना देखते थे। लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर के खिलाफ खड़े लोग गोडसे को पूजते हैं, उसकी मूर्ति लगाना देशद्रोह का काम नहीं मानते हैं। जाहिर है जिन्ना के नाम पर समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोलने की कोशिश की जा रही है। सबसे खराब बात यह है कि इसके लिए एक शिक्षण संस्थान को अखाड़ा बनाया गया। सरकार चाहती तो इस तस्वीर को एक सकुर्लर से हटवा सकती थी। लेकिन ऐसा करने से सियासी समीकरण नहीं सधते। वोटबैंक का मामला है। लेकिन ऐसा वोट हिंदुस्तान को महंगा पड़ेगा।

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