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शूटिंग को समर्पित

ह शायद 1993 की बात है। नारायण सिंह राणा पहली बार मिले थे। अपने भोले-भाले चेहरे वाले बेटे के साथ। देहरादून की बात है। तब तक वह राष्ट्रीय चैम्पियन बन चुका था। पिस्तौल निशानेबाजी में। राणा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा था-जस्सू ओलंपिक और विश्व कप में मेडल जीत सकता है चेतन जी..जस्सू खामोश खड़ा रहा। अगले साल हिरोशिमा में एशियाई खेल हुए। जस्सू भारतीय टीम में था। क्या शानदार आगाज था। उस शानदार किशोर का, जो जवानी की दहलीज पर कदम रख ही रहा था। वह स्वर्ण पदक जीतने में सफल रहा था। देहरादून में उसका जबरदस्त स्वागत हुआ। जब हिरोशिमा से लौटा।

मीडो ग्रैंड होटल जो राजपुर रोड पर है, ऐन आज के आनंदम रेस्टोरेंट के सामने कमरे में हमारी मुलाकात हुई। नारायण सिंह और जसपाल सिंह राणा बहुत खुश थे। मुझे देख कर गले लगे नारायण सिंह। बोले-चेतन जी, मंजिल अभी और है। वैसे उसी साल मिलान (इटली) में जूनियर वल्र्ड कप में जसपाल ने वल्र्ड रिकॉर्ड बनाते हुए स्वर्ण जीता था। जसपाल ने इसके बाद भी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अनेक पदक जीते। सैकड़ों। वह कुछ मूडी भी हैं। सिस्टम की खामियों के खिलाफ विद्रोही होने में देर नहीं करते हैं। ऐसा मौका भी आया, जब जसपाल शानदार फॉर्म में होने के बावजूद शूटिंग से कट गए। पिस्तौल छोड़ दी। फिर मूड बना। वापसी की। और क्या शानदार वापसी की। 2006 में। दोहा एशियाई खेलों में फिर दो स्वर्ण पदक जीतकर। उसके बाद फिर इस खेल से उनका मन उचट सा गया। खेलों में सियासत से वह गुस्सा हो गए। एक किस्म से। सो खुद ही सियासत में आ गए। 2009 में बीजेपी की तरफ से उत्तराखंड में टिहरी लोकसभा सीट पर उतरे। कांग्रेस के विजय बहुगुणा को कड़ी टक्कर दी, पर पराजय नहीं रोक पाए। बाद में बीजेपी से भी मन भर गया। कांग्रेस में चले गए। नारायण सिंह आज भी बीजेपी में हैं। पिछले लम्बे समय से जसपाल भारतीय जूनियर शूटिंग टीम के प्रशिक्षक हैं। सीनियर टीम की बजाए जूनियर खिलाडिय़ों को तराशने में उनकी दिलचस्पी है।

जसपाल अकेले निशानेबाज नहीं हैं। परिवार में। उनके छोटे सुभाष और बहन सुषमा के साथ ही पत्नी रीना भी निशानेबाज रही हैं। उन्होंने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में देश का प्रतिनिधित्व किया। अब बेटी देवांशी ने परिवार की परंपरा को कामयाबी के साथ संभालने का काम शुरू कर दिया है। सिडनी के जूनियर विश्व कप प्रतियोगिता में देवांशी ने स्वर्ण समेत दो पदक जीतने में सफलता पाई। वह अभी मात्र 17 साल की है। दो साल पहले ही गंभीरता से निशानेबाजी शुरू की है। पढ़ाई पर भी बराबर ध्यान दे रही है। खुद नारायण सिंह बेहतरीन निशानेबाज रहे हैं। कभी वह आईटीबीपी में कमांडो थे। राजीव गांधी की निजी सुरक्षा टीम के अंग होते थे। उन्होंने बच्चों को मुकाम दिलाने के लिए बहुत तपस्या की है।

वह बताते हैं कि आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी। खास तौर पर निशानेबाजी जैसे महंगे खेल का खर्च उठा पाना बहुत मुश्किल था। पिस्तौल न होने के कारण वह हाथों में ईंट रख कर बच्चों को संतुलन कायम रखने का अभ्यास करते थे। जसपाल ने जिस तरह खेलों में नाम कमाया उसका फायदा नारायण सिंह को बाद में मिला। पहले वह विधान परिषद सदस्य बने। फिर जब 2000 में उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया तो वह नित्यानंद स्वामी की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार में खेल राज्यमंत्री बने थे। उसके बाद से वह सियासत में तो हैं, लेकिन अपने पहले प्यार शूटिंग और गांव चिलामु की परम्पराओं को नहीं भूले। शूटिंग के दौरान ही सुषमा और आज के गृह मंत्री और पहले के बीजेपी अध्यक्ष तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके राजनाथ सिंह के बेटे पंकज मिले। दोनों ने एक-दूसरे को पसंद किया। फिर शादी हुई। आज सुषमा के दो बच्चे हैं। सुषमा और पंकज अपनी बेटी को वेल्हम गल्र्स स्कूल में प्रवेश दिलाना चाहते हैं।
बहुत दिनों बाद अभी रीना मिलीं तो बहुत खुशी हुई। बेटी देवांशी के साथ। उत्तराखंड प्रेस क्लब में देवांशी का सम्मान समारोह था। मैंने देवांशी को रीना की गोद में देखा था। उसके बाद सीधे जूनियर वल्र्ड चैंपियन बनने पर। रीना को देख के नहीं लगता कि वह जवान होती बेटी और किशोर बेटे की मां है। रीना बहुत व्यस्त रहती है। काम में। इसके बावजूद शूटिंग के लिए वह वक्त जरूर निकाल लेती है। राणा परिवार के किसी भी सदस्य से आप मिलें तो आपको लगेगा ही नहीं कि आप ऐसे परिवार के लोगों से मिल रहे हैं, जिसने देश में निशानेबाजी को लोकप्रियता प्रदान की। मीडिया का ध्यान क्रिकेट के साथ ही निशानेबाजी की ओर भी खींचा।

एक दौर वह था जब खेल पत्रिकाओं और अखबारों के पहले पन्ने पर जसपाल की हाथों में पिस्तौल लिए फोटो छपती थी। क्रिकेटर से कम लोकप्रिय नहीं था वह।

जसपाल सिद्धांतवादी है। यह कह सकते हैं। इसके चलते शूटिंग फेडरेशन और सरकार तक से टकराने से नहीं चूके। वह ओएनजीसी में मोटी तनख्वाह की नौकरी छोडक़र सियासत में आए थे। जब चुनाव में हार हुई तो ओएनजीसी ने उनको फिर से नौकरी में आने की पेशकश की थी। वह नहीं गए। एक बार छोड़ दी तो छोड़ दी। एक बार हैदराबाद में नेशनल गेम्स हो रहे थे। आंध्र सरकार ने हर खिलाड़ी को 10 लाख रूपये एक स्वर्ण पदक के बदले देने का एलान किया था। देश के कई बड़े खिलाड़ी आंध्र से खेले। जसपाल को भी विशेष पेशकश की गई। उन्होंने मना कर दिया। कहा कि अपने ही राज्य से खेलूंगा। उत्तराखंड से। उस गेम्स में जसपाल ने शायद छह स्वर्ण पदक जीते। सोचिये आज से 10-12 साल पहले 60 लाख रूपये मिलते। उत्तराखंड सरकार ने जो दिया वह तो ऊंट के मुंह में जीरा जैसा था। फिर भी जसपाल लालच में नहीं डिगे।
आज भी जसपाल निशानेबाजी से खुद तो जुड़े ही हैं, अपनी कुर्सी बेटी को सौंप दी है। खानदानी परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदार अब
खूबसूरत चंचल बेटी निभाने में जुट गई है। शिद्दत के साथ।

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