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देर हो गई दुरुस्त हो तो बात बने

  • कमाई के लिए छोड़ रहे घर-बार
  • सरहदी गावों का खाली होना सुरक्षा के लिहाज से घातक
  • पलायन पर सरकारी रिपोर्ट पेश करती है चिंताजनक तस्वीर
  • पहाड़ में ही रोजगार पैदा करेंगे – त्रिवेंद्र

चेतंग गुरुंग

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत खांटी किस्म के पहाड़ी नेता हैं। उनको मुख्यमंत्री बने एक साल से ज्यादा हो चुका है। उनके भीतर कोई ऐसा निजी बदलाव आप नहीं देख सकते हैं, जिसको खास कहा जा सके। वह अभी भी गांवों और पहाड़ की बात ज्यादा करते हैं। पहाड़ के लोगों को लेकर चिंता जताते हैं। यही वजह है कि उन्होंने पलायन आयोग का गठन किया। इंसानों से खाली होते पहाड़ों पर रिपोर्ट तैयार कराई। घर-बार छोड़ गए लोगों को वापस लाने की कोशिश कर रहे हैं। उनको अपनी जमीन से जोडऩे और लौटने के लिए प्रेरित करने तथा इसके लिए माहौल तैयार करने की कमर कस के मेहनत करते दिख रहे हैं। इसमें शक नहीं कि सालों से सभी सरकारें पलायन पर शोर करती रहीं। चिंताएं जताती रहीं, लेकिन इसका इलाज नहीं तलाश पाई। तलाशने की कोशिश भी नहीं की। पलायन आयोग की रिपोर्ट को अगर आधार माने तो सिर्फ उत्तराखंड नहीं बल्कि देश खतरे के मुहाने पर है। रिपोर्ट बताती है कि सरहद पर चीन से सिर्फ पांच किमी की हवाई दूरी वाले गांवों से पलायन तेज हुआ है। इतना ही नहीं यह निरंतर जारी है।

मुख्यमंत्री आवास पर पलायन आयोग की रिपोर्ट जब आधिकारिक तौर पर सरकार को सौंपी गई तो मुख्यमंत्री ने पलायन को रोकने के लिए अपनी योजनाओं का भी काफी खुलासा किया। मसलन, रेडीमेड गारमेंट्स और प्रसाद का कारोबार महिलाओं में शुरु कराना,एलईडी बल्ब का उत्पादन प्रदेश में व्यापक स्तर पर शुरू कराना प्रमुख रूप से शामिल है। उनके मुताबिक जब लोगों को अपने घर और गांव में ही काम-धंधा मिल जाएगा तो वे बाहर जाने और पलायन करने के बारे में जल्दी नहीं सोचेंगे। ये काम ऐसे हैं, जिनमें मुनाफा बहुत है। उन्होंने बताया कि अच्छी किस्म की सस्ती रेडीमेड कमीज बाजार में 150 रूपये की आती है। उसका निर्माण गांव में ही कराने के लिए सरकार योजना लाएगी। उन्होंने पूरा अध्ययन करा लिया है। जालंधर-लुधियाना से। एक साधारण अच्छी कमीज सिर्फ 28 रूपये में तैयार हो जाती है। सरकार कई तरह की ऋण योजनायें चला रही हैं। इन योजनाओं का सहारा ले कर ग्रामीण महिलाएं खास तौर पर गांव में ही अपनी आजीविका चला सकती हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक सबसे ज्यादा 50 फीसदी लोग गांव से सिर्फ आजीविका के लिए शहरों का रुख कर रहे हैं। पलायन आयोग की रिपोर्ट कहती है कि इनमें सबसे ज्यादा तादाद 26 से 35 साल की आयु के हैं। उनका प्रतिशत 42 है। इसके बाद 35 साल से ज्यादा वाले हैं। जो 29 फीसदी हैं। 25 साल से कम उम्र के युवा भी गांव छोड़ रहे हैं। उनकी तादाद 28 फीसदी है। जो कतई कम नहीं कही जा सकती है। इसका मतलब यह हुआ कि गांव और पहाड़ युवाओं के मतलब के नहीं रह गए हैं। जब जवान खून ही पहाड़ में नहीं रहेगा तो प्रदेश और पहाड़ का विकास भला कैसे मुमकिन है। समस्या यह भी है कि पलायन से राज्य में असंतुलन जबरदस्त तरीके से पैदा हुआ है। राज्य से बाहर सिर्फ 30 फीसदी लोग गए हैं। इनमें विदेश जाने वालों की तादाद एक फीसदी ही है। 70 फीसदी लोग देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंह नगर और नैनीताल या फिर कोटद्वार जैसे स्थानों पर चले गए हैं, जो अपेक्षाकृत मैदानी
इलाके हैं।
जब पहाड़ और गांव से इतनी भारी तादाद में लोग शहरों का रुख करेंगे तो असंतुलन उत्पन्न होना स्वाभाविक है। 15 फीसदी लोग पढ़ाई और कुछ फीसदी लोग बेहतर इलाज के चलते पहाड़ छोडक़र नीचे उतरे हैं। इससे शहरों में इंसानी दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया। जमीनें और अन्य वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। दूसरी ओर पहाड़ के गावों में शव को श्मशान भूमि तक ले जाने के लिए चार मजबूत कंधे तक आसानी से नहीं मिल पा रहे हैं। चिंता की बात यह है कि हर सरकार पलायन पर रोना रोती रही, लेकिन इसका समाधान निकालने में रूचि नहीं दिखाया।
क्या यह हैरानी की बात नहीं कि 6338 ग्राम पंचायतों से सिर्फ 10 सालों में 3,83,726 लोग गांवों से पलायन कर गए। इसमें दो राय नहीं कि अमेरिका और जापान तक में लोग पलायन करते हैं। उनकी वजह रोजगार या बेहतर शिक्षा नहीं होती है। ये तो उनके लिए कोई मुद्दा ही नहीं है। ये उनके जिंदगी जीने का अंदाज का हिस्सा है। 2011 की जनगणना को आधार बनाएं तो 734 राजस्व ग्राम, तोक और मजरा श्मशानी सन्नाटे से गुजर रहे हैं। यहां कोई लोग अब नहीं रहते हैं। 14 गांव ऐसे हैं जो विदेशी सीमा से सिर्फ पांच किमी हवाई दूरी पर हैं। सरहद पर लोगों का बसना कितना अहम होता है, यह इससे जाहिर होता है कि 1962 की भारत-चीन जंग के दौरान नेफा (अरुणाचल प्रदेश) में जांबाज फौजी जसवंत सिंह की मदद स्थानीय दो लड़कियों ने की थीं। इस जंग में उत्तराखंड का जसवंत अंतिम सांस तक लड़ते हुए शहीद हो गया था। उनको मृत्युपरांत महावीर चक्र से नवाजा गया था। 1999 के कारगिल युद्ध शुरू होने से पहले भारतीय सेना को स्थानीय चरवाहों ने ही बताया था कि कई लोग हिमाच्छादित पर्वत चोटियों पर हथियारों के साथ घुसपैठ किए हुए हैं। स्थानीय लोग खुफिया रिपोर्ट्स देने का काम भी बखूबी करते हैं।
यह वाकई चिंताजनक बात है कि 565 गांव ऐसे भी हैं, जहां आबादी सिमट के 50 फीसदी रह गई है। ऐसा नहीं है कि सारे के सारे गांव बेकार हैं और रहने लायक नहीं हैं। रिपोर्ट कहती है कि 850 गांव ऐसे हैं जहां बाहर से आकर लोग बसे और अपना भरण-पोषण कर रहे हैं। ये स्थानीय भी हैं और बाहरी भी। मुख्यमंत्री ने कहा कि वह पलायन को रोकने के साथ ही लोगों को वापस गांव लौटने के लिए प्रेरित होने का माहौल उत्पन्न करेंगे। उनको बेहतर चिकित्सा, शिक्षा और रोजगार मुहैया कराने पर काम शुरू कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि पिथौरागढ़ सरीखे दूरस्थ जिलों में भी बेहतरीन चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध करा दी गई हैं।
सरकार ने डॉक्टर्स की कमी दूर करने और चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराने का काम तेजी से किया है। डॉक्टर्स की भर्ती वॉक इन इंटरव्यू के जरिये लगातार की जा रही है। पलायन आयोग ने 7950 गांवों को सर्वेक्षण और शोध में शामिल किया। ग्राम्य विकास विभाग के जरिये इसी साल जनवरी और फरवरी में ये अध्ययन तथा सर्वेक्षण किए गए।

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