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अरबों का चूना लगाने वालों को बचाने का खेल!

  • लटकाई जा रही डीईओ पर चार्जशीट
  • पिक एंड चूज नीति से सरकार पर अंगुली
  • आधा पिक सीजन खत्म पर दुकानें चढ़ी नहीं
  • कोई सस्पेंड तो कोई बड़े मामले में भी बचाए जा रहे 
  • दुकानों के आबंटन पर भी रोल बैक तय
  • फर्जी आंकड़ो से गुमराह करने में जुटे है अफसर

चेतंग गुरुंग

देहरादून। उत्तराखंड में शराब ऐसा महकमा है जो टैक्स के बाद सबसे ज्यादा राजस्व सरकार के खजाने को देता है। शराब का कारोबार करने वाले माफिया भले समझे जाते हों, लेकिन ये भी हकीकत है कि इस धंधे से जुड़े लोग चंद महीनों में ही मोटा मुनाफा कमा लेते हैं। इस मिथ को सरकार की कमजोर और बिना सोचे-समझे लागू की गई आबकारी नीति ने ध्वस्त कर दिया है। आलम यह है कि सरकार के माथे पर शिकन पड़ी हुई है। सौ से ज्यादा दुकानें अनबिकी रह गई हैं। ये इसलिए भी चिंताजनक है कि शराब की बिक्री का असली वक्त अप्रैल, मई और जून माना जाता है। ये शादियों और छुट्टियों के साथ ही पर्यटन का समय भी होता है। इस हिसाब से आधा पीक सीजन खत्म हो चुका है। जब तक बची हुई दुकानें किसी तरह बिक भी जाएंगी, तीन चौथाई पीक सीजन निपट चुका होगा। इस हाल में पहुंचाने के लिए जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई न होने से सरकार पर अंगुली उठ रही है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि सरकार के खासमखास होने के कारण वे अफसर बचाए जा रहे हैं, जिनको मुअत्तल करने के लिए सरकार मजबूर हुई थी, लेकिन अब उनको चार्जशीट देने में जिस तरफ टाल-मटोल की जा रही है, उससे सरकार की नीयत पर शक होना लाजिमी है।

सरकार ने दुकानों को सस्ते में लुटा डालने और ढंग से मॉनिटरिंग न करने के आरोप में देहरादून (मनोज उपाध्याय), हरिद्वार (प्रशांत सिंह) और चम्पावत (राजेन्द्र कुमार) के जिला आबकारी अधिकारियों को मुअत्तल कर दिया था। राजेन्द्र को मुअत्तल करने के फैसले पर भी अंगुली उठी थी। राजेन्द्र को कम राजस्व मिलने के आधार पर मुअत्तल किया गया। उन पर आरोप था कि वह तीन दुकानों को बेच नहीं पाए। हालांकि, दुकानें बिक गई थीं, लेकिन जिलाधिकारी ने कम कीमत मिलने के कारण उसका आवंटन रोक दिया था। राजेन्द्र को मुअत्तल करने के फैसले पर इसलिए सरकार ज्यादा निशाने पर है कि इस मामले में उसने पिक एंड चूज की नीति अपनाई। उधमसिंह नगर में 40 से ज्यादा दुकानें नहीं बिकीं। इसके बावजूद वहां के जिला आबकारी अधिकारी आलोक साह के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया गया।
पिक एंड चूज के कई और मिसालें सामने आ रही हैं। देहरादून में पटेल नगर और विकासनगर इलाके में अवैध शराब पकड़ी गईं। फिर भी संबंधित इंस्पेक्टरों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई। इससे पहले काशीपुर में इससे कहीं छोटे मामले में महिला इंस्पेक्टर विष्णु थापा को मुअत्तल कर दिया गया था। इतना ही नहीं पटेल नगर में जब अवैध गोदाम शराब का पकड़ा गया तो गोदाम के मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया, लेकिन रायवाला में पांच गुणा ज्यादा शराब से भरा अवैध गोदाम पकड़ा गया तो गोदाम मालिक के खिलाफ आबकारी महकमे ने मुकदमा दर्ज नहीं कराया गया।
सूत्रों के मुताबिक पूरा महकमा एक संयुक्त आयुक्त के इशारे पर चल रहा है। आबकारी मंत्री प्रकाश पन्त और अपर मुख्य सचिव डॉ. रणवीर सिंह के संज्ञान में पूरा मामला है। इसके बावजूद तीन मुअत्तल और फिर हाईकोर्ट के आदेश से बहाल जिला आबकारी अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट नहीं हो रही है। ऐसा लग रहा है कि सरकार की कोशिश आरोपियों को दण्डित करने की नहीं, बल्कि उनको किसी किसी तरह राहत देने और मदद करने की है। सचिवालय के अफसर भी मुअत्तल होने के बाद बहाल अफसरों के रंग में डूबे नजर आते हैं। एक निचले स्तर के अफसर ने चार्जशीट में देरी पर पहले तो गोल-मोल जवाब देने की कोशिश की, लेकिन जब उनसे पूछा गया कि किसके स्तर पर चार्जशीट की फाइल रुकी है, क्योंकि अपर मुख्य सचिव भी फाइल न मिलने की बात कर रहे हैं, जबकि आबकारी आयुक्त षणमुगम कभी की फाइल शासन में कार्रवाई के लिए भेज चुके हैं, तब उन्होंने स्वीकार किया कि फाइल उनके ही पास है।
इसकी वजह जो बताई वह सरकार की अज्ञानता या फिर दागी अफसरों संग मिलीभगत को जाहिर करने के लिए काफी है। उस अफसर के मुताबिक चार्जशीट में साक्ष्य नहीं थे। आयुक्त कार्यालय, जिसने चार्जशीट तैयार की और मंजूरी के लिए शासन को भेजा, के मुताबिक आरोप ठोस हैं और इसको गलत साबित करने की जिम्मेदारी मुअत्तल अफसरों की है।
सरकार पर वैसे भी दागी अफसरों को बचाने की साजिश रचने का आरोप तैर रहा है। सरकार की तरफ से लचर पैरवी के कारण ही मुअत्तल होने के बाद हाई कोर्ट गए जिला आबकारी अधिकारियों को स्टे मिल गया। हाईकोर्ट ने बहाल करने का आदेश दिया, लेकिन यह सरकार का विशेषाधिकार होता है कि किसको कब और कहां तथा कब तक कुर्सी पर बनाए रखना है। विशेषज्ञों के मुताबिक हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने तीनों को पुराने पदों पर बहाल कर दिया है। आज्ञा पालन के बाद अब सरकार को उन्हें हटा देना चाहिए। दिलचस्प बात ये भी है कि चम्पावत के जिला आबकारी अधिकारी राजेन्द्र ने अभी तक न तो ड्यूटी ज्वाइन की है, न ही वह अब जिला आबकारी अधिकारी बनने के इच्छुक हैं। उन्होंने सरकार को लिखित में अपने इच्छा दे दी है। वह अपनी मुअत्तली के खिलाफ हाईकोर्ट भी नहीं गए थे। सूत्रों के अनुसार उनको मुअत्तल किया ही साजिश के अंतर्गत किया गया था। देहरादून और हरिद्वार के जिला आबकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के इतने सशक्त साक्ष्य थे कि उनको हाईकोर्ट में स्टे शायद ही मिल पाता। मुअत्तल अफसरों की सूची में राजेन्द्र को भी शामिल कर दिए जाने और तीनों मामलों की फाइल एक ही होने के कारण कोर्ट में राजेन्द्र के कारण उपाध्याय और प्रशांत को भी फायदा मिल गया।
सरकार ने इस साल 2550 करोड़ रूपये का राजस्व शराब से हासिल करने का लक्ष्य बनाया तो है, लेकिन यह मुमकिन नहीं दिख रहा। ऐसा लग रहा है कि ई-टेंडर को अपनाने का फैसला सरकार पर भारी पड़ गया है। इस नीति को अपनाने की वजह शराब की दुनिया के बादशाह पोंटी चड्ढा ग्रुप को फायदा दिलाने की कोशिश समझी जा रही थी, लेकिन रोल बैक हो गया। जिससे चड्ढा ग्रुप ने उत्तराखंड में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। इसके बाद अब सरकार के लिए भारी तादाद में अनबिकी रह गईं दुकानों को बेचने के लिए एक और रोल बैक करना ही पड़ेगा। यह तय लग रहा है। मंत्री पन्त ने कहा भी है कि पहले आओ, पहले पाओ में भी दुकानें न बिकें तो फिर एक्साइज ड्यूटी कम करके दुकानें बेचीं जायेंगीं। ऐसा हुआ तो सरकार को एक और विरोध झेलना पड़ेगा। जो महंगे अधिभार देकर दुकान खरीद चुके लोगों की तरफ से पेश आएगी। दूसरी ओर महकमे के अफसर सरकार को गुमराह कर रहे हैं कि तय लक्ष्य तो हासिल हो चुका है। जो पूरी तरह गलत है। अभी दुकानों की बैंक गारंटी भी नहीं आई हैं। ये भी अपने आप में बहुत बड़ा घोटाला है। पिछले साल बैंक गारंटी घोटाले से ही शराब महकमे में हंगामे की शुरुआत हुई थी। सरकार ने इससे अभी भी लगता है कोई सीख या सबक
नहीं लिया है।

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