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कर्नाटक के अखाड़े से दिल्ली पर दांव

  • विपक्ष के सामने सबसे बड़ा सवाल, मोदी का विकल्प कौन
  • एकजुट होकर भाजपा को सत्ता से बाहर करने की तैयारी

संजय शर्मा

कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमार स्वामी ने शायद ही इस बात की कल्पना की होगी कि उनके शपथ ग्रहण समारोह में तमाम सियासी दलों के क्षत्रप एक मंच पर नजर आएंगे, लेकिन ऐसा हुआ। लाइट, ऐक्शन और कैमरा के बीच दुनिया भर ने विरोधी विचारधाराओं के दिग्गजों को मंच पर गलबहियां करते देखा। गुफ्तगूं करते सुना और एकजुटता का प्रदर्शन करते भी देखा। एक-दूसरे के धुर विरोधी दिग्गज यहां भाजपा के विरोध में एकजुट हुए थे। वे कर्नाटक के अखाड़े से अपने सबसे बड़े सियासी प्रतिद्वंद्वी मोदी को चित करने का उद्घोष कर रहे थे। राज्यों और लोकसभा चुनाव में शिकस्त पाने के बाद सभी दल यह समझ चुके हैं कि बिना महागठबंधन के दिल्ली पर दांव नहीं खेला जा सकता है। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मंच पर दिखने वाली यह एकजुटता हकीकत में बदल पाएगी? क्या विपक्षी दल किसी सर्वमान्य नेता को अपना नेतृत्व सौंपेंगे या फिर कर्नाटक का इतिहास दिल्ली में भी दोहराने की कोशिश करेंगे?..राजनीति संभावनाओं का खेल है और यह कर्नाटक में भी दिखी। जदएस के नेता कुमार स्वामी कांग्रेस के समर्थन से कर्र्नाटक में सरकार बनाने में सफल रहे। लेकिन उनका शपथ ग्रहण समारोह सियासी दिग्गजों के जमघट के कारण यादगार बना। समारोह में बसपा प्रमुख मायावती, सपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, रालोद नेता अजित सिंह के अलावा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, लोकतांत्रिक जनता दल के नेता शरद यादव, जेवीएम नेता बाबूलाल मरांडी, एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव मौजूद थे। इस समारोह में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी भी पूरी चमक-दमक के साथ मौजूद थीं। दरअसल, यह जमावड़ा कर्नाटक फॉर्मूले से अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर करने की रणनीति के तहत लगा था। चुनाव में हाथ से सत्ता फिसलने के बावजूद जिस तरह कांग्रेस ने जेडीएस को समर्थन देकर सत्ता में पिछले दरवाजे से प्रवेश किया, वह बेहद अहम है। 104 सीटों के साथ भाजपा ने यहां सरकार बनाई लेकिन येदियुरप्पा बहुमत साबित नहीं कर पाए और सरकार गिर गई। कर्नाटक में चले सियासी दांव की सफलता के बाद कांग्रेस इस फॉर्मूले को देश भर में आजमाने की तैयारी कर रही है। जिन राज्यों में कांग्रेस का जनाधार नहीं है, वहां वह क्षेत्रीय क्षत्रपों की पिछलग्गू बनकर मोदी विरोधी मुहिम को ताकत देना चाहती है। कांग्रेस को लग रहा है कि क्षेत्रीय दलों की बादशाहत को स्वीकार कर मोदी विरोधी गठबंधन को बड़ा किया जा सकता है। इस फॉर्मूले को यूपी में भी लागू करने की तैयारी है। मंच पर सपा और बसपा नेताओं की उपस्थिति ने भविष्य की राजनीति का संकेत दे दिया है। अखिलेश यादव और मायावती को पता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को रोकना है तो मिलकर लडऩा होगा। गोरखपुर और फूलपुर के लोकसभा के उपचुनाव में बसपा के समर्थन से सपा ने यह कर भी दिखाया है। दोनों सीटों पर भाजपा को जबरदस्त शिकस्त मिली है। बिहार में आरजेडी के साथ कांग्रेस का गठबंधन है। बावजूद इसके कई राज्यों में गठबंधन बनाना आसान नहीं होगा। आंध्र प्रदेश में टीडीपी के साथ कांग्रेस की सीधी लड़ाई है। चंद्रबाबू नायडू गैर-कांग्रेसी राजनीति करते रहे हैं। ऐसे में उनका कांग्रेस से हाथ मिलाना मुश्किल लग रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कांग्रेस और सीपीएम दोनों के खिलाफ चुनाव लड़ती रही हैं। ममता मोदी विरोध की बात तो करती हैं लेकिन सीपीएम और कांग्रेस के साथ उनके जाने की संभावना नहीं दिख रही है। इसके अलावा ममता बनर्जी खुद गैर कांग्रेसी और गैर भाजपा महागठबंधन तैयार करने में जुटी हुई हैं। पिछले दिनों तीसरे मोर्च के गठन को लेकर तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के साथ उनकी मुलाकात हो चुकी है। इसके अलावा वे सपा मुखिया अखिलेश यादव के साथ भी संपर्क बनाए हुए हैं। जाहिर है, महागठबंधन में सभी दलों को शामिल करना बेहद मुश्किल साबित होगा। सोनिया गांधी ने राम विलास पासवान के साथ मिलकर 2004 में चुनाव लड़ा था और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया। इसी रणनीति को वे 2019 के लोकसभा चुनाव में दोहराना चाहती है। यही वजह है कि वे मायावती से नजदीकियां बढ़ा रही हैं। शपथ ग्रहण समारोह में सोनिया जिस तरह से मायावती के साथ बातचीत करती दिखीं वह अपने आप में काफी खास था। दूसरी ओर पिछले लोकसभा चुनाव में कोई सीट न जीत पाने वाली मायावती के लिए यह एक मौका है। मायावती ने सपा से दोस्ती कर ली है और लोकसभा चुनाव में दोनों के बीच गठबंधन होना तय माना जा रहा है। हाल में राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इन राज्यों में दलितों की संख्या काफी है। कांग्रेस-बसपा गठबंधन 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले लिटमस टेस्ट साबित हो सकता है। जाहिर है अगले लोकसभा चुनाव के पहले कांगेस इन तीनों राज्यों का विधानसभा चुनाव हारकर नहीं जाना चाहेगी। कुल मिलाकर सियासी नक्शे से तेजी से गायब होता विपक्ष गोलबंद होकर भाजपा पर हमला बोलने की फिराक में है। लेकिन अहम सवाल यह है कि यदि महागठबंधन तैयार हो गया तो मोदी का विकल्प कौन होगा और कितने दिन तक रह पाएगा? फिलहाल इसका उत्तर देने से सभी पार्टियों के दिग्गज बच रहे हैं। सिर्फ ममता बनर्जी हैं जो लोगों को यह समझा रही हैं कि राहुल गांधी उनके नेता नहीं हो सकते हैं। सपा मुखिया अखिलेश ने भी राहुल के प्रधानमंत्री बनने के सवाल का गोलमोल जवाब दिया है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या अपने-अपने राज्यों की परस्पर धुर विरोधी पार्टियां पहले लोकसभा चुनाव और फिर राज्यसभा चुनाव आपस में मिलजुल कर बिना विवाद किए लड़ पाएंगी? कांग्रेस क्या यूपी- बिहार-कर्नाटक की तरह ही पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उड़ीसा, झारखंड आदि राज्यों में छोटे भाई की भूमिका स्वीकार करेगी? कुल मिलाकर सभी सियासी दलों में 2019 में किंगमेकर नहीं किंग बनने की जो स्पष्ट ललक दिखाई दे रही है? ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि महागठबंधन हकीकत में बदलेगा या इसकी भ्रूण हत्या हो जाएगी।

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