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त्रिवेंद की अग्नि परीक्षा नहीं थराली की जंग

  • विरोधियों को नहीं मिलेगी राहत
  • कांग्रेस को मित्र विपक्ष का टैग लगाया
  • नतीजा कुछ भी निकले, मुख्यमंत्री की कुर्सी सुरक्षित

चेतन गुरुंग

थराली विधानसभा उपचुनाव में पहले शोर खूब था। बीजेपी से सितारा प्रचारक अमित शाह पहुंचेंगे और कांग्रेस से राहुल गांधी। दोनों ही दलों का मीडिया ने अचार बनाना शुरू किया, क्या इतना डरे हुए हैं। मामूली से चुनाव में भी इतने बड़े दिग्गज! शायद पार्टी नेतृत्व ने अहसास किया-हां, ठीक नहीं रहेगा। सो बढ़े कदम वापस खींच गए। न शाह आए न राहुल, अच्छा किया, दोनों दलों ने, अपनी इज्जत दांव पर नहीं लगाईं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए ये उपचुनाव कहीं ज्यादा अहम हैं। उनके अंदरूनी विरोधी न जाने कब से उनको निपटाने में जुटे हैं। अगर बीजेपी थराली की जंग गंवा बैठती तो ये बीजेपी से ज्यादा त्रिवेंद्र के लिए घातक रहेगा। ये अतिश्योक्ति नहीं है, यही वजह है कि त्रिवेंद्र भी इस उपचुनाव को पूरी गंभीरता से ले रहे हैं।

सच तो ये है कि खुद बीजेपी में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो दिल से चाहते हैं, कि बीजेपी ये लड़ाई गंवा डाले। उनको लगता है कि ऐसा हो गया तो त्रिवेंद्र को कुर्सी से हटाने की उनकी मंशा को राह मिल जाएगी। अभी तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नया चेहरा लाना तकरीबन नामुमकिन है। त्रिवेंद्र को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का जबरदस्त सहारा है। आज की तारीख में आलम क्या है, ये एक मंत्री और मुख्यमंत्री के एक करीबी स्टाफ ने बताया, अजी मंत्री क्या बेचते हैं त्रिवेंद्र जी के सामने, सर-सर बोलते तो जुबान नहीं थकती, दिग्गज समझे जाने वाले मंत्रियों की, जिनका बाहर लोगों में जबरदस्त माहौल बना है, मुख्यमंत्री ज्यादा नहीं बोलते लेकिन सख्त लहजे में और सपाट तरीके से बाते करने में उनका सानी नहीं है।

इस बात में हकीकत झलकती है। ऐसे कई वाकये सामने आते रहे हैं। जब मुख्यमंत्री के सामने मंत्रियों की दशा मिमियाने वाले जैसी रही है। ये बात अलग है कि कई मंत्री उनसे सियासत और सरकार में रहने के मामले में अधिक तजुर्बा रखते हैं। फिर भी त्रिवेंद्र किसी के दबाव में नहीं आते हैं। वे सबको सामान तरीके से हांक डाल रहे हैं। त्रिवेंद्र के विरोधियों में बहुत मजबूत लॉबी है। सच यही है कि त्रिवेंद्र के खिलाफ कांग्रेस वाले नहीं बल्कि बीजेपी के ही अनेक बड़े नाम जुटे हुए हैं। जिस दिन भी त्रिवेंद्र पर हाई कमांड की नजर कुछ टेढ़ी हुई या फिर हाथ हट गया, उस दिन त्रिवेंद्र को कोई बचा नहीं पाएगा। विरोधियों का हमला इतना प्रचंड होगा। अभी वे सिर्फ प्रचार के स्तर पर विरोध में काम कर रहे हैं।

उनकी दिली तमन्ना है कि थराली की जंग बीजेपी शिकस्त के साथ खत्म करे। ऐसा हुआ तो ये नामालूम त्रिवेंद्र्र के लिए वाटरलू साबित हो।
त्रिवेंद्र के विरोधियों में आज ज्यादातर नाम वही हैं, जो कभी साथ होते थे। साथ और मिलकर बीसी खंडूड़ी का विरोध किया करते थे। खंडूड़ी तब मुख्यमंत्री हुआ करते थे। त्रिवेंद्र को भी विरोधियों और उनकी ताकत का पूरा अंदाज है। वह ऐसा मौका देना ही नहीं चाहते, जिससे विरोधियों को बल मिले, थराली में उन्होंने न सिर्फ खुद जमकर काम किया है बल्कि अपने खास लोगों की ड्यूटी भी वहां गुप्त रूप से लगाई। मुन्नी देवी को टिकट देने का फैसला पूरी तरह उनका था। इसके पीछे एक वजह हालांकि, सहानुभूति की लहर का फायदा उठाना भी था। मुख्यमंत्री के लिए थराली सीट भले न लिटमस टेस्ट हो, न ही जनमत संग्रह, लेकिन वह इस कुर्सी को किसी भी सूरत में जीतना चाहते हैं। वह कोई मौका ही नहीं देना चाहते अपने ऊपर अंगुली उठाने का।

सियासी विश्लेषक भले थराली की लड़ाई को कांटे की बता रहे हैं लेकिन बीजेपी की जीत के आसार फिर भी अधिक हैं। मुख्यमंत्री बहुत आश्वस्त दिखते हैं। इस लड़ाई को फतह करने के बाद इसके आसार कम ही हैं कि वह मंत्रिपरिषद की खाली पड़ी दो सीटों को जल्द भरेंगे। हो सकता है लोकसभा चुनाव से पहले तक इन सीटों को खाली रखें, ऐन चुनाव के वक्त असंतोष को काबू करने के लिए हो सकता है वह कुर्सियों को भरें। आज की सूरते हाल ये है कि त्रिवेंद्र अब तक के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री समझे जा रहे हैं। कुछ भी कहें उनको हिला पाना इतना आसान नहीं, जैसे खंडूड़ी और डॉ.रमेश पोखरियाल निशंक को उनके विरोधियों ने हटाने की मुहिम चलाई थी और सफल हो गए थे, वैसा आज हो पाना आसान नहीं।

आज बीजेपी का नेतृत्व बदल चुका है। वह इस तरह की हरकतों को बर्दाश्त करने को न तो राजी है न ही किसी को ये करने के लिए हिम्मत ही देता है। ऐसा होता तो हरियाणा, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बदले जा चुके होते। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी। मोदी-शाह जो काम करते हैं, जिनको जिम्मेदारी सौंपते हैं, उनको पहले जम कर कसते हैं। फिर उनको हटने भी नहीं देते हैं। ऐसे में त्रिवेंद्र के लिए फिलहाल, कोई खतरा नहीं दिखता है। अलबत्ता, वह जिसको चाहे मंत्रिपरिषद से हटा सकते हैं। दो मंत्रियों की कुर्सी खाली रखना भी उनका ही अपना फैसला है। कहने का मतलब यह है कि थराली उपचुनाव कहीं से भी उनके लिए अग्नि परीक्षा नहीं है। ये बस हार-जीत होगी। बीजेपी चुनाव हार भी जाती है तो भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चेहरा त्रिवेंद्र का ही रहेगा, तय है। त्रिवेंद्र की एक खूबी ये जरूर कही जा सकती कि उन्होंने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को हाशिये पर रखा है। इतना ही नहीं आज की तारीख में कांग्रेस पर सुस्त और मित्र विपक्ष होने का लेबल चिपकवा दिया है। यही वजह है कि आज कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह भी अंदरूनी विरोध से जूझ रहे हैं। इतना ही नहीं कांग्रेस के प्रत्याशी जीतराम के जीत के आसार को कम भी किया है।

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