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कैराना में विपक्ष का परचम आगे-आगे देखिए होता हैं क्या

  • गठबंधन में पेच फंसा तो मुश्किल होगा मोदी का रथ रोकन
  • विपक्षी एकता के ब्रह्मास्त्र का काट नहीं खोज पा रही भाजपा

संजय शर्मा

दानवीर कर्ण की नगरी कैराना के चुनाव परिणाम ने आगामी लोकसभा चुनाव की स्पष्टï न सही लेकिन धुंधली तस्वीर जरूर पेश कर दी है। कैराना में बने जातीय समीकरणों ने साफ कर दिया है कि यदि विपक्ष की एकता बनी रही तो वह सत्तारूढ़ भाजपा के विजय रथ को रोकने में सफल हो सकती है। हालांकि अभी तक गठबंधन का कोई स्पष्टï खाका नहीं बन सका है लेकिन क्षेत्रीय दलों को नई ऊर्जा मिल गई है। सबसे अधिक ऊर्जा सियासत के हाशिए पर चले गए अजित सिंह के दल रालोद को मिली है। परिणाम ने साफ कर दिया है कि पश्चिमी यूपी में अभी भी अजित सिंह पूरी तरह हाशिए पर नहीं गए हैं। रालोद प्रत्याशी तबस्सुम हसन को बाहर से समर्थन दे रही सपा, बसपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी इस विजय से खुश है। वहीं पूरी ताकत झोंकने के बाद शिकस्त खाने वाली भाजपा खुद को असहाय महसूस कर रही है। फिलहाल उसे विपक्षी एकता के ब्रह्मास्त्र की काट नहीं मिली है। साथ ही यदि गठबंधन में पेंच फंसा तो मोदी का रथ रोकना विपक्ष के लिए मुश्किल होगा।…गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर मिली शिकस्त भाजपा भूल भी नहीं पायी थी कि उसे कैराना में मिली हार ने पूरी तरह झकझोर दिया। भाजपा कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीटों पर विपक्ष को हराकर गोरखपुर और फूलपुर में मिली हार का हिसाब चुकता करना चाहती थी, लेकिन ऐसा हो न सका। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन सीटों को जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। सीएम ने ताबड़तोड़ रैलियां कीं। कैराना से भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह और नूरपुर से भाजपा प्रत्याशी अवनि सिंह के लिए सहानुभूति का दांव चला। कैराना के पलायन का मुद्दा उठाया। भाजपा के तमाम नेताओं ने यहां डेरा डाले रखा। बावजूद इसके भाजपा यहां के जातीय समीकरण को तोडऩे में सफल नहीं हो पायी। वह रालोद के जाट-मुस्लिम गठजोड़ का काट नहीं खोज पाई और न ही दलितों को अपने साथ जोड़ सकी।

लोकसभा चुनावों की तैयारियों के लिए मात्र दस माह का वक्त बचा है। ऐसे में कैराना के परिणाम से भाजपा की उत्तर प्रदेश की पूरी रणनीति को करारा झटका लगा है। फूलपुर व गोरखपुर हारने के बाद अब नए नतीजों ने सीएम योगी के रुतबे को भी कमजोर किया है। किसान व जाट बहुल कैराना की हार भाजपा के लिए बेहद कष्टकारी है। कैराना लोकसभा सीट भाजपा के कद्दावर नेता हुकुम सिंह के निधन के कारण खाली हुई थी। 2014 में एक चौथाई मुस्लिम आबादी के बावजूद उन्हें कुल वैध मतों का 52 प्रतिशत रिकॉर्ड वोट मिला था। इस बार उनकी बेटी मृगांका सिंह को महज 32 प्रतिशत वोट मिले हैं। यानी वोट प्रतिशत में करीब 20 फीसदी गिरावट आई है। यह भाजपा के लिए बड़ा सबक है।
बिजनौर की नूरपुर विधानसभा में भाजपा ने मात्र सवा साल पहले जीती सीट भी गंवा दी। इस सामान्य सीट से दिवंगत भाजपा विधायक लोकेंद्र सिंह चौहान की पत्नी अवनि सिंह मैदान में थीं। यहां से सपा के नईमुल हसन जीते हैं। जाहिर है कैराना व नूरपुर में भाजपा के सहानुभूति वोट पर जातीय समीकरण और विपक्ष की एकता भारी पड़ गई। दोनों ही सीटों पर मुस्लिम वोटों की तादाद निर्णायक है। भाजपा की पराजय का यही निर्णायक कारण भी है। दोनों क्षेत्रों में बसपा, सपा व लोकदल का दलित, पिछड़ा, गुर्जर, जाट और मुस्लिम वोट बैंक एक हो गया। यह एकता आने वाले चुनावों के पहले टूटी नहीं तो भाजपा के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द साबित होगी। इसके अलावा गन्ना किसानों के भुगतान के मुद्दे पर भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। हालांकि 2013 के मुजफ्फरनगर में जाट-मुस्लिम जातीय हिंसा ने मोदी लहर के लिए बड़ा मंच तैयार किया था। लेकिन इस बार ऐसा कोई दांव भाजपा को खेलने के लिए नहीं मिला। दूसरे इस बार सभी दल एक साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ ताल ठोंक रहे थे। हाल के वर्षों में यहां की जाट राजनीति में उलटफेर हुआ। चौधरी चरण सिंह के पुत्र अजित सिंह की पार्टी रालोद का पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के उभार ने सूपड़ा साफ कर दिया था लेकिन अब कैराना में जीत ने अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी के लिए अपनी राजनीतिक जमीन को दोबारा मजबूत करने का एक और मौका दे दिया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जातीय समीकरण भी भाजपा के लिए खतरे की घंटी हैं। कैराना सीट पर करीब 32 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं।

इससे सटे सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा, रामपुर जैसी सीटों पर मुस्लिम वोट इससे कहीं ज्यादा हैं। मेरठ, बुलंदशहर, गाजियाबाद, बागपत समेत कुछ अन्य जिलों में मुसलमान आबादी 25 से 30 फीसदी है। इन जिलों में दलित अच्छी खासी तादाद में हैं। जाट भी कहीं कम कहीं ज्यादा हैं। ऐसे में यदि 2019 में सपा, बसपा, रालोद व अन्य छोटे दलों का गठबंधन बना तो यह भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। कैराना में भाजपा के खिलाफ बसपा, सपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के समर्थन से राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार तबस्सुम हसन की जीत ने साबित कर दिया है कि अगर यह महागठबंधन बना तो आगामी लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए मुसीबत बन जाएगा। हालांकि बसपा व सपा के बीच अभी तक सीटों के तालमेल को लेकर कुछ भी स्पष्टï नहीं हुआ है। दूसरे दलों ने भी अपने पत्ते अभी नहीं खोले हैं। यदि भाजपा विरोधी दलों ने मजबूत गठबंधन के जरिए काम नहीं किया तो बहुकोणीय मुकाबले में भाजपा का लोकसभा में संख्याबल बढऩे से नहीं रोका जा सकेगा। उत्तर प्रदेश चुनाव ही आगामी लोकसभा में केंद्र में सरकार बनाने की चाभी तैयार करेगा। भाजपा की प्रचंड जीत में उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा यानी 71 सीटों का योगदान रहा है। फिलवक्त भाजपा को महागठबंधन को देखते हुए अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा।

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