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फतह में नहीं आया मजा

  • थराली का मोर्चा मार त्रिवेंद्र ने टाला संकट
  • धन सिंह ने संभाली बाखूबी कमान
  • खुश नहीं संघ परिवार
  • अब निकाय चुनावों पर रहेगा फोकस चेतन गुरुंग

संजय शर्मा

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर केन्द्रीय नेतृत्व का भरपूर यकीन और आशीर्वाद है। यह सब जानते हैं। इतना अहसास सबको है कि जब तक कोई बड़ी अनहोनी न हो जाए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर चेहरा बदला जाना मुमकिन नहीं है। इसके बावजूद बीजेपी और राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ में त्रिवेंद्र के विरोधियों और मुखालफत करने वालों की तादाद न सिर्फ बहुत ज्यादा हो चुकी है बल्कि इसमें तेजी से इजाफा हो रहा है। यह सच है कि पार्टी और संघ में आज अधिकांश की इच्छा पार्टी और सरकार का प्रदर्शन खराब देखने की है। उनको लग रहा है इससे त्रिवेंद्र को लेकर आला कमान का लाभ कम होगा। साथ ही उनको बदलने पर भी विचार-विमर्श हो सकता है। ऐसे में जब थराली विधानसभा उपचुनाव हो रहे थे तो ऐसा मानने वालों की कमी नहीं थी जो ये दावा कर रहे थे कि बीजेपी और त्रिवेंद्र संकट में हैं। उनको थराली में अपनी ही जीत बेस्वाद दो मायनों में लगी, एक तो जीत का अंतर और दूसरा इससे त्रिवेंद्र को हिलते देखने की मंशा पर पानी फिरना।

…त्रिवेंद्र को आम तौर पर बहुत चतुर और अधिक सुलझा हुआ राजनीतिज्ञ नहीं माना जाता है, लेकिन यहां उन्होंने चतुराई से काम लिया। उन्होंने उप चुनाव की कमान शानदार रणनीतिकार और चतुर सियासतदां राज्यमंत्री डॉ.धन सिंह रावत को सौंप दी। मंत्रियों और पार्टी तथा संघ के अफसरों को घास न डालने वाले त्रिवेंद्र ने ऐसा कर एक साथ दो चालें चल डाली। एक तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी धन सिंह के ऊपर डाल दी। यानि, जीत गए तो मेरी जीत और हार गए तो धन सिंह के ऊपर सारा दारोमदार और जिम्मेदारी डाल दी जाती। धन सिंह को भावी मुख्यमंत्री की कतार में प्रकाश पन्त के साथ मानने वालों की कमी नहीं है। धन सिंह को बहुत महत्वकांक्षी समझा जाता है। उनको पता था कि उनको जीत का श्रेय मिले न मिले लेकिन हार का गम उनको खुद ही झेलना होगा। सो उन्होंने पूरी ताकत लगा के पार्टी को थराली जंग फतह करने में सफलता दिला दी। अब जबकि जंग खत्म हो चुकी है और बीजेपी की मुन्नी देवी जीत चुकी है तो यह पोस्टमॉर्टम शुरू हो गया है कि इस जीत से फायदा हुआ या फिर वाकई नुकसान हो सकता है। इसमें शक नहीं कि त्रिवेंद्र की कार्यशैली से संघ परिवार बहुत नाराज है। वे इस इन्तजार में है कि पार्टी लगातार चुनाव हारे और एक साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में तो खास तौर पर, ऐसा हो गया तो केंद्रीय नेतृत्व के लिए मुख्यमंत्री बदलना जरूरी हो जाएगा। ऐसा मानने वाले कम नहीं कि संघ ने पार्टी की जीत में कोई योगदान नहीं दिया। संघ की एक शाखा के प्रमुख अफसर ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री ने खुद को जल्द बदल कर पार्टी के लोगों को तवज्जो देना और अफसरों पर भरोसा करना कम नहीं किया तो पार्टी के लिए आने वाले दिन बहुत कांटों भरा होगा।
संघ परिवार में त्रिवेंद्र को ले कर नाराजगी जताते हुए हालिया बैठक में यह फैसला किया गया कि संघ से जुड़े लोग अब मुख्यमंत्री संग मीटिंग करने के लिए उनके आवास पर नहीं जायेंगे। इसके बजाए मुख्यमंत्री को ही संघ कार्यालय बुलाया जाएगा। इससे पहले संघ परिवार की ही एक बैठक में ज्यादातर प्रचारकों ने त्रिवेंद्र को ले कर खूब नाराजगी जताई थी। यह सोचने वाले कम नहीं थे कि विधानसभा उपचुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव अगर पार्टी अच्छी तरह नहीं लड़ पाती है और अच्छे नतीजे नहीं आए तो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कोई अन्य चेहरा बिठा दिया जाएगा। साल 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी उत्तराखंड में पांचों सीटें गंवा बैठी थी। उस वक्त के मुख्यमंत्री बीसी खंडूड़ी को ले कर तब बीजेपी में ऐसा ही आलम था, जैसा आज त्रिवेंद्र को ले कर है। पार्टी के लोगों ने ही एक किस्म से चुनाव हरवा दिया था। नतीजतन खंडूड़ी की कुर्सी से विदाई हो गई थी। थराली की कठिन जंग जीत के त्रिवेंद्र ने दुश्मनों को झटका दे दिया। हालांकि, उनके विरोधी अब ये कह कर अपनी भड़ास निकाल रहे कि कांग्रेस में आपसी फूट के कारण बीजेपी को बाजी पलटने में फायदा मिला। ऐसा न होता तो बीजेपी मैदान में खेत रहती। जो भी हो, जीत आखिर जीत होती है। अलबत्ता अपनी सरकार होने के बावजूद पौने दो हजार वोटों से जीत को बहुत फीका माना जा रहा है। इसको सिर्फ चेहरा छुपाने से बच जाना भर समझा जा रहा है। इस जीत से त्रिवेंद्र सिर्फ हाई कमान की नाराजगी भर से बच गए हैं लेकिन उनको खुशी नहीं दे पाए हैं। अब उनके आगे अगला पड़ाव स्थानीय निकाय चुनाव हैं। उस चुनाव में जीत बढिय़ा मिलती है तो उसका असर लोकसभा चुनाव में दिखाई देगा। ऐसे में पार्टी और उससे ज्यादा त्रिवेंद्र के लिए उस चुनाव में जीत हासिल करना बहुत जरूरी है। निकाय चुनावों में बेहतर नतीजे नहीं आए तो लोकसभा चुनाव में उसका अक्स उभर आएगा, जो पार्टी और त्रिवेंद्र दोनों के लिए घातक साबित हो सकता है।

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