You Are Here: Home » Front Page » संघ मुख्यालय में प्रणव डा की मौजूदगी पर धुकधुकी क्यों ?

संघ मुख्यालय में प्रणव डा की मौजूदगी पर धुकधुकी क्यों ?

  • भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने तरीके से कर रही व्याख्या
  • गठबंधन की खींचतान में अहम रोल निभा सकते है प्रणव डा

संजय शर्मा

पूर्व राष्टï्रपति और कांग्रेस के वरिष्ठï नेता प्रणव मुखर्जी ने राष्टï्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख्यालय नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में शिरकत क्या की, कांग्रेस समेत तमाम सियासी दलों की धुकधुकी बढ़ गई। कांग्रेस नेताओं ने इसकी खुलकर मुखालफत की। प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठïा भी पिता को नसीहत देने में पीछे नहीं रहीं। इन सभी विरोधों और नसीहतों को दरकिनार कर पूर्व राष्टï्रपति कार्यक्रम में पहुंचे। संघ के संस्थापक डा. केशव राव बलीराम हेडगेवार को भारत माता का सच्चा सपूत बताया। साथ ही राष्टï्रवाद पर अपने संबोधन में बहुत कुछ कहा। संघ को इस बात की खुशी है कि प्रणव मुखर्जी की गरिमामय उपस्थिति ने उसके लिए संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस इस बात पर गदगद है कि श्री मुखर्जी ने संघ को मंच से बहुत कुछ समझा दिया। मुखर्जी का यह कदम साबित करता है कि वे अभी राजनीति से संन्यास लेने के मूड में कतई नहीं हैं और भाजपा के खिलाफ बनने वाले महागठबंधन में समय आने पर अहम भूमिका निभा सकते हैं।  …पूर्व राष्टï्रपति और कांग्रेस के वरिष्ठï नेता प्रणव मुखर्जी ने जब से संघ के न्यौते को स्वीकार किया है, सियासत गर्म हो गई है। कांग्रेस नेता परेशान हैं तो संघ और भाजपा गदगद। भले ही मुखर्जी पूर्व राष्ट्रपति रहे हों लेकिन उनकी पहचान कांग्रेस नेता के रूप में अधिक रही है। ऐसी स्थिति में उनका संघ मुख्यालय जाना कांग्रेस के लिए किसी भयावह सपने की तरह रहा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी संघ के कटु आलोचक हैं। लिहाजा कई कांग्रेसी नेताओं ने प्रणव दा के इस कार्यक्रम में शिरकत करने का खुलकर विरोध किया था। उनकी बेटी शर्मिष्ठïा ने भी अपने पिता को नसीहत दी थी और कहा था कि संघ उनका इस्तेमाल करेगा। दूसरी ओर प्रणव मुखर्जी को बुलाकर संघ ने कांग्रेस व अन्य दलों को यह संदेश देने की कोशिश की कि संघ का विरोध केवल गांधी परिवार करता है, कांग्रेस पार्टी नहीं। इस मकसद में वह काफी हद तक सफल भी रहा। कांग्रेस को डर था कि प्रणव दा राष्टï्रवाद पर संघ की लाइन न बोलने लगे। लेकिन प्रणव दा ने बड़े ही राजनीतिक कौशल से कांग्रेस और संघ दोनों की विचारधारा में गजब का तालमेल बिठाया। इसे देखकर उनके विरोधी भी हतप्रभ रह गए। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि संविधान के प्रति देशभक्ति ही असली राष्ट्रवाद है। सिर्फ एक धर्म, एक भाषा भारत की पहचान नहीं है, संविधान से राष्ट्रवाद की भावना बहती है। उन्होंने भारत का इतिहास और नेहरू-गांधी के दर्शन का पाठ भी संघ के मंच से पढ़ाया। कुल मिलाकर उन्होंने अपने भाषण से सभी को खुश कर दिया। कांग्रेस इस बात से ख़ुश हो गई कि उन्होंने संघ के मुख्यालय में जाकर नेहरू-गांधी का पाठ पढ़ाया और संघ इसलिए ख़ुश हो गया कि पूर्व राष्ट्रपति के भाषण से पहले संघसरचालक मोहन भागवत ने विविधता में एकता की बात कही थी और प्रणव ने उसकी प्रासंगिकता पर मोहर लगा दी। इन सबके बीच कांग्रेस समेत भाजपा विरोधी सभी दलों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि प्रणव दा ने संघ का निमंत्रण क्यों स्वीकार किया। सभी को इस बात का डर सता रहा है कि लोकसभा चुनाव में संघ प्रणव मुखर्जी के कार्यक्रम में शिरकत करने का फायदा उठा सकता है। लेकिन यह बड़ी भूल है। प्रणव दा इतने मंझे नेता है कि संघ उनका इस्तेमाल नहीं कर सकता है। हालांकि कांग्रेस के डर का एक और कारण भी है। कांग्रेस के इतिहास में दो मौके आए जब प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री बनने का मौका मिला लेकिन पार्टी ने दोनों बार उन्हें मौका नहीं दिया। पहली बार जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी तब वरिष्ठतम नेता होने के नाते उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें मौका दिया जाएगा लेकिन तब राजीव गांधी को मौका मिला। दूसरी बार 2004 में जब कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी तो सोनिया गांधी ने उनके बजाय मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। प्रणव मुखर्जी ने इसका जिक्र अपनी पुस्तक में किया है। इसके अलावा कांग्रेस को इस बात का भी डर था कि उनका भाषण पार्टी की किरकिरी न करा दे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विरोध करने वाले कांग्रेसी नेताओं ने भी प्रणव के भाषण की खूब सराहना की। साथ ही कहा कि प्रणव दा ने अपने भाषण के जरिए संघ को बहुत कुछ समझा दिया है। विरोधी भी उनका सम्मान करते हैं। मोदी कई बार प्रणव दा की तारीफ कर चुके हैं। कुल मिलाकर संघ के कार्यक्रम में शिरकत कर प्रणव दा ने दो धुर विरोधी शक्तियों के बीच संवाद की स्थिति पैदा की है। इसके अलावा यह भी साफ हो गया है कि प्रणव मुखर्जी राजनीति में अपनी प्रासंगिकता को खत्म नहीं करना चाहते हैं। जिस तरह पूरा विपक्ष भाजपा के खिलाफ लामबंद हो रहा है उसे देखते हुए प्रणव का यह कदम काफी सधा संदेश दे रहा है। महागठबंधन के गठन को लेकर भाजपा विपक्ष से एक ही सवाल पूछती है कि आपका प्रधानमंत्री कौन है? इसका उत्तर फिलहाल विपक्ष के पास नहीं है। कोई सर्वमान्य नेता नहीं दिख रहा है जो मोदी का विकल्प बन सके। जाहिर है इस मामले पर आने वाले दिनों में गठबंधन में दरार पैदा हो सकती है। ऐसी स्थिति में प्रणव दा संकटमोचक का काम कर सकते हैं। हालांकि उनके प्रधानमंत्री बनने के कयासों को उनकी बेटी शर्मिष्ठïा ने खारिज कर दिया है। लेकिन भाजपा की सहयोगी पार्टी शिवसेना कह रही है कि प्रणव मुखर्जी प्रधानमंत्री बन सकते हैं। संवैधानिक रूप से भी पूर्व राष्टï्रपति के प्रधानमंत्री बनने में कोई अड़चन नहीं है। हालांकि अघोषित नियम यह रहा है कि कोई भी पूर्व राष्टï्रपति प्रधानमंत्री का दावेदार कभी नहीं बना है। लेकिन यदि गठबंधन में खींचतान हुई तो प्रणव गठबंधन के बीच सेतु का काम कर सकते हैं। यूपीए के दस साल के शासनकाल में उन्हें क्राइसिस मैनेजर के रूप में जाना जाता था। कुल मिलाकर संघ के मुख्यालय जाकर प्रणव मुखर्जी ने जहां एक तरफ़ संघ और भाजपा से संवाद कायम किया वहीं कांग्रेस को अपने अनुभव और प्रासंगिकता का अहसास दिला दिया है। इसके अलावा अन्य विपक्षी दलों को भी अपनी अहमियत बता दी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ऐसा सांस्कृतिक संगठन है जो अपने राष्ट्रवाद के लिए जाना जाता है तो सांप्रदायिकता के सवाल पर विरोधी उसे घेरते रहते हैं। ये सही है कि संघ के कार्यक्रमों में पहले भी अलग विचारधारा वाले लोग आते रहे हैं लेकिन देश की राजनीति और संघ को लेकर सिकुड़ते नजरिए के बीच राष्टï्रपति जैसे शिखर के पद को सुशोभित करने वाले प्रणव मुखर्जी का संघ की तारीफ करना वाकई बड़ी बात है। 

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.