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लोकसभा चुनाव में बसपा का साथ पाने की जुगत लगा रही कांग्रेस

  • कर्नाटक में कांग्रेस की जिद पर बसपा को मिला तोहफा
  • सपा के साथ गठबंधन कर उपचुनावों में खुद की अहमियत साबित कर चुकी हैं माया

वीक एंड टाइम्स न्यूज नेटवर्क

लखनऊ। राजनीति की करवट ने सियासत के महारथियों को बेचैन कर दिया है। सपा-बसपा गठबंधन में उपचुनाव के दौरान अपनी अहमियत साबित कर चुकीं माया को साथ मिलाने में कांग्रेस रुचि लेने लगी है। कांग्रेस और बसपा के गठबंधन से नया गुल खिलने की उम्मीद टिमटिमाने लगी है। यूपी की सत्ता से बेदखल हुई बसपा को कई साल बाद किसी राज्य की सत्ता में हिस्सेदारी मिली है। कर्नाटक में बसपा को यह तोहफा कांग्रेस की जिद पर ही मिला है। ऐसे में कांग्रेस और बसपा के बीच नजदीकियां बढऩा स्वाभाविक है। जल्द ही यह नजदीकी गठबंधन की शक्ल में सामने होगी। बसपा प्रमुख मायावती ने भी सपा के सुल्तान के बजाय कांग्रेस के युवराज से सियासी रिश्ते जोडऩे में अपना फायदा देखा है। कांग्रेस-बसपा का गठबंधन ही इस साल के अंत में प्रस्तावित मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव में उतरेगा। सियासी प्रयोग कामयाब हुआ तो यूपी की सियासत में कांग्रेस का वजूद बढऩा तय है। कांग्रेस के साथ रिश्ते जोडक़र मायावती एक तीर से दो निशाने लगाना चाहती हैं।

कर्नाटक में पिछले दिनों कुमारस्वामी सरकार का विस्तार हुआ। इसमें यूपी की सत्ता से बेदखल होने के कई साल बाद बीएसपी को प्रत्यक्ष तौर पर किसी राज्य में सत्ता की साझेदारी मिली है। देखा जाए तो कर्नाटक में जेएडीएस और कांग्रेस अपने दम पर ही सत्ता के सुविधाजनक आंकड़े का जुगाड़ कर चुकी है। ऐसे में कर्नाटक सरकार में बीएसपी के रहने या न रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता। मायावती भी इस बात को अच्छी तरह जानती हैं। इसके बावजूद कर्नाटक में बीएसपी के इकलौते विधायक एन. महेश कुमार स्वामी सरकार में मंत्री बनाए गए हैं। ऐसा कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी के कारण संभव हुआ है। दरअसल, सपा की नजरों में कमजोर कांग्रेस इस फैसले के जरिए मायावती से रिश्ते जोडक़र मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में भाजपा को पटखनी देने की जुगत में है। तीनों राज्यों की कई सीटों पर बसपा का वोटबैंक पार्टी प्रत्याशी को जिताने की स्थिति में भले ही नहीं है, लेकिन कांग्रेस का साथ देकर भाजपा को हराने की क्षमता अवश्य रखता है।

यूपी में भी साथ होगा हाथी और हाथ

राजनीति के जानकारों के मुताबिक, कांग्रेस और बसपा का गठजोड़ लोकसभा चुनाव में ज्यादा प्रभावी होगा। बीते लोकसभा चुनावों में बसपा 34 स्थानों पर दूसरे नंबर पर थी, जबकि कांग्रेस 20 स्थानों पर। ऐसे में यदि दोनों दल साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे तो मुमकिन है कि बसपा-कांग्रेस गठबंधन यूपी में अस्सी में पचास सीटों पर विजय हासिल करे। इस गठबंधन में सपा के साथ होने की स्थिति में 60-65 सीटों पर कामयाबी मिलने की उम्मीद है। बसपा के उच्च पदस्थ सूत्र ने बताया कि पार्टी सुप्रीमो का सपना दिल्ली सिंहासन पर काबिज होना है। ऐसे में सपा के बजाय कांग्रेस का साथ ज्यादा मुफीद रहेगा। कारण यह कि गठबंधन की स्थिति में भले ही अखिलेश यादव बड़ा दिल दिखाकर बसपा को 35 सीट देने के लिए तैयार हैं, लेकिन इस स्थिति में जीत का सेहरा अखिलेश के सिर सजेगा। तीन राज्यों में कांग्रेस के जरिए भाजपा को हराने के बाद बसपा की हैसियत बढऩा स्वाभाविक है। ऐसे में वह यूपी के गठबंधन में सपा पर दबाव की राजनीति बनाकर कांग्रेस को सम्मानजनक सीट दिलाने का प्रयास करेंगी।

मायावती हो सकती हैं पीएम उम्मीदवार

बसपा के पूर्व विधायक कहते हैं कि मिशन 2019 में भाजपा के पराजित होने की स्थिति में भी कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसे में गठबंधन की सरकार बनेगी। पीएम पद के दावेदार तमाम होंगे। उदाहरण के तौर पर ममता बनर्जी, के.चंद्रशेखर राव, शरद पवार, नवीन पटनायक, अखिलेश यादव और मायावती। कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने से बसपा का पलड़ा भारी रहेगा। भविष्य की राजनीति के लिए कांग्रेस पार्टी मायावती के नाम पर समर्थन देने को तुरंत तैयार होगी। ऐसा संयोग बनता है तो मायावती प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार बन सकती हैं। चूंकि केंद्र की सत्ता नहीं मिलने की स्थिति में कांग्रेस परोक्ष रूप से शासन करना चाहेगी, इसलिए उसे मायावती से अच्छा साथी भी नहीं मिलेगा। इसके अतिरिक्त बसपा के साथ गठजोड़ के जरिए कांग्रेस यूपी में अपनी जमीन को मजबूत करने में भी कामयाब होगी।

राहुल भी ले रहे दिलचस्पी

विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस का गठबंधन फ्लॉप हुआ तो अखिलेश यादव ने कांग्रेस को अकेला छोड़ दिया था। इसलिए राहुल बसपा के साथ गठजोड़ में अधिक रुचि ले रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद बीएसपी का वोट बैंक खत्म होने के मिथ को तोडक़र मायावती मजबूत मनोवैज्ञानिक वापसी कर चुकी हैं। यूपी में गोरखपुर और फूलपुर में समर्थन के ऐलान से माया ने साबित कर दिया कि दलित वोटरों के लिए अब भी उनके इशारे के मायने हैं। उधर, कांग्रेस के लिए मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव मोदी की अगुआई में भाजपा को रोकने के लिए नॉकआउट सरीखे हैं। इसलिए बसपा के साथ रिश्ते जोडक़र कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खुद को राष्ट्रीय राजनीति का राजा साबित करना चाहते हैं।

 

 

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