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जंगल महकमे में जंगलराज

  • अफसरों में बैरभाव सरकार नियन्त्रण में नाकाम
  • बाघ-तेंदुओं की शामत जम कर हो रहे शिकार
  • तीन जाचं अवैध शिकार पर चल रही
  • राजाजी मामले में जाँच अब मनोज चंद्रन को

चेतन गुरुंग

देहरादून। उत्तराखंड का अधिकांश हिस्सा जंगल से घिरा है। ऐसे में आईएफएस अफसरों की अहमियत किसी भी तरह आईएएस अफसरों से कम नहीं है, न सिर्फ अहिमयत में बल्कि तादाद में भी। भले आईपीएस कैडर के लिए आईएएस कैडर को चुनौती दे पाना कभी मुमकिन नहीं हो पाया लेकिन आईएफएस कैडर ने हमेशा ही आईएएस कैडर को जम कर चुनौती दी है। आईपीएस भले अपर सचिव से ऊपर नहीं पहुंच पाए चाहे उनका बैच कोई सा भी रहा हो, लेकिन आईएफएस अफसर प्रमुख सचिव तक बन चुके हैं। सिर्फ आईएफएस अफसरों की तादाद और एकता के चलते ये हो पाया है लेकिन अब खुद आईएफएस अफसर अपनी ताकत के दुश्मन हो चुके हैं। वे एक-दूसरे को निपटाने में जुटे हैं और जम कर आपसी सियासत में उलझे हुए हैं। इससे न सिर्फ उनका कैडर कमजोर हुआ है बल्कि आपसी समन्वय और सहभागिता की कमी के कारण प्रदेश में बाघों और तेंदुओं के प्राणों पर संकट आ पहुंचा है। आलम यह है कि आपसी बैरभाव के चलते अवैध शिकार की जांच तक को प्रभावित करने में आईएफएस अफसर और शासन के अफसर जुटे हैं।

ताजा मामला राजाजी नेशनल पार्क में बाघों की मौत की जांच के मामले में जांच अधिकारी बदल दिए जाने का है। सरकार ने अब इस मामले की जांच वरिष्ठ आईएफएस अफसर मुख्य संरक्षक मनोज चंद्रन को सौंप दी है। मनोज साफ-सुथरी छवि और प्रतिष्ठा वाले हैं। वह दबाव में आने वालों में नहीं गिने जाते हैं। चंद्रन ने पूछे जाने पर स्वीकार किया कि उनके पास जांच करने के आदेश आ गए हैं। उन्होंने फाइल तलब कर ली है और जांच शुरू करने जा रहे हैं। इस जांच को बदले जाने के पीछे भी महकमे आला अफसरों हेड ऑफ फॉरेस्ट जयराज और इसी महीने रिटायर होने वाले चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन दिग्बिजय सिंह खाती के बीच पुरानी चली आ रही प्रतिद्वंद्विता को माना जा रहा है। इसकी मिसाल ये है कि जब राजाजी नेशनल पार्क में बाघों और तेंदुओं के अवैध शिकार की शिकायत हुई तो दो काम हुए। खाती ने अलग जांच बिठाई और जयराज ने टीम भेजी तो उसके खिलाफ भी अवैध रूप से पार्क में दाखिल होने का मामला दर्ज कर लिया गया। इतना ही नहीं बेचारे इस मामले में मुखबिर अमित धनगढ़ को ही गिरफ्तार कर लिया गया। दो महीने जेल में गुजारने के बाद वह अब जमानत पर बाहर है।

इस मामले की जांच कोमल सिंह को दिए जाने पर भी ऐतराज जताया जा रहा था। खाती ने जिस कोमल को जांच अधिकारी बनाया वह जूनियर स्तर के हैं। नियमानुसार इसकी जांच कोई वरिष्ठ अफसर ही कर सकता है। मामला बढऩे पर सरकार ने अब इसकी जांच मनोज को सौंपी है जो मुख्य वन संरक्षक हैं। उनके पास ये जांच आने से पहले वैभव सिंह के पास थी, और वह भी जूनियर स्तर के ही थे। आला अफसरों की आपसी खींचतान और सियासत की कीमत अबोध बाघों और तेंदुओं को चुकानी पड़ रही है। उनका अवैध शिकार जम कर हो रहा है। इसमें शक नहीं कि जंगल महकमे के लोगों की मिलीभगत के बिना इतने बड़े स्तर पर शिकार नहीं हो सकते हैं। इस वक्त तीन जांचें सिर्फ शिकार को लेकर चल रही हैं। कॉर्बेट पार्क में हुए शिकार की जांच खुद जयराज के पास है, लेकिन पुलिस भी इसकी जांच कर रही है। हरिद्वार वाले मामले की जाँच संजीव चतुर्वेदी कर रहे हैं और राजाजी वाली जांच मनोज। जांच को लेकर खाती और जयराज में खुल कर ठनी हुई है।

जंगल महकमे में जंगल राज के कारण पिछले दो सालों से भी कम समय में दर्जन भर से ज्यादा बाघों और तेंदुओं के शिकार के मामले सामने आ चुके हैं। बिजनौर के एक गांव से जब शिकारी और वन्य जीवों की हड्डियों और खालों के तस्कर रामचंद्र की निशानदेही पर 32 गड्ढे खोदे गए थे तो उनमें से अनगिनत हड्डियां बाघों की मिली थीं। अंदाज लगाया गया था कि ये हड्डियां तकरीबन 25 बाघों की हैं, जिनका अवैध शिकार कॉर्बेट पार्क में किया गया था। संख्या की पुष्टि वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया ने अपने शोध में किया था। खुद रामचंद्र ने स्वीकार किया था कि वह बाघों का शिकार कई बार कर चुका है। ऐसे ही राजाजी पार्क क्षेत्र में मोतीचूर के पास बाघों और तेंदुओं की खालें और हड्डियां तथा मांस पाया गया था। हरिद्वार में भी ऐसा ही मामला सामने आया। कहने का मतलब इतने लम्बे चौड़े जंगल और वन्य जीव महकमे के बावजूद उत्तराखंड के जंगलों और संरक्षित पार्कों में बाघ और तेंदुए कतई सुरक्षित नहीं हैं। सिर्फ इसलिए कि आईएफएस अफसरों में बिल्कुल भी तालमेल नहीं है और वे परस्पर एक-दूसरे क निबटाने में ज्यादा व्यस्त हैं। इतना ही नहीं अगर कोई वन्य जीवों के संरक्षण में कोई हाथ बंटाना या भूमिका निभाना चाहता है तो उसको भी परेशान किया जाता है। बाघों के संरक्षण से जुड़े राजीव मेहता जब मामले की तह तक जाने के लिए कॉर्बेट जाना चाह रहे थे तो जयराज की मंजूरी के बावजूद खाती के निर्देश पर उनको प्रवेश नहीं मिला।

मेहता ने हालांकि इस बारे में केन्द्रीय मंत्री और वन्य जीव प्रेमी मेनका गांधी तथा मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को चिट्ठी लिख के पूरे मामले की जांच उच्च स्तर पर कराने की मांग की है। उन्होंने वन्य जीवों और बाघों तथा तेंदुओं के संरक्षण पर विशेष प्रयास करने की भी मांग की है। जिस तरह के हालात उत्तराखंड के जंगल महकमे में हैं उसको देखते हुए लगता है कि यहां वन्य जीवों के लिए सुरक्षित रह पाना आसान नहीं है। खास तौर पर जंगल के राजा कहलाए जाने वाले बाघों की जान सबसे ज्यादा खतरे में हैं।

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