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कुर्सी के झगड़े में खोई मान्यता

  • कंसेसेन कमेटी के जिम्मे उत्तराखंड क्रिकेट
  • बीसीसीई का ही रहेगा अंकुश
  • विनोद राय की कड़की आई काम
  • 18 साल के बाद उगा उम्मीद का सूरज
  • कई प्रतिभाओ ने तोडा इस बीच दम

चेतन गुरुंग @WeekandTimes

देहरादून। उत्तराखंड से क्रिकेट की अनेक प्रतिभाएं पिछले एक दशक में जबरदस्त तरीके से सामने आई। हालिया कुछ सालों में तो ऋ षभ पन्त ने जलवा ही ढा डाला है। उन्मुक्त चंद और अभिमन्यु ईश्वरन भी वे खिलाड़ी हैं जो फिलहाल बेहतर फार्म में हैं और रन ठोंक रहे हैं। ये बात अलग है कि पन्त और उन्मुक्त दिल्ली और अभिमन्यु पश्चिम बंगाल के लिए चमक बिखेर रहे हैं। जूनियर स्तर अपर के तेज गेंदबाज नगरकोटी भी लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। उनका प्रदर्शन पिछले जूनियर विश्व कप में जैसा रहा है, उसको देखते हुए सभी एक मत है कि उसमें सीनियर टीम का हिस्सा बनने का पूरा माद्दा है। ये सब उत्तराखंड के होने के बावजूद दूसरे राज्यों से खेलने को मजबूर हैं इसलिए कि उत्तराखंड को बीसीसीआई ने मान्यता ही नहीं दी थी। इसके चलते यहां रणजी टीम ही नहीं थी, न ही अन्य स्तर की टीम। यहां चार एसोसिएशन मान्यता के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। बीसीसीआई ने सबके एक होने का इन्तजार किया। जब दिल्ली में बीसीसीआई की प्रशासकों की कमेटी ने राज्य की चारों एसोसिएशन के लोगों को मान्यता के लिए तलब किया तो वहां भी उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन ने तेवर दिखाए। अच्छा हुआ कि उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन, क्रिकेट एसोसिएशन और उत्तराखंड और यूनाईटेड क्रिकेट एसोसिएशन एक मत हो गए कि कुछ भी हो इस साल क्रिकेट खिलाडिय़ों को रणजी ट्रॉफी खिलवाना है।

…..उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन की जिद के चलते आखिर विनोद राय किसी को भी मान्यता देने पर जारी नहीं हुए, बस खिलाडिय़ों का नुकसान न हो, इसके लिए एक अभिमत समिति (कांसेंसेस कमेटी) का गठन कर दिया। बोर्ड के अधिकारी रत्नाकर शेट्टी इसके मुखिया होंगे। हालांकि, इतने भर से प्रदेश के खिलाडिय़ों में खुशी का आलम है, लेकिन आपसी झगड़े ने उत्तराखंड के हाथों से एक बार फिर मान्यता हासिल करने का सुनहरा मौका छीन लिया।
राय ने तब उत्तरांचल क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारियों को झिडक़ दिया जब वे उनकी राय मांगने पर टालमटोल करने लगे। उन्होंने एसोसिएशन के करता-धर्ता प्रदीप सिंह और चंद्रकांत आर्य को खरी-खरी भी सुनाई। इसके बाद कमेटी के गठन पर सब सहमत हो गए। उत्तराखंड में क्रिकेट को बढ़ावा देने के लिए भले सिर्फ क्रिकेट एसोसिएशन और उत्तराखंड दशकों से जुटी हुई है लेकिन उत्तराखंड के गठन के बाद तीन और एसोसिएशन अस्तित्व में आ गई थीं। इसके चलते बीसीसीआई ने किसी को भी मान्यता न देने का रुख अपना लिया था। वह लगातार यही कहता रहा कि पहले चारों संगठन एक हो जाओ, फिर मान्यता के लिए उसके पास आओ। कांसेंसेस कमेटी तक भी बात इसलिए पहुंची कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत वाली यूनाईटेड क्रिकेट एसोसिएशन और रामशरण नौटियाल तथा दिव्य नौटियाल वाली उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन ने क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड से हाथ मिला के क्रिकेट के भले के लिए काम करने का मन बना लिया था। चार में से तीन के एक तरफ हो जाने के बाद सिंह और आर्य वाली एसोसिएशन के पास समझौता मानने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया था। उत्तराखंड में कांसेंसेस कमेटी भी शायद ही बन पाती अगर बीसीसीआई पूरे प्रभाव में होता और राय न होते। बोर्ड और उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ की कभी गंभीर मंशा उत्तराखंड की रणजी टीम बनवाने और मान्यता देने के प्रति नहीं दिखाई दी है।
उत्तराखंड की क्रिकेट का जिम्मा अभी उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ के पास है। वह कभी नहीं चाहेगा कि उत्तराखंड को मान्यता मिले और उत्तराखंड के नाम से बोर्ड की तरफ से मिलने वाला पैसा उसके हाथ से निकले। साथ गर्मियों में उनके लिए अपनी मीटिंग करने का स्थान नैनीताल या मसूरी हो चुका था। उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ उत्तराखंड में क्रिकेट को बढ़ावा देने के नाम पर सिर्फ एकाध महिला क्रिकेट मैच कराने और अपनी टीम का ट्रेनिंग सेशन चलाने तक सीमित रहा है। उत्तराखंड के क्रिकेट खिलाड़ी कितने भी प्रतिभावान हों, उत्तर प्रदेश टीम में शामिल होना उनके लिए नामुमकिन सा था। पिछले दो दशक में उत्तराखंड की कई शानदार प्रतिभाओं ने मौके न मिलने के कारण दम तोड़ डाला। राय ने कांसेंसेस कमेटी बना के उत्तराखंड के क्रिकेट खिलाडिय़ों के लिए रास्ते खोल दिए। अब वे अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन खुल के कर सकते हैं। जब तक एसोसिएशन को मान्यता नहीं मिलती तब तक कमेटी काम करेगी। अभी इसका कार्यकाल एक साल रखा गया है। तब तक रणजी टीम का चयन भी बोर्ड के अधिकारी ही करेंगे।.वहीं से चयन
समिति का गठन किया जाएगा। पूर्व टेस्ट क्रिकेटर आशीष कपूर चयन का काम मुख्य तौर पर संभालेंगे। कमेटी में सीएयू और यूसीए के दो-दो, उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन और यूसीए के एक-एक, बीसीसीआई के दो और उत्तराखंड सरकार के एक प्रतिनिधि को शामिल करने की व्यवस्था राय ने दी है। इसमें दो राय नहीं कि कांसेंसेस कमेटी के गठन के बाद कम से कम अब राज्य के क्रिकेट खिलाडिय़ों का नुकसान नहीं होगा। वे अब रणजी ट्रॉफी और अन्य घरेलू प्रतियोगिताएं खेल सकेंगे। अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने के लिए दूसरे राज्यों का रुख नहीं करना पड़ेगा। प्रदेश में इससे क्रिकेट को निश्चित रूप से बढावा मिलेगा। वैसे यह संयोग है कि इसी साल देहरादून का राजीव गाँधी क्रिकेट स्टेडियम आईएलएसएस को अनुबंध में सौंप दिया गया और इसी साल न सिर्फ अफगानिस्तान की टीम ने देहरादून के स्टेडियम को अपना होम ग्राउंड बना दिया और बांग्लादेश के साथ सीरीज भी खेली।
ये तय है कि अफगानिस्तान की टीमों के साथ देहरादून में मैच होते रहेंगे। साथ ही रणजी मैच भी अब देहरादून में जम के होंगे। आईपीएल के मैच भी होने की पूरी सम्भावना है। देहरादून के स्टेडियम को बीसीसीआइ भी ग्रीन सिग्नल दे चुका है। अब ये देखना दिलचस्प रहेगा कि उत्तराखंड में क्रिकेट के आका अपना स्वार्थ छोड़ के क्रिकेट के भलाई और प्रोत्साहन में जुटते हैं या फिर अपनी झोली भरने और स्वार्थ सिद्ध करने में जुटे रहते हैं। शुरूआती दौर होने के कारण उत्तराखंड में क्रिकेट में किसी किस्म का घोटाला या विवाद पैदा न हो ये देखना सरकार और बोर्ड का मुख्य कार्य होगा। ग्लैमर से जुड़ा खेल होने के कारण क्रिकेट के आकाओं पर तमाम तरह के दबाव तो रहेंगे ही। ये तय है।
ये देखना भी अहम होगा कि अब सुप्रीम कोर्ट जहां, एसोसिएशन की मान्यता का मामला चल रहा है, वहां से क्या फैसला आता है और जब उत्तराखंड में पहली बार एसोसिएशन के चुनाव होंगे तो कैसा माहौल और आलम रहेगा।

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