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कश्मीर से दिल्ली के तख्त पर नजर

  • महबूबा सरकार से समर्थन वापस लेकर राष्टï्रवाद को धार देने में जुटी भाजपा
  • मिशन 2019 के लिए पार्टी के दिग्गजों ने तैयार किया गया रोड मैप
  • घाटी में सुपरसोनिक रफ्तार से शुरू हुआ ऑपरेशन ऑल आउट

संजय शर्मा @WeekandTimes

भाजपा एक बार फिर राष्टï्रवाद को धार देने में जुट गई है। पार्टी के दिग्गजों ने इसकी पूरी पटकथा लिख दी है। इस बार राष्टï्रवाद के जरिए मिशन 2019 को फतह करने का रोड मैप कश्मीर में तैयार किया गया। यह तैयारी इतने गुप-चुप और सही टाइमिंग पर की गई कि जम्मू-कश्मीर में भाजपा की सहयोगी पीडीपी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती को भी भनक नहीं लगी। अचानक भाजपा ने दिल्ली से ऐलान कर दिया कि कश्मीर के बिगड़े हालात को देखते हुए अब गठबंधन धर्म नहीं निभाया जा सकता। इसके साथ ही महबूबा सरकार गिर गई और वहां राज्यपाल शासन लागू हो गया। भाजपा ने यह कदम बड़ा सोच-समझकर कर उठाया है। रमजान में सीजफायर के दौरान बढ़ती आतंकी घटनाएं, पत्रकार शुजात बुखारी और सेना के जवान औरंगजेब की आतंकियों द्वारा की गई हत्या के बाद समर्थन वापसी की घोषणा की गई। हालांकि इसके पीछे भाजपा के कट्टर वोट बैंक का दबाव भी काम कर रहा था। यह वोट बैंक महबूबा को समर्थन देने से नाराज था। फिलहाल महबूबा को दांव देकर भाजपा ने राष्टï्रवाद को धार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आने वाले दिनों में वह राष्टï्रवाद की नाव पर सवार होकर दिल्ली के तख्त पर कब्जा करने की कोशिश में जुटेगी।
…जम्मू-कश्मीर में आठवीं बार राज्यपाल शासन लागू हो चुका है और इस बार इसकी भूमिका भाजपा ने तैयार की है। पिछले दिनों भाजपा के वरिष्ठï नेता राममाधव ने शीर्ष नेतृत्व से बात करने के बाद महबूबा मुफ्ती सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी थी। घोषणा के साथ पीडीपी-भाजपा सरकार गिर गई। राम माधव ने महबूबा मुफ्ती पर ठीकरा फोड़ते हुए कहा था कि पीडीपी-भाजपा सरकार बनाने के पीछे दो प्रमुख मकसद थे। पहला, कश्मीर में शांति स्थापित करना और दूसरा राज्य का तेजी से विकास करना, लेकिन सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही पीडीपी ऐसा करने में नाकाम रही। सवाल यह है कि जम्मू-कश्मीर में सरकार गिराने के पीछे भाजपा का गेम प्लान क्या है? सच यह है कि आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा देश को यह संदेश देना चाहती है कि वह राष्ट्रवाद से किसी कीमत पर समझौता नहीं करेगी, भले ही इसके लिए उसे अपने सहयोगियों और सरकार का त्याग ही क्यों न करना पड़े। हैरानी की बात यह है कि अपने सहयोगियों को मनाने में जुटी भाजपा इस बार कड़े तेवर में दिखी। अभी तक भाजपा के सहयोगी ही उसका साथ छोड़ रहे थे लेकिन यह पहला मौका है, जब भाजपा ने अपने सहयोगी से नाता तोड़ लिया है। महबूबा मुफ्ती सरकार से भाजपा के अलग होने के बाद वहां राज्यपाल शासन लागू हो गया है और सेना ने सुपरसोनिक रफ्तार से ऑपरेशन ऑल आउट शुरू कर दिया है। इसकी पुष्टिï इस बात से भी होती है कि सीजफायर हटने के दो दिन के भीतर सेना ने सात खूंखार आतंकियों को मार गिराया और वहां लगातार सेना आतंकियों को खोजती फिर रही है।
गौरतलब है कि रमजान माह में सीजफायर के दौरान आतंकी हमलों में इजाफा हुआ था। पिछले महीने यानी 17 अप्रैल से 17 मई 2018 के बीच राज्य में 18 आतंकी हमले हुए थे, जबकि रमजान महीने में 66 हमले हुए। इनमें 20 ग्रेनेड हमले थे। इन घटनाओं में 41 लोगों की मौत हुई। इस साल रमजान से पहले के चार महीनों में करीब 70 आतंकी मारे गए थे। इससे जनता के बीच संदेश जा रहा था कि पीडीपी-भाजपा सरकार प्रभावी तरीके से आतंकवाद से नहीं निपट पा रही थी। दूसरी ओर सेना आक्रामक रुख अपनाए हुए है, ऐसे में भाजपा संदेश देना चाहती है कि कश्मीर में आतंकवाद का पूर्ण सफाया वही कर सकती है। भाजपा कश्मीर से आतंक के सफाए को बड़ा मुद्दा बनाना चाहती है और उसे उम्मीद है कि कश्मीर की सफलता से राष्ट्रवाद को घर-घर पहुंचान आसान होगा। दरअसल, कश्मीर में लगातार बढ़ती आतंकी घटनाएं भाजपा की छवि को काफी नुकसान पहुंचा रही थी। भाजपा की बड़ी परेशानी पाकिस्तान से बातचीत के साथ साथ अलगाववादियों और पत्थरबाजों से निपटने के तौर तरीकों पर महबूबा मुफ्ती के साथ मतभेद था। महबूबा बार-बार पाकिस्तान से बातचीत करने की हठ कर रही थी। यही नहीं वे पत्थरबाजों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई तक नहीं करना चाहती थी।
इसके अलावा वे सेना को भी निशाना बना रही थी। भाजपा को यह बात समझ में आ गई कि इस तरीके से महबूबा कश्मीर में अपना एजेंडा चला रही है और वे अपने वोट बैंक को सींचने में जुटी है। महबूबा से सियासी और गवर्नेंस का रिश्ता खत्म हो जाने के बाद अब भाजपा की नीतियां बेधडक़ रफ्तार भर सकती हैं। भाजपा इसे चुनाव के दौरान पूरे देश में बतौर गौरव गाथा पेश कर सकेगी। इसके अलावा अब कश्मीर के हालात पर कम से कम भाजपा महबूबा मुफ्ती पर ठीकरा फोड़ सकती है। रमजान में सीजफायर का प्रस्ताव भले महबूबा का रहा, लेकिन भाजपा ने इसका भी इस्तेमाल कर लिया।
जम्मू, जहां भाजपा पिछली बार जीती थी वहां भाजपा के कार्यकर्ता और समर्थक ही नहीं, आरएसएस के लोग भी नाराज थे। अब सेना और सुरक्षा बलों का ऑपरेशन भी बेधडक़ चलता रहेगा और सेना के खिलाफ कोई एक्शन लेने से पहले राज्य की पुलिस भी दो बार सोचेगी, लेकिन वैसा तो बिलकुल ही नहीं कर पाएगी जैसा उसने लितुल गोगोई के साथ किया। अब कठुआ रेप जैसी घटनाओं पर वैसी राजनीति भी नहीं होगी कि सरकार का एक धड़ा पीडि़त के साथ खड़ा हो और दूसरा आरोपियों के साथ। इसके अलावा आने वाले समय में भाजपा एक बार फिर धारा 370 की बात जोर-शोर से उठाएगी।

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