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मेहरबानी संग निगहबानी

चेतन गुरुंग

देहरादून। प्रधानमंत्री उत्तराखंड तो दूर देहरादून ही आ जाए, यही किसी जमाने में अद्भुत और बहुत बड़ी ब्रेकिंग न्यूज हुआ करती थी। नरेंद्र मोदी ने लगातार देहरादून और उत्तराखंड का दौरा करके इसको आज की तारीख में सामान्य घटना बना दिया है। आलम यह है कि सरकार के कारिंदों और खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को ही पता नहीं होता कि कब प्रधानमंत्री अचानक देहरादून या उत्तराखंड का रुख कर दें। इसके चलते वे हर तरह की परिस्थितियों के लिए तैयार रहते हैं। ये बात अलग है कि मोदी कब आयेंगे और आएंगे भी या नहीं, यह अंतिम वक्त तक तकरीबन गुप्त या फिर ढुलमुल रहता है। बात मोदी के उत्तराखंड के निरंतर हो रहे दौरे और यहां खास तौर पर ली जा रही दिलचस्पी की हो रही है। ऐसा लग रहा है कि मोदी का बार-बार उत्तराखंड आना सामान्य बात नहीं है। इसके पीछे सियासी विशेषज्ञ और मीडिया खास पहलू तलाशने लगे हैं। उनको लगने लगा है कि उत्तराखंड चार धाम के कारण मोदी के लिए बहुत खास है। अपने मिशन-2019 की कामयाबी के लिए वह केदार बाबा का खास आशीर्वाद चाहते हैं। केदार बाबा की धरती होने के कारण मोदी के लिए उत्तराखंड खास जगह बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर मोदी का देहरादून पहुंचना और यहीं मुख्य आयोजन होना इसकी मिसाल कही जा सकती है।

…..मोदी की केदार बाबा में अगाध निष्ठा और विश्वास का कारण है कि वह दो बार उसके दर पर विशेष तौर पर पहुंच कर पूजा अर्चना कर चुके हैं। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि उनको लगता है कि एक साल से भी कम अवधि में होने वाले लोकसभा चुनाव में उनकी और पार्टी की फतह केदार बाबा के आशीर्वाद और कृपा से मुमकिन है। सूत्रों के मुताबिक प्रधानमंत्री, मंत्रियों और बीजेपी के स्थानीय नेताओं से तो कम ही मिलते हैं, लेकिन मुख्य सचिव से प्रदेश के बारे में पूरी रिपोर्ट लेते रहते हैं। प्रदेश में क्या हो रहा है और विकास कार्यों का क्या हाल है तथा क्या प्रगति चल रही है, उसके बारे में उनको बारीक से बारीक जानकारी है। जब भी वह देश भर के मुख्य सचिवों से वीडियो कांफ्रेंस के जरिये बात करते हैं, उत्तराखंड के मुख्य सचिव को खास और अधिक समय देते हैं।
प्रधानमंत्री का उत्तराखंड को इस कदर तवज्जो दिए जाने से बीजेपी के लोग और आम जन खुश दिखते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के लिए ये दुतरफा कटार की धार पर चलने सरीखा है। ये ठीक है कि मोदी के उत्तराखंड को तवज्जो दिए जाने से उनको कई योजनाओं और कार्यों के बारे में केंद्र सरकार से काम कराने में आसानी रहती है, पर ये भी सच है कि उनकी हर एक और बारीक से बारीक गतिविधियों पर भी मोदी की नजर रहना खतरे से खाली नहीं कहा जा सकता है। राज्य में जरा सा भी कुछ गड़बड़ हुआ नहीं कि राज्य सरकार और राज्य बीजेपी को झाड़ पडऩे में देर नहीं लगेगी। एक कारण उत्तराखंड में मोदी की दिलचस्पी को लेकर ये भी समझा जा रहा है कि वह बारी-बारी से उन सभी राज्यों को अपने राडार पर ले कर वहां निजी तौर पर काम कर रहे हैं, जहां उनको आशंका है कि बीजेपी कमजोर पड़ रही है और चुनाव में नुक्सान पहुंच सकता है।
पिछले चुनाव में पार्टी को राज्य की पांचों सीटों पर कब्जा मिला था। मोदी इस बार पुनरावृत्ति चाहते हैं। ये नामुमकिन भी नहीं है लेकिन जिस तरह पिछले कुछ महीनों से बीजेपी और सरकार को लेकर मीडिया तथा सोशल मीडिया में प्रतिकूल प्रचार हो रहा है, उसको देखकर टीम मोदी-अमित शाह उत्तराखंड को लेकर बहुत सतर्क हो गए हैं। वे इस राज्य को किसी भी कीमत पर अपनी झोली से निकलने नहीं देना चाहते हैं। भले यहां सिर्फ पांच सीट ही हों। मोदी-शाह को पता है कि अगले चुनाव में एक-एक सीट को लेकर महाभारत हो सकता है। देश भर में पिछले चुनाव में जो मोदी लहर थी, उसका खुमार अब इतिहास बन चुका है। अलबत्ता, लोगों में मोदी का प्रभाव भले अभी भी है, लेकिन इसकी तुलना पिछले चुनाव के माहौल से नहीं हो सकती है। फिर इस बात का भी अहसास बीजेपी हाई कमान और मोदी-शाह को है कि ज्यादातर हिंदी पट्टी में पार्टी की जड़े कमजोर पड़ी है।
उत्तराखंड ऐसा राज्य है, जहां पार्टी अभी भी अन्य राज्यों की तुलना में मजबूत है। ऐसे में यहां वह एक भी सीट खोने को राजी नहीं है। ऐसे हाल में त्रिवेंद्र पर दबाव होना स्वाभाविक है अगर वह लोकसभा चुनाव में अपेक्षित नतीजे नहीं दे पाते हैं तो पार्टी के भीतर मौजूद शक्तिशाली विरोधियों को भरपूर मौका तो मिलेगा ही, उनके खिलाफ माहौल बनाने में, बल्कि हाई कमान भी उनकी तरफ से भृकुटी टेढ़ी कर सकता है.राज्य में आज आलम यह है कि कुछ मंत्री और पार्टी के कई दिग्गज नेता और विधायक सीधे त्रिवेंद्र से नाराजगी रख रहे हैं। इसकी एक बड़ी वजह त्रिवेंद्र का सरकार के कामकाज में गैर जरूरी दखल बर्दाश्त न करना और मंत्री परिषद की खाली दो सीटों को न भरना तथा लाल बत्तियां थोक भाव में न बांटना है। संभावना यह जताई जा रही है कि त्रिवेन्द्र ये सब खुद नहीं कर रहे.उनको आला नेतृत्व से ही इसके लिए हरी झंडी नहीं मिली होगी।
प्रधानमंत्री भले देवभूमि को खास तवज्जो देते नजर आ रहे हैं, लेकिन कांग्रेस ने इसको ही हथियार बनाने का फैसला किया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह मोदी, त्रिवेंद्र और बीजेपी को आड़े हाथों लेते हुए कहते हैं कि प्रधानमंत्री भले उत्तराखंड में नियमित रूप से आ रहे हैं और इस प्रदेश के प्रति अपना लगाव झलका रहे हैं, लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र को चाहिए कि इसका फायदा उठाया जाए अगर वह इसके बावजूद प्रदेश के लिए ग्रीन बोनस या स्पेशल राज्य का दर्जा हासिल करने में नाकामयाब रहते हैं तो मोदी के उत्तराखंड प्रेम का कोई मतलब नहीं रह जाता है.पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के मुताबिक मोदी देश के प्रधानमंत्री होने के नाते सबसे शक्तिशाली हैं। उनको चाहिए कि जिस देवभूमि के प्रति उनमें इतना सम्मान और श्रद्धा भाव है, वहां के लिए स्पेशल पैकेज जारी करें। केदार धाम में पांच साल पहले आई आपदा के बाद आज तक पुनर्वास कार्य चल रहे हैं, उसके लिए बहुत पैसे की दरकार है। जब कांग्रेस सरकार थी तो केंद्र सरकार से पर्याप्त आर्थिक मदद देने की गुजारिश की गई थी। उसको तब केंद्र ने राज्य में अपनी सरकार न होने के कारण अनसुना कर दिया था.अब तो बीजेपी ही दोनों जगह सरकार में है.फिर क्या दिक्कत है।

 

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