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ऐसे आयी थी इमरजेंसी

राष्ट्रपति से इमरजेंसी की घोषणा की सिफारिश करने से पहले श्रीमती गांधी ने अपने मंत्रिमंडल की बैठक तक नहीं बुलायी, जबकि लोकतांत्रिक तकाजों से यह जरूरी था। फिर तो ऐसी काली रात आयी, जिसकी सुबह 21 महीने बाद हुई। इस दौरान संविधान में अवांछनीय संशोधन करके लोकसभा का कार्यकाल बढ़ा दिया गया और आम चुनाव टाल दिये गये। इससे जो समय मिला, उसे श्रीमती गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी को ‘युवराज’ बनाने में लगाया गया। जेल में बंद लोकनायक जयप्रकाश नारायण के गुर्दे साजिशन खराब कर दिये गये लेकिन, 1976 बीतते-बीतते कुछ ऐसी खुफिया रिपोर्टें आयीं कि अब चुनाव हों तो श्रीमती गांधी की सत्ता में शानदार वापसी होगी, जिसके झांसे में आकर श्रीमती गांधी ने 18 जनवरी, 1977 को अचानक लोकसभा चुनावों का ऐलान करा दिया।

कृष्ण प्रताप सिंह

साल 1975 में 25-26 जून के बीच की रात तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा आंतरिक गड़बडिय़ों के बहाने देश पर थोप दी गयी इमरजेंसी के 43 साल बाद अपने निकटवर्ती इतिहास को समझने के क्रम में हमारा, खासकर हमारी युवा पीढ़ी का, यह जानना, साथ ही समझना बेहद जरूरी है कि उस त्रासदी ने कैसे न सिर्फ हमारे सारे मौलिक अधिकार छीन लिये, बल्कि आजादी का भी अपहरण कर लिया था।
प्रसंगवश, 1966 में, दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के ताशकंद में असामयिक व अप्रत्याशित निधन के बाद सत्ता संभालनेवाली इंदिरा गांधी ने 1975 से पहले एक इमरजेंसी 1971 में पाक से उस युद्ध के वक्त भी घोषित की थी, जिससे कुछ ही महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में जनता ने उनको उनकी समाजवादी नीतियों और ‘गरीबी हटाओ’ के जादुई नारे का भरपूर पुरस्कार दिया था। रायबरेली लोकसभा सीट पर उन्होंने खुद अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी राजनारायण को बड़े अंतर से हराया था। वह भी जब जीत के आत्मविश्वास से भरे राजनारायण ने मतगणना से पहले ही विजय जुलूस निकाल डाला था।
लेकिन इंदिरा गांधी अपना यह जादू देर तक कायम नहीं रख सकीं। विभिन्न कारणों से उनके खिलाफ देशभर में जनाक्रोश भडक़ ही रहा था कि 12 जून, 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने राजनारायण द्वारा दायर चुनाव याचिका का फैसला करते हुए उनको (श्रीमती गांधी को) सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग की दोषी पाया और रायबरेली से उनका चुनाव रद्द कर दिया।
फिर तो आक्रामक विपक्ष उनके इस्तीफे से कम पर संतुष्ट होने को तैयार नहीं रह गया। 24 जून, 1975 को सर्वोच्च न्यायालय ने सिन्हा के फैसले के खिलाफ श्रीमती गांधी की अपील पर स्थगन आदेश भी दिया, तो सांसद के तौर पर सारी भूमिकाएं व विशेषाधिकार उनसे छीन लिये। साफ कह दिया कि वे प्रधानमंत्री बनी रहें, तो भी लोकसभा में अपने मत का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं। इससे उनके खिलाफ आंदोलित विपक्ष का उत्साह इतना बढ़ गया कि उसकी अगुआई कर रहे लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने 24 जून को राजधानी दिल्ली में एक रैली में कह दिया कि पुलिस व सैन्य अधिकारियों को श्रीमती गांधी की तानाशाह सरकार के अनैतिक व अवैध आदेश नहीं मानने चाहिए।
जेपी के कथन को विद्रोह भडक़ाने की कोशिश मानकर श्रीमती गांधी ने 25-26 जून, 1975 की रात देश की आंतरिक सुरक्षा को विकट खतरा बताकर देश पर इमरजेंसी थोप दी, सारे विरोधी नेताओं को जेलों में ठूंस दिया, नागरिकों के सारे मौलिक अधिकार छीन लिये और अखबारों पर सेंसर लगा दिया.
हद यह कि राष्ट्रपति से इमरजेंसीकी घोषणा की सिफारिश करने से पहले श्रीमती गांधी ने अपने मंत्रिमंडल की बैठक तक नहीं बुलायी, जबकि लोकतांत्रिक तकाजों से यह जरूरी था। फिर तो ऐसी काली रात आयी, जिसकी सुबह 21 महीने बाद हुई। इस दौरान संविधान में अवांछनीय संशोधन करके लोकसभा का कार्यकाल बढ़ा दिया गया और आम चुनाव टाल दिये गये। इससे जो समय मिला, उसे श्रीमती गांधी के छोटे पुत्र संजय गांधी को ‘युवराज’ बनाने में लगाया गया। जेल में बंद लोकनायक जयप्रकाश नारायण के गुर्दे साजिशन खराब कर दिये गये लेकिन, 1976 बीतते-बीतते कुछ ऐसी खुफिया रिपोर्टें आयीं कि अब चुनाव हों तो श्रीमती गांधी की सत्ता में शानदार वापसी होगी, जिसके झांसे में आकर श्रीमती गांधी ने 18 जनवरी, 1977 को अचानक लोकसभा चुनावों का ऐलान करा दिया। इमरजेंसी फिर भी नहीं हटायी। चुनावों के नतीजे आने पर हटायी, जब न वे सिर्फ सत्ता से बाहर हो गयीं, बल्कि अपनी रायबरेली सीट भी नहीं बचा सकीं। दरअसल, उनके सलाहकारों ने चेताया कि उन्होंने अब भी इमरजेंसी नहीं हटायी तो नयी सरकार उसके तहत हासिल शक्तियों का उनके खिलाफ भी उनके जैसा ही दुरुपयोग कर सकती है।
समूची इमरजेंसी में श्रीमती गांधी अपने विरोधियों के इतने क्रूर दमन पर उतरी रहीं कि देश की लोकतंत्र समर्थक शक्तियों द्वारा प्रायोजित शांतिपूर्ण प्रतिरोधों की एक नहीं चल पायी। सेंसर लगाये जाने के बाद ज्यादातर अखबार व पत्रकार, जिन्हें झुकने को कहा गया था, लालकृष्ण आडवाणी के शब्दों में कहें तो रेंगने लगे थे। देखते ही देखते इमरजेंसी इस तरह फलने-फूलने लगी थी कि श्रीमती गांधी चुनाव में अपनी जीत के मुगालते की शिकार न हो जातीं, तो देश का इतिहास आज न जाने क्या होता! सर्वोच्च न्यायालय के जजों तक के हाथ इस तरह बांध दिये गये थे कि सत्तातंत्र द्वारा क की जगह ख को गोली मार दी जाये, तो भी वे जज कुछ नहीं कर सकते थे।
उन दिनों के अग्रगण्य संपादकों में से एक राजेंद्र माथुर को 1977 में 21 मार्च को किसी ने बहुत खुश होकर इमरजेंसी हटाये जाने की खबर दी, तो उनकी प्रतिक्रिया थी, इंदिरा गांधी ने जब तक उनका मन हुआ, हमारी आजादी और लोकतंत्र से खेल किया और मन भर गया तो खेलना बंद कर दिया। इसमें खुश होने जैसा क्या है? वह तो तब होता, जब देशवासी उनको विवश करके उनसे अपनी आजादी छीन लाते। राजेंद्र माथुर की यह सोच आज भी गहरे विमर्श की मांग करती है, क्योंकि 43 साल बीत जाने पर भी इमरजेंसी के अंदेशे घटे नहीं हैं।

 

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