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वजीरे आला या जिल्ले इलाही !

  • त्रिवेंद्र और बीजेपी पर मामला सुलझाने का भारी दबाव
  • लोकसभा चुनाव को देख कांग्रेस मुद्दा भुनाने में लगी
  • उत्तरा की मांग भले गैरकानूनी पर क़ानूनी पोस्टिंग कितनी ?
  • मुख्यमंत्री और मंत्रियो -नेताओ की बीवियों पर उठी ऊँगली 

चेतन गुरुंग @WeekandTimes

देहरादून। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र्र सिंह रावत को सादगी पसंद लेकिन प्रशासनिक मामलों में कम हुनरमंद माना जाता है। उनको मुंहफट समझा जाता है और यह भी प्रतिष्ठा उनकी है कि वह किसी की नहीं सुनते हैं, फिर सामने वाला शख्स पार्टी का बहुत बड़ा नेता या संघ का ही दिग्गज क्यों न हो। उनके इस गुण को अब तक खासियत इसलिए माना जाता था कि इससे सरकार में घुसपैठ करने की ताक में रहने वाले दलालों को बहुत झटका लगा। उनका यही गुण तब उनके, सरकार और बीजेपी के लिए बहुत बड़ा संकट बन गया जब उन्होंने भरे जनता दरबार में एक महिला शिक्षक उत्तरा पन्त बहुगुणा को पहले तो मुअत्तल करने फिर हिरासत में लेने का फरमान बिल्कुल नवाबों और सम्राटों के अंदाज में दे डाला। इसके बाद तो सोई पड़ी कांग्रेस और मृतप्राय उत्तराखंड क्रांति दल में जान सी आ गई। सोशल मीडिया के उस्तादों को मानो जबरदस्त ऑक्सीजन मिल गया। वे लट्ठ लेकर सरकार और त्रिवेंद्र पर पिल से पड़े हैं। पार्टी के भीतर भी त्रिवेंद्र के विरोधियों में सुगबुगाहट बढ़ गई है। पार्टी और सरकार में माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री को तैश में नहीं आना चाहिए था। अब बीच का सम्मानजनक रास्ता निकाल कर मामला खत्म करने की कोशिश पर विचार हो रहा है।

 

…..लोकसभा चुनाव एक साल भी नहीं रह गए हैं। ऐसे में पार्टी जल्द से जल्द इस मामले को दफन करना और लोगों की जेहन से निकालना चाहती है। मुख्यमंत्री ने अपने सरकारी आवास में आयोजित जनता दरबार में उस वक्त आपा खो सा दिया जब उत्तरा बहुगुणा ने उनके एक सवाल पर ये कह दिया कि मैंने ये भी नहीं कहा था कि वनवास भोगूंगी। उन्होंने मुख्यमंत्री से गुहार की थी कि उनके पति का निधन हो चुका है। वह 25 सालों से उत्तरकाशी में दुर्गम में तैनात हैं। बच्चे देहरादून में हैं। अब वह अपने बच्चों और नौकरी दोनों को नहीं छोड़ सकती है। लिहाजा देहरादून तबादला कर दिया जाए। सामने से आए जवाब से तैश में आए त्रिवेंद्र्र ने जब सभ्यता से बात करने की चेतावनी दी तो उत्तरा भी बुरी तरह भडक़ उठी। उन्होंने पहले तो कहा कि सभी नेता हैं लेकिन जब पुलिस उनको जबरन दरबार से हटाने लगी तो उन्होंने मुख्यमंत्री को ऐसे-ऐसे अलंकारों से नवाज दिया, जो कभी किसी मुख्यमंत्री ने कम से कम अपने सामने तो नहीं सुने। गुस्साए त्रिवेंद्र भी भूल गए कि वह जनसेवक और मुख्यसेवक हैं। उन्होंने तुरंत पुलिस को फरमान सुनाया कि इसको तत्काल कस्टडी में ले लिया जाए।
इस हादसा सरीखे वाकये को कई लोग मोबाइल पर रिकॉर्ड कर रहे थे। चंद मिनटों में ही ये नजारा और वाकया देश और देश से बाहर वायरल हो चुका था। जहंा लोग त्रिवेंद्र और बीजेपी सरकार पर हमले करने लगे थे वहीं ये दलील देने वाले भी सामने आने लगे कि शिक्षिका ही इस मामले में गलत है। उसको सरकारी सेवक होने के बावजूद अव्वल तो जनता दरबार में बिना अनुमति आने का हक नहीं है। उसका आचरण सरकारी सेवक आचरण नियमावली के एकदम खिलाफ है। फिर उसके रिकॉर्ड भी खंगाल डाले गए। बताया गया कि वह शुरू से ही ऐसी ही है। पिछले साल अगस्त से स्कूल नहीं गई है। निशंक और हरीश सरकार के दौरान भी मुअत्तल हो चुकी है। मुख्यमंत्री ने भले इस मामले में कोई राहत उत्तरा को अपनी ओर से नहीं दी लेकिन शिक्षा सचिव भूपेन्द्र कौर ने सरकार की तरफ से उत्तरा की ही गलतियों का जिक्र किया और बताया कि उसकी तबादले की मांग बेसिर पैर की है। वह उत्तरकाशी कैडर की है। उत्तरकाशी से बाहर उसका तबादला मुमकिन ही नहीं है। इस सबके बीच शिक्षा मंत्री अरविन्द पाण्डेय ने तत्काल उत्तरा से टेलीफोन पर बात की और उनको इन्साफ दिलाने का वादा किया लेकिन पार्टी और सरकार की तरफ से इस बारे में कोई अधिकृत बयान सामने नहीं आया। इस मामले के तूल पकडऩे के बाद कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने इस घटना को नारी शक्ति का अपमान करार दिया। पार्टी ने जगह-जगह सरकार और त्रिवेंद्र के पुतले फूंके। सोशल मीडिया और बाद में अखबारों में ये मुद्दा भी उछलने लगा कि आखिर मुख्यमंत्री की शिक्षिका पत्नी 22 सालों से देहरादून में रह सकती है और कई अन्य मंत्रियों तथा विधायकों-सांसदों की बीवियों को मनमाफिक तैनाती दी जा सकती है तो फिर उत्तरा के साथ ही ना-इंसाफी क्यों? ये मानने वाले कम नहीं है कि लोक सभा चुनाव के साल में त्रिवेंद्र की ये गलती किसी खता सरीखी न साबित हो जाए। लोग तो ये तक कयास लगाने लगे हैं कि क्या उत्तरा काण्ड त्रिवेंद्र के सियासी जीवन को झटका तो नहीं देगा। हालांकि, सियासी समीक्षक इसको महज कयास से ज्यादा मानने को राजी नहीं हैं। त्रिवेंद्र पर पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बहुत आशीर्वाद और यकीन है। उत्तरा सरीखे वाकयों से उनको बड़ा झटका लगने की कोई सम्भावना नहीं है।
त्रिवेंद्र के दरबार में दिखाए गए रुख और बर्ताव पर जरूर अंगुली उठाई जा रही है कि क्या उनको इस तरह गुस्से में आ जाना चाहिए था, भले महिला शिक्षिका आपा खो रही थी। मुख्यमंत्री ने जिस तरह मुअत्तल करने और हिरासत में लेने के आदेश दिए उसको ले कर भी ऐतराज जताया जा रहा है कि ये मुख्यमंत्री को शोभा नहीं देता। वह कोई सम्राट या जिल्ले ईलाही नहीं हैं। उनको संयम रखना चाहिए था। एक विधवा शिक्षिका के दर्द को समझ कर उसका उचित हल निकालने का आश्वासन दिया जाना ज्यादा जरूरी था। इस वाकये ने सरकार, बीजेपी और खुद त्रिवेंद्र की छवि पर गहरा धक्का लगा है। तीनों की समझ में आ गया है कि उनसे चूक हो गई है लेकिन अब माफी मांगने का मतलब सियासी तौर पर हाराकिरी करना होगा। खास तौर पर लोक सभा चुनाव के करीब होने के कारण ऐसे में पार्टी और सरकार किस तरह इस संकट से निकलती है और कितनी जल्दी निकलती है, इस पर सबकी नजर है। ये मामला जितना लम्बा खिंचेगा उतना दर्द दोनों को देगा, ये तो माना जा रहा है कि सरकार उत्तरा को राहत जरूर देगी। चाहे कोई भी रास्ता निकालना पड़े। इसकी पीछे पार्टी और सरकार को मुख्यमंत्री तथा सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं की बीवियों की सुगम में तैनाती को ले कर उठ रहे सवालों के जवाब न सूझना भी है। पार्टी के तेज तर्रार किस्म के विधायक मुन्ना सिंह चौहान मुख्यमंत्री की पत्नी की सुगम में तैनाती के पक्ष में सामने तो आए लेकिन उसकी खिल्ली ज्यादा उड़ी। पूर्व बीजेपी नेता सुभाष शर्मा ने तो मुख्यमंत्री की पत्नी सुनीता रावत की नियुक्ति और उनकी शैक्षिक योग्यता पर ही अंगुली उठा डाली है।

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