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राष्ट्रीय सुरक्षा देशभक्ति और सवाल

एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के लिए किसी युद्ध अथवा घोषित राष्ट्रीय संकट के दौरान यह बिल्कुल सही है कि वह उचित फैसले ले। ऐसे में सभी सियासी पार्टियों को भी ऐसे फैसलों के समर्थन में एकजुट होकर आगे आना ही चाहिए। जद (यू) ने तब सत्तारूढ़ गठबंधन का एक सदस्य होने की बजाय विपक्ष में होते हुए भी आतंकवादी अड्डों पर सितंबर 2016 में हुए सर्जिकल स्ट्राइक का इसी भावना के अंतर्गत समर्थन किया। हमने अपने सशस्त्र बलों के साहस और वीरता के प्रति अपना गहरा प्रशंसा भाव दर्ज कराया था और उसके लिए किसी सबूत की मांग नहीं की थी। पार्टी का ऐसा रुख इस तथ्य की सीधी स्वीकृति पर आधारित था कि तत्कालीन सरकार गोपनीय सूचनाओं के आधार पर राष्ट्रीय हित में ऐसे फैसले लेने की सर्वोत्तम स्थिति में होती है और ऐसे मामलों में केवल राजनीतिक पक्षधरता के आधार पर सवाल खड़े नहीं किये जाने चाहिए।

पवन के वर्मा

सच कहूं, तो मेरे लिए अब यह समझ पाना बिल्कुल असंभव हो गया है कि देशभक्ति की परिभाषा क्या है, कौन देशभक्त है और कौन नहीं है, कौन-सी चीज किसी को देशभक्त कहला सकती है और कौन किसी पर राष्ट्रद्रोही होने का ठप्पा लगा दे सकती है। सियासी निंदा और गैर जानकारी के बढ़ते शोर-शराबे में अब कोई दलील देने, बहस-विमर्श कर पाने, पूछने, सुनने, प्रशंसा अथवा आलोचना करने की कोशिशें व्यर्थ हो चली हैं, क्योंकि ऐसी किसी भी कोशिश को तुरंत ही एक खांचे में डाल उसे ढांप दिया जाता है तथा सारा प्रयत्न उस संदेशदाता को बदनाम करने पर केंद्रित हो जाया करता है।
भारत जैसे एक सभ्यता-राज्य के लिए राष्ट्रीय विमर्श का ऐसा चरित्र एक आपदा के अलावा और कुछ भी नहीं है। हमारी सभ्यता की बुनियाद शुरू से ही मौलिक सोच पर आधारित रही है। इसी तरह, हमारा स्वतंत्रता संग्राम भी एक उच्च बौद्धिक बुनियाद पर टिका रहा था और एक पक्ष के लोगों को भी आपस में मतभिन्नता रखने तथा प्रश्न एवं बहस करने की आजादी हासिल थी। पिछले वर्षों में अब हो यह गया है कि किसी भी ऐसे व्यक्ति की निष्ठा पर सवाल खड़े कर दिये जाने लगते हैं, जो राजनीतिक ध्रुवीकरण के किसी एक ध्रुव पर नजर नहीं आता। सच तो यह है कि अब स्वयं विमर्श ही संदेह की परिधि में पहुंच चुका है। यदि इस संबंध में आपको कोई शुबहा हो, तो हमारे अग्रणी टीवी चैनलों में से किसी पर भी होती ‘बहसों’ का मुलाहिजा फरमाइए।
मैं इस मुद्दे को खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा के संदर्भ में उठाना चाहता हूं। कोई शक नहीं कि यह एक संवेदनशील मामला है। एक चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार के लिए किसी युद्ध अथवा घोषित राष्ट्रीय संकट के दौरान यह बिल्कुल सही है कि वह उचित फैसले ले। ऐसे में सभी सियासी पार्टियों को भी ऐसे फैसलों के समर्थन में एकजुट होकर आगे आना ही चाहिए। जद (यू) ने तब सत्तारूढ़ गठबंधन का एक सदस्य होने की बजाय विपक्ष में होते हुए भी आतंकवादी अड्डों पर सितंबर 2016 में हुए सर्जिकल स्ट्राइक का इसी भावना के अंतर्गत समर्थन किया। हमने अपने सशस्त्र बलों के साहस और वीरता के प्रति अपना गहरा प्रशंसा भाव दर्ज कराया था और उसके लिए किसी सबूत की मांग नहीं की थी। पार्टी का ऐसा रुख इस तथ्य की सीधी स्वीकृति पर आधारित था कि तत्कालीन सरकार गोपनीय सूचनाओं के आधार पर राष्ट्रीय हित में ऐसे फैसले लेने की सर्वोत्तम स्थिति में होती है और ऐसे मामलों में केवल राजनीतिक पक्षधरता के आधार पर सवाल खड़े नहीं किये जाने चाहिए। यह भी अपेक्षित ही था कि केंद्रीय सरकार राष्ट्रीय हित की रक्षा के लिए किये इस कृत्य से किसी किस्म का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश नहीं करेगी।
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही था कि तब कुछ राजनीतिक नेताओं तथा पार्टियों ने इस स्ट्राइक के अस्तित्व पर ही सबूत की मांग कर दी थी। ऐसे अवांछित और गलत उकसावे के प्रत्युत्तर में सरकार का सही उत्तर यही होना चाहिए था कि वह अति-प्रतिक्रिया से बचते हुए डीजीएमओ तथा अन्य वरीय सेना अधिकारियों द्वारा कथित बिंदुओं को बार-बार दोहराती रहे कि क्या उपलब्धि हासिल की गयी. पर उस स्ट्राइक के बीस महीने बाद अब सरकार ने उसका एक ‘संपादित’ वीडियो जारी करने पर अपनी रजामंदी दे दी। जब ऐसे किसी सबूत की मांग नहीं की जा रही थी, तब उसे मुहैया करना क्या राष्ट्रीय सुरक्षा को हानि नहीं पहुंचा सकता है? किसके द्वारा अधिकृत किये जाने पर इस तरह का ‘संपादित’ वीडियो तैयार किया गया? उसे कैसे ‘लीक’ किया गया? क्या सरकार इस तरह की संवेदनशील चीज ‘लीक’ करनेवालों के विरुद्ध किसी कार्रवाई की योजना बना रही है, और यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
यदि सरकार ने ऐसा महसूस किया कि इस तरह का सबूत सार्वजनिक रूप से साझा नहीं किया जा सकता, तो क्यों रक्षा मंत्रालय ने इसे आधिकारिक रूप से जारी कर इसका स्वामित्व स्वयं स्वीकार नहीं किया? और सबसे अंत में, यह कैसे संभव हो सका कि कुछ मीडिया प्रसारकर्ता इस वीडियो को उद्घाटित करने का विराट श्रेय ले रहे हैं, जबकि दूसरों को इस हेतु उपकृत नहीं किया गया? एक दूसरा प्रश्न यह है कि सरकार भविष्य में क्या करने की योजना बनाने जा रही है, ताकि पाकिस्तान द्वारा युद्धविराम की लगातार बढ़ती घटनाएं रुक सकें? इस मुद्दे पर ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश का सर्जिकल स्ट्राइक की तथ्यात्मकता से कोई संबंध नहीं है, जो एक बंद हो चुका अध्याय है और जो संदेह अथवा बहस की वस्तु नहीं रह गया है। यह चिंता का विषय है कि पाकिस्तान द्वारा युद्धविराम के उल्लंघन की घटनाओं में बहुत बढ़ोतरी हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार ही साल 2017 में ऐसे 110 उल्लंघन हुए जबकि 2018 के पहले चार महीनों में यह संख्या बढक़र 300 तक जा पहुंची। इससे जहां हमारे सुरक्षा बलों के लोग शहीद हुए हैं, वहीं बेकसूर नागरिकों की मौतों के अतिरिक्त संपत्तियों को भी अपूरणीय क्षति पहुंची है।
इस परिस्थिति के मुकाबले के लिए सरकार क्या करने जा रही है, यह पूछना क्या गलत है? अथवा क्या इस तरह की बहसें उस लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा नहीं हैं, जहां सभी नागरिक और सभी जिम्मेदार सियासी दल राष्ट्रीय हित के हितधारक होते हुए बगैर राष्ट्रद्रोही कहलाये राष्ट्र के विरुद्ध क्षति से संबद्ध मुद्दे उठा सकते हैं? इसके विपरीत, तथ्य तो यह है कि हमारे जैसे लोकतंत्र में ऐसी बहसें संभव ही नहीं, पूरी तरह वांछनीय भी हैं और यही वह चीज है, जो भारत को पाकिस्तान से भिन्न बनाती है। वक्त आ गया है, जब राष्ट्रीय सुरक्षा से संबद्ध विषयों के संबंध में बेजरूरी संदेह और बेवजह की अतिशयोक्ति के बीच के उचित मध्यम स्थल की तलाश की जाये। राष्ट्रीय सुरक्षा से संबद्ध मुद्दों पर भी सही सवाल उठाना सियासी विपक्ष का काम ही है। दूसरी ओर, सरकार का काम है कि वह प्रश्नकर्ता की नीयत पर सवाल उठाये बगैर उसका उचित उत्तर दिया करे। परिपक्व लोकतंत्र की यही कार्यप्रणाली हुआ करती है। पर यदि हम सावधान न रहे, तो अतिराष्ट्रवाद के नाम पर लोकतंत्र की जगह जल्दी ही भीड़तंत्र ले लेगा, जो एक सभ्यता-राज्य के रूप में हमारी विश्वसनीयता के साथ कुछ भी न्याय न कर सकेगा।

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