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भ्रष्टाचार, लापरवाही और सडक़ ने छीन ली जिंदगियां

  • धुमाकोट बस हादसे ने फिर खोली तंत्र की पोल
  • छोटे अफसरों की मुअत्तली से कुछ नहीं होगा
  • सरकार को भी लेनी होगी हादसों की जिम्मेदारी

चेतन गुरुंग

देहरादून। धुमाकोट के करीब जब अपनी क्षमता से दुगुने मुसाफिर ठूंस के चल रही 30 सीटर बस गहरी खाई में जा गिरी तो एक साथ 48 लोगों की जिन्दगी का सफर भी खत्म हो गया। बाकी जो बचे उनमें भी कई बहुत गंभीर रूप से घायल हैं। कहा नहीं जा सकता कि उनमें भी कितने जिंदगी की लड़ाई जीत पाएंगे। इसको पहाड़ का अब तक का सबसे भीषण हादसा माना जा रहा है। जब हरिद्वार, देहरादून, काशीपुर और धुमाकोट में हादसे में मारे गए लोगों की चिताएं जल उठीं तो ये सवाल सबसे ज्यादा ज्वलंत बन कर उभरा। आखिर पहाड़ में भ्रष्टाचार, इसके गर्त में डुबो कर बने गई सडक़ें और सरकार की लापरवाही कब तक इस तरह लोगों की जिंदगी छीनती रहेगी। क्यों न इन हादसों के जिम्मेदार अफसरों और मंत्रियों पर लापरवाही नहीं बल्कि हत्या का मामला चलाया जाए। ताज्जुब तो इस पर कि इतने बड़े हादसे के बावजूद पुलिस और परिवहन महकमा चेता नहीं और दो दिन बाद ही फिर एक ओवर लोडिंग जीप मसूरी के करीब खड्डे में जा गिरी। इसमें भी एक गर्भवती महिला की जान चली गई।
सरकार ने पौड़ी की परिवहन कर अधिकारी नेहा झा और धुमाकोट के थाना प्रभारी को मुअत्तल कर दिया, मानो इतना काफी है। हालांकि गढ़वाल के आयुक्त दिलीप जावलकर और डीआइजी पुष्पक ज्योति को भी इसी हादसे के तुरंत बाद बदल दिया गया। स्टडी लीव से लौटे शैलेश बगौली को आयुक्त और शासन में अपर सचिव अजय रौतेला को डीआईजी बना के भेजा गया, लेकिन हकीकत अलग है। ये तैनातियां पहले से तय थीं। सिर्फ बगौली के ड्यूटी ज्वाइन करने का इन्तजार किया जा रहा था। वह जैसे ही आए उनको आयुक्त बना दिया गया। ऐसे ही पुष्पक को भी बदला जाना तय था। बस सरकार ने अपनी पीठ थपथपाने के लिए हादसे के बाद ये बदलाव किए। मीडिया ने भी सरकार की वाहवाही की कि उसने इतने बड़े अफसरों को लपेट दिया।
शुरूआती जांच से जो पता चला है उससे साफ हो जाता है कि धुमाकोट हादसा सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार तथा लापरवाही का अंजाम था। आखिर बस में दुगुने मुसाफिर सवार हों और न पुलिस और न परिवहन महकमे के लोगों को ये दिखे, मुमकिन नहीं है। ये वे महकमे हैं, जहां के लोग एक मील दूर से भी उस चींटी को देख लेते हैं, जो शक्कर लेकर गुजर रही हो। फिर शक्कर छीनकर ही मानते हैं वे। फिर ये बस क्या पहली बार ही दुगुनी सवारी लेकर आ रही थी। ये सिर्फ मिलीभगत का खेल था। जो बस स्वामी, पुलिस और परिवहन महकमे के लोग मिल कर खेल रहे थे। ऐसे और भी न जाने कितनी बसें अभी भी चल रही होंगी, जिन पर हादसा होने तक नजर नहीं जाएगी।
सरकार ने पहाड़ों में हादसों को रोकने के लिए दिखावे के लिए तमाम कायदे और नियम बनाए हुए हैं। ये सिर्फ इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा दे रहे हैं और उनकी जेब को गर्म करने के साथ ही भ्रष्टाचार का नया रास्ता खोल दिया है। धुमाकोट हादसा कोई छोटा नहीं है जिसको आसानी से भुला दिया जाए और छोटे लोगों को नाप कर पीठ अपनी थपथपा ली जाए। इस मामले में पीडब्ल्यूडी भी बराबर रूप से जिम्मेदार है। जिस जगह हादसा हुआ, वहां सडक़ बुरी तरह उधड़ी ही नहीं थी बल्कि बहुत बड़ा गड्ढा भी था।
कहा जा रहा है कि उस गड्ढे को बचाने के फेर में ही चालक बस से नियंत्रण खो बैठा। उस इलाके के सम्बंधित इंजीनियरों पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान पर भी कोई आंच नहीं आई। क्या उनका कोई दायित्व नहीं बनता था, हादसों को रोकने के लिए। डीएम तो हादसा स्थल पर नौ घंटे बाद पहुंचे। हालांकि अब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कह दिया है कि अगर गड्ढों के कारण कोई हादसा हुआ तो इंजीनियर नाप दिए जाएंगे।

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