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लोकसभा चुनाव: जातीय समीकरण साधने के लिए राजनीतिक दलों ने शुरू किए दांव-पेच

  • उत्तर प्रदेश में जाति का जुगाड़ दिलाती रही है जीत वोट बैंक को बचाना सबसे बड़ी चुनौती
  • सपा, बसपा और भाजपा चल रही है चाल, कांग्रेस भी जनाधार मजबूत करने की जुगत में

वीक एंड टाइम्स न्यूज नेटवर्क

लखनऊ। लोकसभा चुनाव की आहट जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही है, सियासी दलों ने दांव-पेच चलने शुरू कर दिए हैं। चुनाव की जंग जीतने के लिए सभी दलों के दिग्गजों ने जातीय समीकरण पर फोकस कर दिया है। सपा पिछड़ी और बसपा दलित वोट बैंक को बचाए रखने के साथ अगड़ी जातियों पर भी डोरे डाल रही है। वहीं भाजपा की नजर दलित वोट बैंक पर टिकी है। कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार मजबूत करने के लिए दलितों के मुद्दे लगातार उठा रही है।
यूपी में विकास करने और कराने के दावे अक्सर फेल हो जाते हैं क्योंकि यहां जीत की दिशा जाति से तय होती है। जातीय समीकरण यहां बेहद महत्वपूर्ण हैं। जिस पार्टी ने जातीय जुगाड़ बैठा लिया उसकी जीत पक्की समझी जाती है। हाल में हुए लोकसभा उपचुनाव परिणामों से भी इसकी पुष्टिï होती है। यहां सपा-बसपा गठबंधन ने दलित और पिछड़ों को एकजुट कर दिया और चुनाव में भाजपा चारों खाने चित हो गई। इसी के मद्देनजर सियासी दलों ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए राजनीतिक जोड़-तोड़ शुरू हो गई है। भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस सभी अपनी जीत पक्की करने के लिए जातीय जुगाड़ सेट करने में लग गई हैं। यूपी में लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का यहां पर जातीय समीकरण शुरू से ही अहम भूमिका निभाता आया है। सियासी दल विकास के जितने भी दावे करें टिकटों के बंटवारे के समय जातीय समीकरणों को ही प्राथमिकता देत हैं। यहां अगड़ी, पिछड़ी, दलित जाति का वोट बैंक हर पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में कोई दल पिछड़ी व दलित तो कोई दल अगड़ी जातियों और दलित को लेकर समीकरण बनाता है। कई दल अगड़ी और पिछड़ी जाति को लेकर भी समीकरण साधने की कोशिश करते हैं। गौरतलब है कि यूपी की राजनीति में दलितों की अहम भूमिका रहती है। 25 फीसदी दलितों का वोट यहां राजनीति में बड़ा मायने रखता है। वैसे तो इस वोट को बसपा का वोटबैंक माना जाता रहा है, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इसमें बड़ी सेंधमारी की थी। वोट भाजपा के पक्ष में गया। इसके चलते भाजपा ने यूपी में भारी जीत दर्ज की थी। इसके बाद अगड़ी जाति का वोट बैंक है जो कई जातियों में बंटा हुआ है। यह प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अगड़ी जातियों में मुख्य रूप से ब्राह्मण, ठाकुर आते हैं। इन दोनों के वोटों पर सभी राजनीति पार्टियों की नजरें होती हैं। इसके अलावा पिछड़ी जातियों का वोट बैंक भी यूपी के चुनाव में अहम भूमिका निभाता है। इन्हीं समीकरणों को देखते हुए सभी दल सक्रिय हो गए हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह लगातार यूपी पर नजर रख रहे हैं। वे यूपी का दौरा कर रहे हैं। भाजपा संगठन को मजबूत करने और अन्य जातियों की नब्ज टटोल रहे हैं। इसी तरह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी यूपी का हाल में दौरा किया। उनकी नजर भी अगड़ों, मुस्लिमों और दलितों के वोट पर लगी हुई है।

सबके अपने-अपने वोट बैंक

विभिन्न दलों के अपने-अपने वोट बैंक हैं। सपा को पिछड़ी जाति का अगुवा माना जाता है तो बसपा को दलित वोट बैंक का पैरोकार माना जाता है। भाजपा को अगड़ी जाति के वोट मिलते हैं। जातीय समीकरण के अतिरिक्त यूपी में 18 प्रतिशत मुस्लिम वोट और पांच प्रतिशत जाट वोट हैं। ये दोनों भी प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं। इन पर भी तमाम दलों की नजर रहती है। यूपी में 25 फीसदी दलित और 35 फीसदी पिछड़ी जाति का वोट किसी भी पार्टी के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं। अगर ये दोनों वोट किसी भी दल की ओर जाते हैं तो उसकी जीत पक्की मानी जाती है।

किस जाति का कितना प्रतिशत

यूपी में दलितों का वोट 25 प्रतिशत है जबकि ब्राह्मïणों का 8, ठाकुर का 5 और अन्य अगड़ी जाति का वोट प्रतिशत तीन है। कुल मिलाकर अगड़ी जाति का वोट प्रतिशत 16 फीसदी है। वहीं पिछड़ी जाति के वोटों का प्रतिशत 35 है। इसमें 13 प्रतिशत यादव, 12 प्रतिशत कुर्मी और 10 प्रतिशत अन्य जातियों के लोग हैं। ऐसे में जिस पार्टी ने यूपी में जातीय गणित को साध लिया उसकी जीत पक्की है।

तीस प्रतिशत वोट पर जीत तय
राजनीति में वैसे तो कई समीकरण मायने रखते हैं, लेकिन यूपी में जो भी पार्टी तीस फीसदी वोट पा जाती है उसकी सरकार बननी तय रहती है। 2019 में लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में भाजपा विकास के दावे चाहे जितने भी करे उसकी भी नजरें जाति के जुगाड़ पर टिकी है। फिलहाल यूपी में राजनीतिक माहौल बदल चुका है। सपा-बसपा ने मिलकर लोकसभा चुनाव लडऩे की घोषणा की हैं। लिहाजा भाजपा के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव 2014 की तरह आसान नहीं होगा।

 

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