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अफवाह का सिर कुचलना जरूरी है

आलोक बी लाल

पिछले कुछ समय से देश के अलग-अलग कोनों से दिल दहलाने वाली खबरें मिल रही हैं। व्हाट्सएप और दूसरे चैनलों पर अफवाहें उड़ती हैं और लोग उनपर यकीन कर लेते हैं। बात इतनी ही होती तो ठीक था, लेकिन इन अफवाहों को सही मानकर नागरिक कानून को अपने हाथ में ले लेते हैं और हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। असम में हुई एक घटना ने सबसे पहले सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। वहां बच्चा अगवा करने वाले गैंग के विषय में सोशल मीडिया पर अफवाह को सच मानकर कारबी आंगलोंग जिले के एक गांव में पिकनिक मनाने आये दो लडक़ों को पीट-पीट कर मार डाला। इस प्रकार से मार देने को अंग्रेजी में लिंचिंग कहते हैं। सिर्फ शक के आधार पर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के बाद भी हत्या का यह मामला अभी सुर्खियों में ही था कि देश के अन्य भागों से भी ऐसी ही घटनाओं की खबर आने लगीं। महाराष्टï्र जैसे प्रगतिशील प्रदेश में तो हद हो गयी। पिछले लगभग 25 दिनों में 14 ऐसे मामले प्रकाश में आये जिसमे शक के आधार पर नौ अनजान लोगों की जान लेली गयी। स्पष्टï रूप से किसी भी सभ्य समाज के बीच इस प्रकार की अराजकता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। महाराष्टï्र के ही धुले नामक स्थान पर तो पांच लोगों को भीड़ ने इतना मारा कि उनकी दिन-दहाड़े भीड़-भाड़ से भरे बाभर में नृशंस हत्या कर दी गयी।
कहीं पर बच्चे उठाने वालों की अफवाह तो कहीं गोहत्या की, कोई भी बात उड़ा दी जाती है और सोशल मीडिया पर आग की तरह फैला दी जाती है। प्रतिक्रिया स्वरुप भीड़ हिंसा पर उतारू हो जाती है और खून बहा दिया जाता है। ऐसा क्या होता है कि यकायक कुछ लोग इतने आक्रामक हो जाते हैं कि बिना बात की सच्चाई जाने दूसरे की जान लेने के पहले सफाई देने का मौका भी नहीं देते? दूसरा प्रश्न यह उठता है कि ऐसी घटनाएं और न हों उसके लिए क्या कदम उठाये जाने चाहिए? पहले प्रश्न का उत्तर तो मनोवैज्ञानिक ही ठीक से दे सकते हैं। सामान्यतया यह कहा जाता है कि व्यक्तिगत व्यवहार और भीड़ के बीच वाला व्यवहार एक सा नहीं होता, और अगर भीड़ के बीच उन्माद फैल जाता है तो उस भीड़ में खड़ा एक व्यक्ति भी भीड़ की तरह से व्यवहार करने लगता है। लेकिन पुलिस अधिकारी का अनुभव रखने वाला दूसरे प्रश्न का अधिक आधिकारिक उत्तर दे सकता है।
सबसे पहले तो यह आवश्यक है कि अफवाह फैलने पर तत्काल जांच की जाये और सच्चाई का पता लगाया जाए। आम जनता को वास्तविकता से अवगत करने के लिए हर प्रकार के सूचना तंत्र का इस्तेमाल किया जाए। इसमें सोशल मीडिया का प्रभावी उपयोग भी सम्मिलित है। समाज में प्रभाव रखने वालों को टीवी और समाचार पत्रों के जरिये आम नागरिकों को अफवाहें सुनने और उन्हें फैलने से रोकने के लिए अपील करनी चाहिए। पुलिस और प्रशासन के लिए जरूरी है कि अफवाह फैलाने वालों की पहचान की जाये और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्यवाही की जाये। जिलों में सूचना केन्द्रो और थानों चौकियों पर भी घोषणा की व्यवस्था की जाये। हल्कों में गश्त पर जोर दिया जाए, ऐसे स्थानों को चिन्हित किया जाए जहां उन्माद फैलने की अधिक संभावना प्रतीत होती हो।
स्कूल-कॉलेज में विद्यार्थियों तक उचित सन्देश पहुंचाना भी कारगर साबित होगा। कुल मिला कर पुलिस और प्रशासन की चौकसी और उद्देश्य-बद्धता पारदर्शी होनी चाहिए। ढुलमुल रहने से काम नहीं चलेगा। हर स्तर पर प्रत्येक कर्मचारी को तगड़ा कर्तव्यबोध कराया जाना आवश्यक है। सिपाही से लेकर प्रधान मंत्री तक सभी यह चाहते हैं कि निरर्थक हिंसा पर लगाम लगे। यह हमेशा ही छिपी बात नहीं है कि अफवाह फैलाने के पीछे क्या उद्देश्य हैं, और वह कौन लोग हैं जो ऐसी घृणित हरकतें करते हैं। अगर शासन-प्रशासन का रवैया सख्त है और उसका उद्देश्य पारदर्शी है तो कोई कारण नहीं कि ऐसी घटनाओं को नियंत्रित न किया जा सके और अपराधियों को सजा न दिलवाई जा सके। भीड़ बनाम सरकार का अगर प्रश्न है तो जाहिर है कि इसका उत्तर क्या होना चाहिए। यह कोई ऐसी पहेली नहीं है जिसका हल ढूंढने के लिए दिमाग पर ज्यादा जोर देना होगा। स्पष्ट है कि सभी चाहेंगे कि कानून-सम्मत कार्यवाही हो। एक सभ्य समाज ने जो प्रक्रिया निर्धारित की है उसका आदर सभी नागरिक करना चाहेंगे। भीड़ का कोई कानून नहीं होता, विशेष रूप से अगर वह किसी भ्रम के चलते उन्माद में आ चुकी है। ऐसे विधि-विरोधी सम्मलेन को तो नियंत्रित किया ही जाना चाहिये। कानून सर्वोच्च है और उसमे अराजकता के लिए शून्य स्थान है। देश में उभर रहे भीड़ के कानून की प्रवृत्ति को जड़ से नष्ट करना वक्त की पुकार है।
(लेखक भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक हैं)

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