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उत्तर प्रदेश में आसान नहीं गठबंधन की डगर अकेले चुनाव लडऩे की तैयारी कर रही कांग्रेस

  • गिरते जनाधार ने गिराई पार्टी की राजनैतिक हैसियत, गठबंधन हुआ तो कम मिलेंगी सीटें
  • संगठन को मजबूत करने में जुटे कांग्रेस नेता कांग्रेस सेवा दल को भी सक्रिय करने की कोशिश

मुजाहिद जैदी

लखनऊ। लोक सभा चुनाव की तैयारियों में अन्य दलों की तरह कांग्रेस भी जुट गई है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में संगठन के कायाकल्प की कोशिशें जारी हैं। कांग्रेस सेवा दल को भी सक्रिय करने की तैयारी की जा रही है। इसके अलावा कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व 2019 में भाजपा और मोदी का विजय रथ रोकने के लिए उत्तर प्रदेश में गठबंधन की जमीन भी तलाश रही है। हालांकि गठबंधन को लेकर पार्टी नेतृत्व पूरी तरह स्पष्टï नहीं है। वह अभी भी सशंकित है। यदि कांग्रेस सपा-बसपा से गठबंधन करती है तो उसे दोनों दलों द्वारा निर्धारित सीटों पर ही चुनाव लडऩा होगा। फिलहाल इसके लिए कांग्रेस नेता अभी पूरी तरह तैयार नहीं दिख रहे हैं। लिहाजा वे अकेले दम पर उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं।
जब खोने को कुछ न हो तो पाने की संभावना बढ़ जाती हैं लेकिन यह तर्क उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पर लागू नहीं होता दिख रहा है। यहां कांग्रेस के हिस्से में पाने के बजाय खोने का ही दौर जारी है। हालांकि गुजरात में भाजपा को कड़ी टक्कर देने और कर्नाटक में गठबंधन की सरकार बना लेने के बाद कांग्रेस के हौसले कुछ बढ़े हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जमीन काफी पहले दरक चुकी है। कांग्रेस यहां अपना जनाधार पूरी तरह खो चुकी है। पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन उम्मीद के मुताबिक उसे इसका कोई फायदा नहीं मिला था। गोरखपुर, फूलपुर की लोक सभा सीटों पर हुए उपचुनाव में सपा-बसपा की दोस्ती ने भाजपा को शिकस्त दी थी। इसके बाद कैराना लोक सभा और नूरपुर विधान सभा चुनाव में सपा ने रालोद के साथ भाजपा को एक बार फिर पटखनी दी। कैराना लोकसभा की सीट रालोद और नूरपुर विधानसभा सीट सपा की झोली में गिरी। इन परिणामों को देखते हुए कांग्रेस इन दोनों पार्टियों के साथ सम्मानजनक समझौते की तलाश कर रही है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और बसपा प्रमुख मायवती की नजदीकियों ने दोनों के बीच गठबंधन की संभावना पैदा कर दी है। इसी के मद्देनजर कांग्रेस के वरिष्ठï नेता यूपी में गठबंधन करने की संभावना देख रहे हैं।
यूपी में कांग्रेस की यह स्थिति एक दिन में नहीं आई है। दरअसल, 1989 में एनडी तिवारी यूपी में कांग्रेस सरकार के आखिरी मुख्यमंत्री थे। उसके बाद से नेहरू परिवार के घर यूपी में ही कांग्रेस डूबती चली गयी और कांग्रेस कार्यकर्ता हताश हो गए। क्षेत्रीय पार्टियों सपा और बसपा ने कांग्रेस के वोट बैंक को अपने पाले में कर लिया। कांग्रेस के परम्परागत पिछड़ा और मुस्लिम वोट बैंक सपा के साथ जुड़ गया जबकि दलित तबके ने बसपा का दामन थाम लिया। सवर्ण वोटर्स का एक बड़ा हिस्सा भाजपा के हिस्से चला गया। तब से लेकर आज तक राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस यूपी में क्षेत्रीय पार्टी अपना दल से भी पीछे पहुंच गयी। 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष कांग्रेस को एकसाथ मिलकर चुनाव लडऩे का न्योता दे रहा है। लेकिन स्थितियां कांग्रेस के लिए कतई फायदेमंद नहीं दिख रही है। कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में वही सीटें मिलेगी, जिसे सपा-बसपा तय करेगी। कांग्रेस के लिए यह सम्मानजनक नहीं साबित होगा। सपा भले ही कांग्रेस से दोस्ती न तोडऩे की बात कर रही हो लेकिन अंदरखाने सपा केवल बसपा और रालोद के साथ ही चुनाव लडऩे की पक्षधर है। यही वजह है कि सपा मुखिया इस मसले पर कुछ भी स्पष्टï कहने से कतराते है। यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष गठबंधन चाहते हुए खुद को सुविधाजनक स्थिति में नहीं पा रहे हैं। इसके अलावा कई कांग्रेस नेता भी भाजपा को हराने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों के सामने घुटने टेकने के खिलाफ दिख रहे हैं। इन स्थितियों को देखते हुए कांग्रेस अकेले दम पर चुनाव लडऩे की तैयारी भी कर रही है। हां, वह कुछ छोटे दलों से समझौता कर सकती है। इसके लिए कांग्रेस ने संगठन की मजबूती पर जोर देना शुरू कर दिया है। राजनैतिक जानकारों को भी लगता है कि कांग्रेस को ख्याली पुलाव पकाने के बजाय अपनी जमीनी हकीकत को देखना चाहिए ।

1989 में एनडी तिवारी यूपी में कांग्रेस सरकार के आखिरी मुख्यमंत्री थे। उसके बाद से नेहरू परिवार के घर यूपी में ही कांग्रेस डूबती चली गयी और कांग्रेस कार्यकर्ता हताश हो गए। क्षेत्रीय पार्टियों सपा और बसपा ने कांग्रेस के वोट बैंक को अपने पाले में
कर लिया।

जिला इकाइयों को गठित करने की तैयारी

कांग्रेस ने सभी जिला इकाइयों को नए सिरे से गठित करने का फैसला किया है। यहां वर्षों से जमे जिलाध्यक्षों की जगह युवा कार्यकर्ताओं को लाने की तैयारी है। यही नहीं मीडिया टीम को भी सशक्त बनाने की तैयारी की गई है। इसके लिए बाकायदा परीक्षा का आयोजन किया गया। इन परीक्षाओं का आयोजन इसलिए किया गया ताकि भाजपा प्रवक्ताओं के साथ बराबरी की टक्कर ले सकें। इसके अलावा प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर पूरी तरह सक्रिय हो गए हैं। अब 4 सदस्यीय टीम ही संगठन से जुड़े फैसले ले रही है।

पार्टी संगठन को मजबूत करने में जुटी है। गठबंधन का फैसला कांग्रेस आलाकमान करेंगे ।
-रामकृष्ण द्विवेदी
वरिष्ठï कांग्रेस नेता

बसपा के मौन से बढ़ा संशय
कांग्रेस से गठबंधन को लेकर भले ही सपा मुखिया अखिलेश यादव ने सकारात्मक संकेत दिए हैं लेकिन बसपा प्रमुख मायावती ने इस मामले पर कोई स्पष्टï राय अभी नहीं रखी है। ऐसे में कांग्रेस के गठबंधन में शामिल होने की राह आसान नहीं दिख रही है।

 

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