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महासमर में दिग्गजों की छुट्टी!

  • खंडूड़ी, कोश्यारी,निशंक,महारानी,टम्टा की दावेदारी इस बार कमजोर
  • उम्र और कमजोर रिकॉर्ड से झटके के उम्मीद 
  • कौशिक हरिद्वार के लिए मार रहे हाथ-पैर
  • बीजेपी हाई कमान चेहरे बदल बाजी मारने की कोशिश में! 

चेतन गुरुंग

देहरादून। लोकसभा चुनाव की तारीखों के बारे में अभी लोग अंदाज ही लगा रहे हैं लेकिन जब भी हों, इसके लिए साल भर भी नहीं रह गया है। ऐसे में सियासत की दुनिया और मीडिया के साथ ही आम लोगों में उन नामों पर चर्चाएं छिड़ चुकी हैं, जिनको बीजेपी में टिकट मिल सकता है या फिर जिनके टिकट इस बार कट सकते हैं। बहुत ज्यादा उम्मीद और संभावना इसी बात की जताई जा रही है कि इस बार बीजेपी नेतृत्व उत्तराखंड की पाँचों सीटों पर पुराने और मौजूदा चेहरों की छुट्टी कर नए नामों को महासमर में उतार सकती है। पुराने नामों में कुछ की उम्र की अधिकता आड़ेे आ रही है तो कुछ का कमजोर प्रदर्शन। कुछ को अंदरूनी सियासत का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। बहरहाल, दो पूर्व मुख्यमंत्रियों बीसी खंडूरी और भगत सिंह कोश्यारी के लिए इस बार टिकट हासिल करना नामुमकिन सा लग रहा है।

…..खंडूरी को उत्तराखंड ही नहीं एक वक्त केन्द्रीय सियासत में भी बहुत बड़ा नाम माना जाता था। वह जब राष्टï्रीय राजमार्ग मंत्री थे तो स्वर्णिम चतुर्भुज योजना से खूब यश कमाया था। इतना कि वह उत्तराखंड में मुख्यमंत्री तक बन गए। इसके पीछे उनका केन्द्रीय मंत्री के नाते मिला एक्सपोजर और केन्द्रीय राजनीति में रहने के कारण आला कमान से मिली करीबी बड़ी वजह कही जा सकती है। खंडूरी का वह दौर और रुतबा उम्र और वक्त के साथ खत्म हो चुका है। वह नब्बे के लपेटे में हैं और केन्द्रीय नेतृत्व उनको तवज्जो देना बंद कर चुका है। बीजेपी का नया नेतृत्व उनको गुजरे जमाने का नेता मान चुका है। पिछली बार उनको टिकट सिर्फ इसलिए मिला था कि उनके जीतने की गारंटी दिख रही थी। पार्टी को हर हाल में सीट निकालनी थी। इस बार बीजेपी नेतृत्व को लगता है कि वह पौढ़ी सीट पर चेहरा बदल के भी अगर सीट निकाल सकती है तो फिर क्यों वयोवृद्ध नामों पर दांव खेले जाए। पौढ़ी के लिए कई नाम पार्टी में उछल रहे हैं। इनमें सबसे ऊपर राष्टï्रीय सुरक्षा सलाहकार के बेटे शौर्य डोभाल का नाम सबसे ऊपर है। सेना से स्वैच्छिक रिटायरमेंट लेने वाले पूर्व कर्नल अजय कोठियाल भी बीजेपी से टिकट लेने की कोशिश कर रहे हैं। एक नाम मौजूदा सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत का है। उनकी नौकरी अभी बची है। फिर भी सांसद बनने के लिए वह कुछ महीने पहले रिटायरमेंट ले लें तो हैरानी नहीं होगी। कोश्यारी की उम्र हालांकि खंडूरी से कम है लेकिन उनका भी टिकट इस बार कट सकता है। वह शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं लेकिन पार्टी अगर भविष्य की राजनीति को देख के चली तो कोश्यारी की सियासत पर पूर्ण विराम लग सकता है। कोश्यारी के उत्तराधिकारी के तौर पर अभी किसी के नाम पर चर्चा नहीं है, लेकिन मंत्री प्रकाश पन्त भी चुनाव लडऩे के इच्छुक बताए जाते हैं। एक मजबूत नाम युवा पुष्कर सिंह धामी का है। पुराना चेहरा बलराज पासी भी पार्टी के पास है। टिकट जिसको भी मिले लेकिन कोश्यारी के लिए अगला चुनाव खट्टा अनुभव साबित हो सकता है। चौंकाने वाला फैसला हरिद्वार सीट पर हो सकता है। मौजूदा सांसद डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक के दिन अभी ठीक नहीं चल रहे हैं। उनके प्रतिद्वंद्वी और मंत्री मदन कौशिक की कोशिश मुख्यमंत्री बनने की है। माना जा रहा है कि हरिद्वार शहर सीट से विधायक कौशिक की महत्वाकांक्षा मुख्यमंत्री बनने की है। उनको लगता है कि जब तक वह केन्द्रीय नेतृत्व के करीब नहीं जाएंगे तब तक पहाड़ी राज्य में किसी मैदानी मूल के नाम का मुख्यमंत्री बनना तकरीबन नामुमकिन है। अगर हाई कमान का आशीर्वाद मिल जाए तो ये मुमकिन हो सकता है। हाई कमान के करीब जाने के लिए सांसद बनना तो बहुत जरूरी है। राज्य के मंत्री के लिए हाई कमान से निरंतर मिल पाना उतना आसान नहीं रहता है। कौशिक इस पहलू को अच्छी तरह जानते हैं। इसलिए वह हरिद्वार लोकसभा सीट से टिकट के लिए जुगत में बताए जाते हैं। पिछले दिनों मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को बसपा से निष्कासित पूर्व विधायक शहजाद के बेटे की शादी में ले जाने के पीछे कौशिक की ही अहम भूमिका बताई जाती है। सांसद बनने के लिए कौशिक अपने पूर्व विरोधी शहजाद से भी हाथ मिला चुके हैं। निशंक से कौशिक की यूं भी पहले से अंदरखाने ठनी रहती है। निशंक इन दिनों वैसे भी लो प्रोफाइल चल रहे हैं जबकि कौशिक सरकार के प्रवक्ता भी हैं। निशंक का पत्ता काटने के लिए कौशिक जिस तरह जुटे हुए हैं, उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि उनको इस बार सफलता मिल सकती है। खास तौर पर उस वक्त जब नेतृत्व पुराने चेहरों को बदल के नए नामों पर दांव खेल सकता है। ऐसा कर के वह मौजूदा नामों के खिलाफ लोगों में नाराजगी के चलते सीट गंवाने के खतरे से भी बच सकता है। लोगों की नाराजगी के चलते अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सीट से मंत्री अजय टम्टा और टिहरी सीट से मौजूदा सांसद महारानी माला राज्यलक्ष्मी की भी छुट्टी होती है तो चौंकने की जरुरत नहीं। टम्टा का प्रदर्शन बतौर मंत्री और सांसद प्रभावशाली नहीं रहा है और पार्टी उनकी जगह नए नाम को मौका देने पर विचार कर रही है। ऐसा पार्टी के भीतर के सूत्र बता रहे हैं। महारानी को पिछली बार गोरखाली समुदाय से जबरदस्त समर्थन और वोट मिले थे। इस बार उनके खिलाफ गोरखाली समुदाय में जबरदस्त असंतोष है। दरअसल, ज्यादातर जगह वह जीतने के बाद आज तक दुबारा नहीं गईं। गोरखाली समुदाय ने उनको गोरखाली होने के नाते वोट और समर्थन दिया था। इस बार उनका पत्ता काटने के लिए विधायक मुन्ना सिंह चौहान तैयार बैठे हैं। टिहरी सीट पर गोरखाली बहुतायत में हैं और विजयी फैक्टर है। किसी भी प्रत्याशी के लिए उनकी नाराजगी के चलते सीट निकालना बहुत मुश्किल है। बीजेपी नेतृत्व को इस बात का भली-भांति अहसास है कि कई लोग पार्टी और सरकार से नाखुश नहीं हैं लेकिन वे अपने सांसद से बहुत नाराज हैं। अगर मौजूदा सांसदों का पत्ता काट दिया जाए तो बीजेपी के लिए फिर से सीट जीतना अचम्भा नहीं होगा। पार्टी नेतृत्व को एक खतरा राज्य में त्रिवेंद्र सरकार के लगातार विवादों में पडऩे से भी पैदा हो रहा है। उसको अच्छी तरह याद होगा कि 2009 में खंडूरी सरकार के रहते पार्टी ने राज्य की पाँचों सीटें सिर्फ पार्टी कैडर में जबरदस्त असंतोष के कारण गँवा दी थी। कैडर इस बार भी खुश नहीं है। एक मजबूत लॉबी भी त्रिवेंद्र के खिलाफ और उनको कुर्सी से हटाने के लिए डट कर काम कर रही है। उनको खंडूरी को लोक सभा चुनाव में खराब नतीजे के कारण हटाया जाना याद है।

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