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अपनी मेहनत पर खुद पानी फेर देते हैं राहुल, कैसे संभालेंगे देश?

क्या राहुल सदन में बिना तैयारी के आये थे या फिर सदन के मंच को चुनावी सभा के मंच की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। यदि वह चुनावी सभा के मंच की तरह इस्तेमाल कर रहे थे तब तो उन्होंने अपनी पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। अपना मजाक उन्होंने खुद उड़ाते हुए एक तरह से खुद को पप्पू बता दिया। राहुल गांधी यहीं नहीं रुके बल्कि अप्रत्याशित कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री की सीट के पास जाकर नरेंद्र मोदी को गले लगा लिया। जिसका प्रधानमंत्री ने जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि जिनको यहां तक पहुंचने की जल्दी है वह यहां आकर मेरे पास कहने लगे- उठो-उठो। लेकिन यहां कोई एक व्यक्ति किसी को बैठाता नहीं है, देश की सवा सौ करोड़ जनता तय करती है कि कौन यहां बैठेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने जोरदार भाषण दिया और मोदी सरकार को कई मुद्दों पर घेरा लेकिन उन्होंने जो भी मेहनत की थी, उन्होंने जो भी तैयारी की थी, उन्होंने जनता की जो भी वाहवाही अर्जित की थी उस पर खुद ही तब पानी फेर दिया जब संसद में आंख मारने लगे।

नीरज कुमार दुबे

लोकसभा में नरेंद्र मोदी सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव जीत कर अब जनता का विश्वास जीतने की ओर कदम बढ़ा दिया है तो दूसरी ओर आपसी विश्वास की कमी से जूझ रहे विपक्षी दलों को अविश्वास प्रस्ताव खारिज हो जाने से बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। ऐसा नहीं है कि विपक्ष को अपनी हार का पहले अहसास नहीं था लेकिन सवाल यह है कि सुनिश्चित हार को देखते हुए भी क्यों आत्मघाती गोल किया गया। विपक्ष किसकी सलाह पर अमल कर रहा है? क्या अविश्वास प्रस्ताव लाये जाने या उसका समर्थन करने के फैसले पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अलावा कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं कमलनाथ, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा आदि की भी सहमति थी ? यह सवाल इसलिए उठा है क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव वाले दिन कमलनाथ संसद ही नहीं आये।
सवाल राहुल गांधी पर भी है। राहुल को इस बात का अहसास होना चाहिए कि वह भारत की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और उनका कोई भी बयान या कोई भी फैसला क्या परिणाम ला सकता है। राहुल अपनी जनसभाओं में राफेल सौदे में सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे हैं, यहां तक तो फिर भी चल रहा था लेकिन उन्होंने संसद में इस बात का दावा कर दिया कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने उनसे बातचीत के दौरान कहा था कि इस सौदे में गोपनीयता की कोई शर्त नहीं थी। उन्होंने रक्षा मंत्री पर इस मुद्दे पर देश से झूठ बोलने का आरोप भी लगाया। लेकिन राहुल के बयान की तब किरकिरी हो गयी जब फ्रांस ने एक बयान जारी कर यह कह दिया कि राफेल सौदा गोपनीयता की शर्तों से बंधा हुआ है और दोनों देशों को इसका पालन करना होगा।
यहां सवाल यह है कि क्या राहुल सदन में बिना तैयारी के आये थे या फिर सदन के मंच को चुनावी सभा के मंच की तरह इस्तेमाल कर रहे थे। यदि वह चुनावी सभा के मंच की तरह इस्तेमाल कर रहे थे तब तो उन्होंने अपनी पार्टी को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। अपना मजाक उन्होंने खुद उड़ाते हुए एक तरह से खुद को पप्पू बता दिया। राहुल गांधी यहीं नहीं रुके बल्कि अप्रत्याशित कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री की सीट के पास जाकर नरेंद्र मोदी को गले लगा लिया। जिसका प्रधानमंत्री ने जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि जिनको यहां तक पहुंचने की जल्दी है वह यहां आकर मेरे पास कहने लगे- उठो उठो। लेकिन यहां कोई एक व्यक्ति किसी को बैठाता नहीं है, देश की सवा सौ करोड़ जनता तय करती है कि कौन यहां बैठेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने जोरदार भाषण दिया और मोदी सरकार को कई मुद्दों पर घेरा लेकिन उन्होंने जो भी मेहनत की थी, उन्होंने जो भी तैयारी की थी, उन्होंने जनता की जो भी वाहवाही अर्जित की थी उस पर खुद ही तब पानी फेर दिया जब संसद में आंख मारने लगे। यह दृश्य सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और सब जगह राहुल गांधी के भाषण में कही गयी बातों पर चर्चा की बजाय उनकी संसद में की गयी हरकतों पर चर्चा होने लगी। बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस ने तेलुगु देशम पार्टी के अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन क्यों किया? इससे पहले बजट सत्र के दौरान वाईएसआर कांग्रेस के सदस्य भी मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना चाहते थे तब कांग्रेस ने उसका समर्थन क्यों नहीं किया।
दरअसल कांग्रेस का इतिहास दूसरे दलों को इस्तेमाल करने का रहा है। चाहे पूर्व में चौ. चरण सिंह, चंद्रशेखर, एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल की सरकारों को केंद्र में पहले समर्थन देकर और फिर उसे गिरा कर देश को मध्यावधि चुनावों में झोंकने की बात हो, चाहे झारखंड में निर्दलीय विधायक मधु कोड़ा को मुख्यमंत्री बनाकर राज्य को कथित रूप से लूटने की बात हो, चाहे दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार को बाहर से समर्थन देने की बात हो या फिर अभी कर्नाटक में भाजपा को रोकने के लिए एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने की बात हो, सभी उदाहरणों से यह बात साफ है कि कांग्रेस ने हमेशा अपने स्वार्थ की खातिर दूसरे दलों का उपयोग किया। पिछले चुनावों में केंद्र्र के साथ ही आंध्र प्रदेश की सत्ता हाथ से खो बैठी कांग्रेस वहां फिर से खड़ा होने का प्रयास कर रही है। हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री किरण रेड्डी की कांग्रेस में वापसी हुई है। कांग्रेस जानती है कि राज्य में उसकी मुख्य लड़ाई तेलुगु देशम पार्टी से ही है। कांग्रेस ने तेलुगु देशम पार्टी से नजदीकी बनाई है, ऐसी बात नहीं है बल्कि तेलुगु देशम पार्टी पर निशाना साधा है। चंद्रबाबू नायडू की पार्टी की ओर से लाये गये अविश्वास प्रस्ताव के गिर जाने से कांग्रेस को जहां राज्य में यह कहने का मौका मिल गया है कि उसने राज्य हित में विरोधी पार्टी का साथ दिया वहीं उसके कुछ नेता अविश्वास प्रस्ताव की हार को चंद्रबाबू नायडू की हार बताने पर तुल गये हैं। केंद्र में भी कांग्रेस का कहना है कि अविश्वास प्रस्ताव हमारा नहीं तेलुगु देशम पार्टी का था और उसे सिर्फ कांग्रेस पार्टी का ही नहीं बल्कि कई अन्य दलों का भी समर्थन प्राप्त था इसलिए यह कांग्रेस की हार तो कतई नहीं है।
बात अगर अविश्वास प्रस्ताव से भाजपा पर पड़े फर्क की करें तो इससे कई चीजें एकदम साफ हो गयीं। पहली यह कि चाहे भाजपा हो या राष्टï्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, इसके नेतृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं है। नरेंद्र मोदी भाजपा ही नहीं राजग के भी सर्वमान्य नेता बने हुए हैं। दूसरी बात यह साफ हुई कि पार्टी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुट चुकी है और जीत के प्रति आश्वस्त नजर आ रही है। एक ओर जहां विपक्ष अभी गठबंधन बनाने की पेचिदगियों और नेतृत्व को लेकर पैदा उलझन को सुलझाने में जुटा हुआ है वहीं प्रधानमंत्री ने एक-एक करके चुनावी रैलियां भी संबोधित करना शुरू कर दिया है।
प्रधानमंत्री ने अविश्वास प्रस्ताव पर अपने जवाब में जिस तरह ज्यादा हमला गांधी परिवार और कांग्रेस नेतृत्व पर ही केंद्रित रखा उससे यह भी साफ हो गया कि आगामी चुनावों में मोदी की रैलियों में होने वाले भाषणों में कौन निशाने पर रहने वाला है। बहरहाल, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह यह साफ कर चुके हैं कि अविश्वास प्रस्ताव पर सरकार की जीत 2019 की एक झलक भर है। लेकिन अमित शाह को अति आत्मविश्वास में आने की बजाय इस बात पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए कि राजग के पुराने सहयोगियों को कैसे एकजुट रखा जाये। यह सही है कि फिलहाल भाजपा को विरोधी दलों से ज्यादा चुनौती नहीं दिख रही है लेकिन शिवसेना ने जो रुख अख्तियार किया हुआ है वह उसे महाराष्ट्र में नुकसान पहुंचा सकता है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में ओम प्रकाश राजभर की पार्टी हो या फिर बिहार में जनता दल युनाइटेड और लोक जनशक्ति पार्टी, इन सभी के साथ सीटों का आवंटन यदि ठीक से नहीं हुआ तो राजग की एकता खतरे में पड़ सकती है। दूसरा दक्षिण भारत को लेकर भाजपा को ज्यादा विश्वास नहीं पालना चाहिए। भाजपा भले तमिलनाडु और केरल में कड़ी मेहनत कर रही है लेकिन यहां से बड़ी संख्या में लोकसभा सीटें जीतने की उम्मीद नहीं पालनी चाहिए।

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