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मॉब लिंचिंग पर सियासत और सवाल

मॉब लिंचिंग की घटनाओं के पीछे सोशल मीडिया से फैली अफवाहें जिम्मेदार थीं। लोगों ने बिना सत्यता जाने लोगों को मौत के घाट उतार दिया। ऐसी स्थिति में इस पर सियासत को किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता है। ऐसी हिंसक घटनाओं पर राजनीति करने से समाज में गलत संदेश जाता है और यह वर्ग या धर्म विशेष के लोगों के बीच आक्रोश का कारण बन सकता है। ऐसी स्थिति बेहद खराब होती है। यदि विपक्ष को मॉब लिंचिंग की चिंता है तो उसे सरकार के साथ मिलकर इसका समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए, विकल्प सुझाना चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप में असली समस्या गुम हो जाती है।

Sanjay Sharma

देश में भीड़ द्वारा लोगों की हत्या करने (मॉब लिंचिंग)की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। हाल में राजस्थान के अलवर में भीड़ ने गो तस्करी के शक में रकबर खान को पीट-पीटकर मार डाला। इसके साथ ही मॉब लिंचिंग पर सियासत शुरू हो गई है। विपक्ष ने सडक़ से लेकर संसद तक सरकार पर हमला बोल दिया। कांग्रेस और बसपा समेत विपक्षी दलों ने ऐसी घटनाओं के लिए सरकार को दोषी बताया। वहीं सरकार की ओर से कहा गया है कि देश में मॉब लिंचिंग की घटनाएं होती रही हैं और आज तक की सबसे बड़ी मॉब लिंचिंग 1984 के सिख विरोधी दंगे थे। इस सियासत के बीच कई जरूरी सवाल भी हैं। सवाल यह है कि देश भर में मॉब लिंचिंग की घटनाएं क्यों बढ़ रही हैं? भीड़ की हिंसा पर लगाम लगाने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें क्या कर रही हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सरकार कड़ा कानून बनाएगी? क्या कानून व्यवस्था को राज्य का अधिकार क्षेत्र बताकर केंद्र सरकार अपना पल्ला झाड़ सकती है? क्या ऐसे जघन्य मामलों में सियासत उचित है? क्या विपक्ष व सत्ता पक्ष को मिलकर ऐसी समस्याओं का समाधान नहीं खोजना चाहिए? क्या घटना की आड़ में वोट बैंक को साधने की कोशिश ठीक है?
देश में हिंसक होती भीड़ गंभीर चिंता का विषय है। यूपी, झारखंड, राजस्थान, महाराष्टï्र समेत कई राज्यों से मॉब लिंचिंग की खबरें आ रही हैं। पिछले दिनों महाराष्टï्र में बच्चा चोर गिरोह की अफवाह पर पांच लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। ऐसे ही एक शक के चलते भीड़ ने रकबर खान की जान ले ली। ऐसी घटनाओं पर सुप्रीम कोर्ट भी अपनी चिंता जता चुका है। कोर्ट ने कहा था भीड़ को कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती और संसद ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कड़े कानून बनाए। पिछले दिनों मॉब लिंचिंग की घटनाओं के पीछे सोशल मीडिया से फैली अफवाहें जिम्मेदार थीं। लोगों ने बिना सत्यता जाने लोगों को मौत के घाट उतार दिया। ऐसी स्थिति में इस पर सियासत को किसी भी तरह उचित नहीं कहा जा सकता है। ऐसी हिंसक घटनाओं पर राजनीति करने से समाज में गलत संदेश जाता है और यह वर्ग या धर्म विशेष के लोगों के बीच आक्रोश का कारण बन सकता है। ऐसी स्थिति बेहद खराब होती है। यदि विपक्ष को मॉब लिंचिंग की चिंता है तो उसे सरकार के साथ मिलकर इसका समाधान निकालने की कोशिश करनी चाहिए, विकल्प सुझाना चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप में असली समस्या गुम हो जाती है। हर घटना को वोट बैंक से जोडक़र नहीं देखा जाना चाहिए। यह लोकतंत्र और समाज दोनों को कमजोर करता है। वहीं सरकार को अपने कार्यों से विपक्ष को ऐसी घटनाओं की पुनरावृति नहीं होने देने के लिए आश्वस्त करना चाहिए।

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