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फिर दलितों पर दांव…

  • 2014 के लोकसभा चुनाव का रिकार्ड दोहराने में जुटी भाजपा
  • एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की तैयारी
  • भाजपा के खिलाफ विपक्ष की दलित विरोधी मुहिम को कुंद करने की कोशिश
  • संगठन को भी उतारा मैदान में, गांव-गांव में चलाया जा रहा अभियान

Sanjay sharma @WeekandTimes

मिशन 2019 को हासिल करने के लिए भाजपा के दिग्गजों ने एक बार फिर दलितों पर दांव खेला है। दलितों की नाराजगी दूर करने के लिए मोदी सरकार एससी-एसटी एक्ट पर दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की तैयारी कर रही है। कैबिनेट की बैठक में एससी-एसटी एक्ट में संशोधन विधेयक के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। माना जा रहा है कि इसी मानसून सत्र में विधेयक को पेश किया जाएगा। मोदी सरकार ने इसके जरिए एक तीर से कई निशाने साधे हैं। एक ओर पार्टी नेतृत्व ने विपक्ष द्वारा भाजपा के खिलाफ चलाए जा रहे दलित विरोधी मुहिम की धार को कुंद कर दिया है वहीं दलितों को पुराने अधिकार मुहैया कराकर उनके असंतोष को दूर करने का प्रयास किया है। इसके अलावा भाजपा के दिग्गजों ने दलितों को अपने पाले में बनाए रखने के लिए संगठन को भी मैदान में उतार दिया है। इसके तहत गांव-गांव कार्यक्रम चलाकर दलितों को पार्टी से जोडऩे की कोशिशें तेज कर दी गई हैं। जाहिर है कई राज्यों में होने वाले विधानसभा और अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में पार्टी को इसका फायदा मिलेगा।


…भले ही लोकसभा चुनाव अगले वर्ष होने हैं लेकिन भाजपा ने अभी से युद्ध स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी विपक्ष के संभावित गठबंधन को देखते हुए अपनी रणनीति बना रही है। जातीय समीकरण पर भी उसका पूरा फोकस है। पिछले लोकसभा चुनाव में साथ देने वाले दलितों को वह किसी भी कीमत पर नाराज नहीं करना चाहती है। यही वजह है कि मोदी कैबिनेट ने एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी बदलने का फैसला कर लिया। इसी वर्ष 21 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट 1989 के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने कहा था कि सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अधिकारी की इजाजत के बाद ही हो सकती है। इस फैसले के बाद दो अप्रैल को दलित संगठन सडक़ पर उतर आए थे। दलित समुदाय ने भारत बंद का आह्वïान किया था। इस दौरान केंद्र सरकार को दलितों का विरोध सहना पड़ा था। देशभर में हुए इस दलित आंदोलन में कई इलाकों में हिंसा हुई थी, जिसमें एक दर्जन से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। इस फैसले के लिए दलित समुदाय मोदी सरकार को जिम्मेदार मानता रहा है। इस मामले को विपक्ष ने लपक लिया और जमकर सियासत की। केंद्र सरकार व भाजपा को दलित विरोधी बताया जाने लगा। सपा, बसपा और कांग्रेस ने इस मुद्दे पर भाजपा को हमेशा घेरती रहती है। यही नहीं भाजपा से भी विरोध के स्वर फूटने लगे थे। भाजपा के दलित सांसदों ने इस मामले पर अपनी नाराजगी शीर्ष नेतृत्व के सामने जाहिर कर दी थी। इसको देखते हुए भाजपा को समझ में आने लगा था कि यदि इस असंतोष को दूर नहीं किया गया तो स्थितियां बिगड़ जाएंगी। लिहाजा मोदी सरकार ने दलितों की नाराजगी को देखते हुए एक्ट को मूल स्वरूप में लाने का फैसला किया। सरकार जैसे ही इस संशोधन विधेयक को लाएगी वह पास होकर ही रहेगा क्योंकि दलित मतों को देखते हुए कोई भी दल इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं करेगा। मोदी सरकार ने यह दांव चलकर विरोधियों को लगभग पस्त कर दिया है। साथ ही दलितों के भीतर के असंतोष को भी समाप्त करने की कोशिश की है। सच यह है कि भाजपा दलितों को किसी भी तरह से अपने से दूर नहीं जाने देना चाहती है क्योंकि इनकी वजह से ही वह केंद्र में बहुमत की सरकार बनाने का स्वाद चख चुकी है। भाजपा की 2014 के लोकसभा चुनाव में कामयाबी में दलितों की अहम भूमिका रही है। भाजपा को अच्छी तरह पता है कि दलितों की नाराजगी 2019 में उसके लिए महंगी पड़ सकती है। लोकसभा में कुल 543 सीटें हैं। इनमें से 80 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में इन 80 सीटों में से भाजपा ने 41 सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि बाद में मध्य प्रदेश की रतलाम लोकसभा सीट के उपचुनाव में हार जाने के चलते फिलहाल उसकी 40 सीटें हैं। यही नहीं भाजपा ने उत्तर प्रदेश की सभी 14 लोकसभा की आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की थीं। भाजपा ने यूपी में 76 विधानसभा आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की थी। उत्तर प्रदेश, पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के चुनाव में दलित मतदाताओं की अहम भूमिका रहती है। दलित आबादी वाला सबसे बड़ा राज्य पंजाब है। यहां की 31.9 फीसदी आबादी दलित है और 34 सीटें आरक्षित हैं। उत्तर प्रदेश में करीब 20.7 फीसदी दलित आबादी है और 14 लोकसभा व 86 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। इसी तरह हिमाचल में 25.2 फीसदी, हरियाणा में 20.2 फीसदी दलित आबादी है। जाहिर है भाजपा ने यह दांव बहुत सोच-समझकर चला है। इसके अलावा भाजपा ने दलितों में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए संगठन को भी मैदान में उतार दिया है। दलितों को लुभाने के लिए भाजपा ने एकलव्य खेल उत्सव शुरू किया है। दलितों के बीच अपनी पैठ बढ़ाने के लिए भाजपा सामाजिक समरसता जैसे कार्यक्रम भी चला रही है। 26 फरवरी से शुरू हुआ एकलव्य खेल उत्सव पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन 25 दिसंबर तक बूथ स्तर तक पहुंच जाएगा। इसके अलावा बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दिया गया है। यही नहीं भाजपा ने दलितों को लुभाने के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर जयंती 14 अप्रैल को सामाजिक समरसता दिवस के रूप में देशभर में मनाया था। यह कार्यक्रम बूथ स्तर पर आयोजित किए गए थे। इस दौरान अनुसूचित व पिछड़ी बस्तियों में डॉ. अंबेडकर के संबंध में भाषण, सहभोज आदि आयोजित कर भाजपा ने समरसता का संदेश दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का विशेष फोकस यूपी पर है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यूपी की 80 लोकसभा सीटों में अपने सहयोगी अपना दल की दो सीटों के साथ 73 सीटों पर जीत दर्ज की थी। यही वजह है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उत्तर प्रदेश में अपनी उपस्थिति लगातार दर्ज करा रहा है। दरअसल, सपा और बसपा की दोस्ती को देखते हुए भाजपा दलितों को अपने पाले में करने के लिए सारे जतन कर रही है। भाजपा के दिग्गजों को मानना है कि यदि दलितों ने उनका एक बार फिर साथ दिया तो दिल्ली दूर नहीं होगी।

 

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