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योगी से बेहतर त्रिवेंद्र!

कइयों को तो मंत्री बनते ही दूधिया सफेद कपड़े ही नहीं बल्कि सफेद जूते भी पहनने का शौक दीवानगी की हद तक रहा है। भले इन पोशाकों में वे अजीब से लगते हैं। आप त्रिवेंद्र को इन सब से दूर पाएंगे। उन पर ये आरोप लग रहे हैं कि काम की रफ्तार मंथर हो गई है। सचिवालय हो या फिर मुख्यमंत्री आवास, लोगों का वह हुजूम नहीं दिखता, जो एनडी तिवारी, रमेश पोखरियाल निशंक और हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहने के दौरान दिखाई दिया करता था। इन तीनों के कालों में सचिवालय और मुख्यमंत्री आवास आधी रात से ज्यादा वक्त तक न सिर्फ गुलजार हुआ करते थे, बल्कि मुख्यमंत्री सभी से मिल भी लिया करते थे। रात के कितने ही बज जाए, वे आखिरी व्यक्ति तक से मिल कर ही सोने के लिए जाया करते थे।

चेतन गुरुंग

त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बने सवा साल हो चुके हैं। जब वह सत्ता के शिखर पुरुष की कुर्सी पर बैठे तो उनकी प्रतिस्पर्धा हमारे पत्रकार भाइयों और आम लोगों ने योगी आदित्यनाथ से शुरू कर दी। संयोग की बात है कि दोनों साथ सत्ताधीश बने। एक ही जिले पौड़ी से वास्ता रखते हैं और दोनों जाति से ठाकुर हैं। दोनों में फर्क सिर्फ सियासी अनुभव और उम्र का है, लेकिन एक बात समान है कि पार्टी के सब कुछ माने जाने वाले अमित शाह दोनों पर आंख मूंदकर यकीन रखते हैं। यही वजह है कि दोनों निर्भीक और निष्कंटक तरीके से सरकार चला रहे हैं। भले दोनों जमकर विवादों में घिरते जा रहे हैं।
योगी ने शुरू में ऐसे रफ्तार दिखाई कि त्रिवेंद्र पर अंगुली उठने लगी। कहा गया कि वह तो योगी के मुकाबले कहीं नहीं टिकते हैं। कहीं बीजेपी ने मुख्यमंत्री चुनने में जल्दबाजी या गलती तो नहीं कर दी। ऐसा भी कहा जाने लगा। दूसरी तरफ रावत ने भी कह दिया लोगों को उनसे योगी जैसी रफ्तार से काम और नतीजे की उम्मीद नहीं करना चाहिए। उन्होंने बेहिचक कह डाला कि उत्तर प्रदेश के मैदानी सडक़ों और पहाड़ों के रास्तों पर गाड़ी की रफ्तार में फर्क तो होगा ही। इस पर भी मीडिया में त्रिवेंद्र को निशाने पर लिया जाने लगा। ये बात अलग है कि आज योगी उत्तर प्रदेश में नाकाम समझे जा रहे हैं और त्रिवेंद्र की प्रतिष्ठा उनसे बेहतर है। उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था खत्म समझी जा रही और प्रशासन के मामले में भी योगी बहुत प्रभावी साबित नहीं हो रहे हैं। त्रिवेंद्र धीरे-धीरे ही सही, इस मामले में उनसे बेहतर दिखने लगे हैं।
त्रिवेंद्र को उन राजनीतिज्ञों में शुमार किया जा सकता है, जो हालात के मुताबिक खुद को ढालने में यकीन नहीं रखते हैं। थोड़ा-बहुत ऊपर नीचे भले करे, लेकिन चमत्कारिक परिवर्तन खुद में लाते वे कभी नहीं दिखे। उनका अंदाज राजनीति हो या फिर निजी जीवन में अलग-अलग नहीं दिखता है। उनके काम के धीमेपन वाले अंदाज, खास नौकरशाहों पर अति निर्भर रहने और चतुर सियासतदां की तरह सभी को खुश रखने की कोशिश न करने वाला उनका स्वभाव आलोचकों को मौका देता रहता है। उनका रहन-सहन वह पहनावा तक ऐसा नहीं है, जैसा पूर्व के कुछ मुख्यमंत्रियों का रहता रहा है। वह सादे कपड़े पहनने और सादे तरीके से रहने पर ही यकीन रखते रहे हैं। मुख्यमंत्री बन जाने से उनके भीतर इनमें कोई बदलाव पोशाकों के मामले में भी नहीं आया है।
मुझे याद है डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक समेत कई सियासतदां जब-जब सत्ता में आए या आते रहे, सबसे पहले अपनी पोशाक में ही बदलाव लाए। कईयों को तो मंत्री बनते ही दूधिया सफेद कपड़े ही नहीं बल्कि सफेद ही जूते भी पहनने का शौक दीवानगी की हद तक रहा है। भले इन पोशाकों में वे अजीब से लगते हैं। आप त्रिवेंद्र को इन सब से दूर पाएंगे। उन पर ये आरोप लग रहे हैं कि काम की रफ्तार मंथर हो गई है। सचिवालय हो या फिर मुख्यमंत्री आवास, लोगों का वह हुजूम नहीं दिखता, जो एनडी तिवारी, रमेश पोखरियाल निशंक और हरीश रावत के मुख्यमंत्री रहने के दौरान दिखाई दिया करता था। इन तीनों के कालों में सचिवालय और मुख्यमंत्री आवास आधी रात से ज्यादा वक्त तक न सिर्फ गुलजार हुआ करते थे, बल्कि मुख्यमंत्री सभी से मिल भी लिया करते थे। रात के कितने ही बज जाए, वे आखिरी व्यक्ति तक से मिल कर ही सोने के लिए जाया करते थे। उनके वक्त में काम भले सभी के और सभी तरह के नहीं हो पाते थे, लेकिन लोग खुश रहते थे कि मुख्यमंत्री उनसे मिले और आश्वासन दिया। त्रिवेंद्र ऐसी कला से दूर हैं।
त्रिवेंद्र मिलते तो हैं लेकिन लोगों को खुद से वैसा कनेक्ट नहीं कर पा रहे हैं, जैसा ऊपर लिखे तीनों मुख्यमंत्री कर लेते थे। कहने को मुख्यमंत्री के पास कई सलाहकार हैं। पार्टी तथा संघ के अफसर भी सरकार चलाने के तरीकों पर ध्यान देते रहते हैं, लेकिन कोई भी त्रिवेंद्र की कार्यशैली को बदल नहीं सका है। उनकी एक मामले में तारीफ की जा सकती है। उसके लिए सलाहकारों को श्रेय नहीं दिया जा सकता है। वह है सचिवालय के चतुर्थ तल और मुख्यमंत्री आवास को उन लोगों के चंगुल से मुक्त करना, जो सरकार में काम कराने के बहाने जम कर दलाली करते थे। अफसरों के दफ्तरों और अनुभागों में भी दलालों और परिचित चेहरों को अब नहीं देखा जा सकता है। मुख्यमंत्री आवास भी पूरी तरह दलालों से मुक्त दिखाई देता है। एक नौकरशाह के मुताबिक खनन और शराब जैसे सरकार के लिए सिर दर्द बने रहने वाले महकमों पर मुख्यमंत्री सीधे नजर रख रहे हैं। ये बात अलग है कि ऊर्जा और शहरी विकास महकमे में सरकार को अधिक ध्यान दिए जाने की दरकार है। त्रिवेंद्र जल्दी-जल्दी नौकरशाहों को बदलने और हर शिकायत पर तुरंत फैसले लेने वाले भी नहीं हैं।
नौकरशाहों को महकमे सौंपने या फिर जिलों में भेजने के मामले में वह पहले पूरी तसल्ली चाहते हैं। तब जाकर कोई कदम उठाते हैं। इतना जरूर है कि वह किसी भी किस्म के दबाव में कोई कदम उठाने वाले नहीं हैं। ऐसा होता तो ओम प्रकाश और कुछ अन्य नौकरशाहों को चतुर्थ तल से कभी का विदा कर डालते। साथ ही रंजीत सिन्हा, चंद्रेश यादव, हरबंस सिंह चुग, विनय शंकर पांडेय सरीखे अफसरों को कुछ अहम जिम्मेदारियां जरूर सौंपते। चुग और पाण्डेय तो इन डायरेक्ट आईएएस अफसरों के एक किस्म से नेता कहे जा सकते हैं। त्रिवेंद्र ने दोनों को काम काज के बोझ से तकरीबन दूर रखा हुआ है। इससे भी बड़ी मिसाल तो मंत्रिपरिषद में खाली दो सीटों को भरने में जल्दबाजी न करना और सरकारी महकमों, परिषदों और निगमों में खाली दायित्वों पर बाज निगाहें गड़ाए बैठे बीजेपी के नेताओं को बिठा कर उनकी नाराजगी और असंतोष को दूर करने की कोशिश न करना है।
बीजेपी के कई विधायक तो त्रिवेंद्र से नाखुश और असंतुष्ट ही इसलिए हैं कि वे उनकी दावेदारी मजबूत होने के कारण ही मंत्रिपरिषद की खाली कुर्सी भरने में गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं। वैसे उनमें इतनी हिम्मत भी नहीं है कि इस बात को शिकायत की मुद्रा में आला कमान के सामने रखी जाए। वे जानते हैं कि उनकी ऐसी कोई भी कोशिश उनको शीर्ष नेताओं की फटकार या निराशाजनक रुख के सिवाय कुछ न देगा। त्रिवेंद्र पर निजी तौर पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हैं, और ये भी उनकी उपलब्धि कही जा सकती है। बेशक उनको धीमा प्रशासक जरूर कहा जा रहा है। इस सबके बावजूद वक्त का तकाजा है कि त्रिवेंद्र खुद में कुछ परिवर्तन जरूर लाएं। सबसे पहले तो उनको ऐसा सलाहकार तलाशना होगा, जिस पर वह आंख मूंदकर यकीन कर सके। वह इसलिए न लाया जाए कि महज उनका या किसी बड़े खास का खास है। उनको काबिल और दूरदर्शी सलाहकार चाहिए। उनको समझना होगा कि उनकी लगन, ईमानदारी या मेहनत सिर्फ सही फैसले सही वक्त पर न लेने और योजनायें सही तरीके से न बन पाने तथा उनका क्रियान्वयन ढंग से नहीं हो पाने के कारण बेकार हो जाएगी। मंत्रियों के साथ ही नौकरशाहों से भी नतीजे सख्ती से मांगने होंगे। लोक सभा चुनाव सिर्फ मोदी या शाह के लिए इम्तिहान नहीं हैं.त्रिवेंद्र के लिए भी हैं। उम्मीद है त्रिवेंद्र इस हकीकत को समझ रहे होंगे।

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