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पढ़ाने से ज्यादा आन्दोलन के मास्टर

  • फिर मांगों को लेकर बिदके सरकारी मास्साब
  • शिक्षा मंत्री पाण्डेय ने अपनाया सख्त रवैय्या
  • तालाबंदी और धरने वालों को चेताया

चेतन गुरुंग @WeekandTimes
देहरादून। उत्तराखंड राज्य का गठन रक्तपात और आन्दोलन के बीच हुआ, लेकिन लगता है कि राज्य के शिक्षकों और कर्मचारियों ने इसको भविष्य के लिए नजीर बना लिया। वे ये मान के चल रहे हैं कि अगर आंदोलनों और तालाबंदियों से राज्य मिल सकता है तो फिर उनकी मांगों को पूरा कराने के लिए ये रास्ता भला क्यों कामयाब नहीं रहेगा। इस बार फिर से शिक्षकों और कर्मचारियों ने मांगों को लेकर सरकार के खिलाफ बिगुल फूंक डाला है। ज्यादा बड़ी समस्या सरकार के लिए फिलहाल, सरकारी शिक्षकों के आक्रामक तेवर बन गए हैं। वे पढ़ाई-लिखाई पर अपनी मांगों को ऊपर रखकर चल रहे हैं। इस बार उनकी एक मांग तबादले भी हैं, जिसको वे कानून के मुताबिक कराना चाहते हैं। इसमें वाकई कोई हर्ज नहीं है लेकिन ऐसा लग रहा है कि शिक्षकों ने आन्दोलन और असंतोष को जीवन का हिस्सा बना लिया है। उनका रवैय्या ये सोचने को ज्यादा मजबूर कर रहा है कि आखिर निजी स्कूलों के मुकाबले कहीं खराब नतीजे देने लेकिन बहुत मोटी तनख्वाह लेने वाले गुरुओं का बात-बात पर आन्दोलन पर उतर आना कहीं बहुत ज्यादा तो नहीं हो गया। उनकी जगह स्कूल हैं, लेकिन वे राजधानी में डट कर आन्दोलन कर रहे हैं। स्कूलों में तालाबंदी पर उतर आए। ऐसे में शिक्षा मंत्री अरविन्द पाण्डेय अगर उनके खिलाफ कड़े रुख को अपना रहे हैं तो उनको समर्थन भी लोगों का मिल रहा है।

…..इस बार राजकीय शिक्षक संघ इस लिए भी अधिक बिदक गया कि सरकार उसके दबाव में आती नहीं दिख रही है। सरकारी शिक्षक मांगों को ले कर देहरादून में आन्दोलन कर रहे हैं, लेकिन स्कूल के हाजिरी रजिस्टर में दस्तखत कर तन्ख्वाह पक्की करने के साथ ही अपने खिलाफ गैर हाजिरी सम्बन्धी किसी संभावित कार्रवाई से बचने का रास्ता भी पहले ही तैयार कर रहे थे.सरकार ने संघ के तीन बड़े पदाधिकारियों को ही देहरादून से बाहर तबादले पर भेज कर साफ कर दिया कि इस बार वह भी आर या पार कर के रहेगी या तो शिक्षकों को ड्यूटी तरीके से करनी होगी या फिर कार्रवाई झेलने को तैयार रहना होगा। शिक्षकों के साथ सरकार का ये रुख हैरान करने वाला कहा जाएगा। शिक्षकों का उत्तराखंड की सियासत में हमेशा अहम भूमिका होने की बात कही जाती है, लेकिन लगता है कि सरकार समझ गई है कि वो गुजरे जमाने की बात है.जब शिक्षकों को गांव में लोग देवता के समान पूजते और मानते थे। जो उन्होंने कह दिया, वह पत्थर की लकीर होती थी। वे सियासी रुझान तैयार करने का कार्य भी किया करते थे।
आज के दौर में जब गांवों में भी इन्टरनेट का साम्राज्य हो चुका है। सोशल मीडिया के जरिये लोग तत्काल और अहम जानकारियां, जो हर क्षेत्र से संबंधित होती है, अच्छी तरह पता कर लेते हैं। वह खुद ही सही निष्कर्ष निकालने की क्षमता रखता है। सियासी हो या फिर सामजिक मुद्दे, आज के लोग बहुत जागरूक हो चुके हैं। वह दिन गए जब शिक्षक किसकी सरकार बननी चाहिए और किसकी गिरनी चाहिए, जैसे सियासी मामलों में गांव के लोगों को ज्ञान दिया करते थे। ये बात अलग है कि शिक्षकों को शायद अभी भी गलतफहमी है कि वे लोगों की सियासी या सामाजिक राय बनाने की ताकत रखते हैं। इसमें शक की गुंजाइश नहीं कि त्रिवेंद्र सरकार का राजकीय शिक्षकों के प्रति सख्त रुख अपनाना भविष्य में फालतू के आंदोलनों पर लगाम लगा सकता है।
सरकारी स्कूल और शिक्षकों का स्तर किसी से छिपा नहीं है.निजी स्कूल अगर न हों तो उत्तराखंड का नाम शिक्षा के क्षेत्र में देश के नक्शे में कहीं भी न दिखाई दे। ये बात अलग है कि निजी स्कूल जहां शिक्षकों से स्तरीय शिक्षण की मांग करता है वहीं उनको जो तन्ख्वाह दी जाती है, उससे दुगुनी तो सरकारी स्कूल के प्राइमरी स्कूल के शिक्षक पहली तन्ख्वाह के तौर पर लेते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि पिछली सरकारों की ढिलाई और शिक्षा महकमे के प्रति अधिक उदार भाव दिखाया जाना स्कूली शिक्षा का सर्वनाश कर रहा है। शिक्षकों के हौसले इसके चलते बुलंद हो चुके हैं। यही वजह है कि वे पढ़ाने के लिए नहीं बल्कि स्कूलों में अपनी मांगों को पूरी कराने के लिए तालाबंदी करने जा रहे हैं। उधर संघ के प्रदेश अध्यक्ष कमल किशोर डिमरी, महामंत्री डॉ. सोहन सिंह मजिला और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राम सिंह को जिस तरह सरकार ने तबादले में पहाड़ भेज दिया, वह साबित करता है कि मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत और शिक्षा मंत्री पाण्डेय भी इस बार कुछ अलग ही मूड में हैं। इतने सख्त कदम उठाने का हौसला आज तक किसी भी सरकार ने नहीं लिया था। पाण्डेय शिक्षा महकमे में क्रान्तिकारी सुधारों की कोशिशों के लिए प्रतिष्ठा बनाते जा रहे हैं। वह एनसीईआरटी की सस्ती किताबों को सीबीएसई बोर्ड के स्कूलों में लागू करवा के ही माने और अपनी सुधारात्मक तथा सख्त प्रशासक की छवि को पुख्ता किया।
पाण्डेय शिक्षकों के आंदोलनों और तालाबंदी के फैसले से न सिर्फ बहुत खफा हैं बल्कि उनके खिलाफ सख्त से सख्त रुख अपनाने को भी तैयार हैं.उन्होंने अल्टीमेटम दिया कि जो भी शिक्षक तालाबंदी में शामिल होगा, उसके खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज किया जाएगा। साथ ही विभागीय कार्रवाई अलग से होगी। उनके मुताबिक संघ का ताजा आन्दोलन सिर्फ राजनीति से प्रेरित है। शिक्षकों की ज्यादातर मांगों को माना जा चुका है। बाकी मांगों पर भी सरकार मंथन कर रही है, लेकिन जिस तरह शिक्षक नाजायज दबाव डाल के सरकार को झुकाना और अपनी हर किस्म की मांग मनवाना चाह रहा है, उसको बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। संघ की कुछ मांगों को जायज माना जा सकता है। इसमें एक्ट के मुताबिक तबादले करने, एसीपी का लाभ देने, कोटि करण करना, शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्यों में न लगाना शामिल है.साथ ही 15 दिन के सीसीएल का अनुमोदन प्रधानाचार्य के स्तर पर किये जाने की मांग भी नाजायज नहीं कही जा सकती.बाकी मांगों में वेतन विसंगति दूर करना, बेसिक से प्रोन्नत शिक्षकों को प्रोन्नत वेतनमान देने, तदर्थ शिक्षक बंधुओं को पूर्व सेवा का लाभ देने और 400 से ज्यादा बच्चों वाले स्कूलों में उप प्रधानाचार्य का पद मंजूर करना शामिल है.ये बात अलग है कि ये मांगें ऐसी नहीं है कि पहा? और मैदान के सरकारी स्कूलों में शिक्षक खुद ताला ठोंक दे और पढ़ाई से दूर का नाता न रखे।
ऐसे में सरकार का तालाबंदी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने का फैसला गलत भी नहीं कहा जा सकता है। सरकार ने वीडियोग्राफी कराने और उसके जरिये तालाबंदी करने वालों की पहचान करने करने का कदम उठाया है। ऐसे में आने वाले वक्त में जल्द आन्दोलन पर कोई फैसला नहीं होता है तो पहाड़ और मैदान सुलग सकता है। सरकार आने वाले दिनों में अपना मौजूदा सख्त रुख कायम रखती है या फिर शिक्षक संघ अपना आक्रामक रुख बरकरार रखता है, इस पर सबकी नजर रहेगी। ये आने वाले सालों में राज्य में शिक्षा महकमे के चरित्र को भी बदल के रख देगा।

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