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नफा-नुकसान तलाशती भाजपा

भाजपा को पता है कि बिना साफ नीयत, नीति और नेतृत्व के गठबंधन या महागठबंधन जैसी कोई चीज लम्बे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकती है। मोदी विरोध की बुनियाद पर गठबंधन बनाने की बजाय देशहित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए,लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। कांग्रेस की सबसे ताकतवर बॉडी सी.डब्ल्यू.सी ने समान विचारधारा वाले दलों से गठबंधन करने का अधिकार तो अध्यक्ष राहुल गांधी को दे दिया लेकिन इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री का चेहरा राहुल ही होंगे।

अजय कुमार

लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती बार-बार नया ‘सस्पेंस’ खड़ा कर देती हैं। कांग्रेस द्वारा राहुल को पीएम का चेहरा घोषित किये जाने के बाद माया ने एक बार फिर दोहराया है कि वह गठबंधन का हिस्सा तभी बन सकती हैं जब यह सम्मानजनक होगा। उनका यह बयान राहुल को पीएम का चेहरा घोषित करने की वजह से आया जरूर है, लेकिन शायद वह सपा प्रमुख अखिलेश यादव को भी कुछ संकेत देना चाह रही थीं। मायावती का उक्त बयान दबाव की सियासत का हिस्सा भी हो सकता है तो उधर यूपी में बनते-बिगड़ते राजनीतिक समीकरणों पर बीजेपी की पैनी नजर है। बीजेपी दो मोर्चों पर काम कर रही है। वह एक स्थिति यह मान कर चल रही है कि सपा-बसपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो जायेगा। दूसरी दशा के लिए भी वह तैयार है अगर यह गठबंधन न हो पाये। किसी भी परिस्थिति को अनुकूल बनाने और 2014 चुनाव जैसे नतीजे दोहराने के लिए भाजपा आलाकमान इन दिनों कई पहलुओं पर काम कर रहा है। इसके तहत वह यूपी को मोदीमय बनाने से लेकर, कमजोर सांसदों के टिकट काटने, गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों को साधने, मुस्लिम महिलाओं को अपने पक्ष में करने के साथ-साथ हिन्दुत्व को बढ़ावा देने में भी लगी है। इतना ही नहीं योगी सरकार के उन मंत्रियों की भी मंत्रिमंडल से छुट्टी हो सकती है जो आम चुनाव में भाजपा के लिये कमजोर कड़ी साबित हो सकते हैं तो जिन मंत्रियों की इमेज अच्छी है उन्हें लोकसभा चुनाव लड़ाया जा सकता है।
भाजपा को पता है कि बिना साफ नीयत, नीति और नेतृत्व के गठबंधन या महागठबंधन जैसी कोई चीज लम्बे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकती है। मोदी विरोध की बुनियाद पर गठबंधन बनाने की बजाय देशहित को प्राथमिकता मिलनी चाहिए,लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। कांग्रेस की सबसे ताकतवर बॉडी सी.डब्ल्यू.सी ने समान विचारधारा वाले दलों से गठबंधन करने का अधिकार तो अध्यक्ष राहुल गांधी को दे दिया लेकिन इस बात पर जोर दिया कि प्रधानमंत्री का चेहरा राहुल ही होंगे।
यह इतना भी आसान नहीं लगता है। मोदी हाल ही में लोकसभा में स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस, पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह, इन्द्र कुमार गुजराल,देवगौड़ा के साथ-साथ शरद पवार के साथ कांग्रेस ने क्या किया यह बता कर कांग्रेस के साथ गठबंधन करने की इच्छा रखने वालों को आगाह कर चुके हैं। एक तरफ कई राज्यों में कांग्रेस गठबंधन की सबसे मजबूत कड़ी लगती है तो दूसरी तरफ कांग्रेस की अति महत्वाकांक्षा (राहुल को पीएम के रूप में प्रोजेक्ट करने की जिद) गठबंधन की सबसे बड़ी समस्या भी है। 42 लोकसभा सीटों वाले पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में जहां सत्तारूढ़ दल का मुकाबला बीजेपी की बजाय कांग्रेस या वामपंथियों के साथ अधिक है, वहां मोदी विरोध के नाम पर गठबंधन बनाना आसान नहीं है। ममता बनर्जी कई बार इस बात के संकेत भी दे चुकी हैं। वहीं कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार को लेकर जिस तरह की
खबरें आ रही हैं,वह भी कांग्रेस के लिए चिंता का विषय है।
गठबंधन से फायदा किसे ज्यादा होगा, इससे अधिक अहम सवाल ये है कि नुकसान किसे होगा। गठबंधन में सीटों का बंटवारा कैसे होगा, किस सीट पर कौन सा कैंडिडेट होगा, कांग्रेस गठबंधन में आयेगी या नहीं। यह सवाल तो हैं ही इसके अलावा यह भी देखना दिलचस्प होगा जो नेता पांच वर्षों से लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं उनकी सीट किसी दूसरे दल के खाते में जाने के बाद वह किस तरह रियेक्ट करेंगे। आम चुनाव से पहले मध्य प्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधान सभा चुनाव होने हैं। तीनों ही जगह बीजेपी की सरकार है। यहां के नतीजे भी आम चुनाव को प्रभावित करेंगे। मध्य प्रदेश में बीजेपी लम्बे समय से सत्तारूढ़ है, परंतु राजस्थान में प्रत्येक विधान सभा चुनाव के बाद सत्ता परिर्वतन होता है। उत्तर प्रदेश में मोदीमय माहौल बनाने में बीजेपी अभी से जुट गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपी के लिये स्वयं मोर्चा संभाल रखा है. वे एक के बाद एक ताबड़तोड़ रैलियां करने में जुटे हैं. पिछले एक महीने के अंदर सूबे में पांच रैलियों को पीएम संबोधित कर चुके हैं। आगे भी ये सिलसिला थमेगा नहीं। बीजेपी राज्य के स्वच्छ छवि वाले प्रभावशाली मंत्रियों की सूची भी तैयार कर रही है, जिनकी चुनाव क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। बीजेपी आलाकमान 40 फीसदी मौजूदा सांसदों का टिकट काट सकती है। बीजेपी टिकट उसी को देगी जिसकी जीत पक्की हो। वहीं राहुल गांधी को अमेठी में घेरने के लिये मजबूत रणनीति बनाई जा रही है। रायबरेली से सोनिया गांधी चुनाव लड़ेगी इसको लेकर संशय है। वहीं आजमगढ़ जहां के सांसद मुलायम सिंह यादव है भी बीजेपी के प्रतिष्ठा का प्रश्न है। हाल ही में यहां मोदी जनसभा भी कर चुके है। गोरखपुर सीट को लेकर बीजेपी दुविधा में है। मौजूदा डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या के इस्तीफे के बाद यह सीट खाली हुई थी और उप-चुनाव में बीजेपी को यहां भी शिकस्त मिली थी। ऐसे में इन दोनों सीटों के लिये मजबूत उम्मीदवारों को लेकर पार्टी में मंथन चल रहा है।

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