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जड़ों से कटा आधारहीन वर्ग

पवन के वर्मा

एक ब्लॉगिंग साइट को दिये एक इंटरव्यू में मैंने यह कहा कि लुटियन (नयी दिल्ली का अंग्रेजों द्वारा निर्मित हिस्सा) का उच्च वर्ग चतुर्दिक जल से घिरे द्वीपों की तरह जड़ एवं आधार से रहित है, जिसकी पहचान सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी ही है, इसके पक्ष और विपक्ष में बड़ी तादाद में टिप्पणियां आयीं। इसलिए मैंने यह महसूस किया कि मुझे अपनी बात का आशय कुछ और विस्तार से प्रकट करने की जरूरत है।
पहली बात तो यह कि ‘लुटियन का उच्च वर्ग’ किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र का संकेत नहीं करता। इससे कहीं अधिक, यह एक नजरिया, हक की एक विशिष्ट समझ तथा मुख्यत: उत्तराधिकार तथा विशेषाधिकार आधारित वरीयताबोध के अतिरिक्त, लोगों का मूल्यांकन सिर्फ उनके द्वारा बोली जानेवाली अंग्रेजी का प्रवाह और उसके उच्चारण के आधार पर करने की प्रवृत्ति का द्योतक है। दूसरी, ऐसा नहीं है कि इस वर्ग में कोई प्रतिभा नहीं है, इसमें भी बौद्धिक श्रेष्ठता से संपन्न लोग हैं, जो केवल अंग्रेजी में ही सर्वाधिक सहज तथा मुख्यत: एक ऐसे छोटे दायरे में सिमटे होते हुए भी, जहां केवल यही एक भाषा बोली और समझी जाती है, देश की भलाई के प्रति अपने योगदान किया करते हैं। तीसरी, यह अपने आप में कोई अंग्रेजी की आलोचना नहीं है। ऐतिहासिक कारणों से ही अंग्रेजी इस विश्व में एक बड़ी तादाद में लोगों द्वारा बोली जानेवाली भाषा है, जो इस भूमंडलीकृत विश्व में संप्रेषण का अपरिहार्य साधन बन गयी है। इसके अलावा, एक भाषा के रूप में इसकी एक भिन्न सुंदरता तथा सुघड़ता है। भाषाएं स्वयं में ही किसी सांस्कृतिक दबदबे की दोषी नहीं होतीं, वह तो उनका प्रयोग होता है।
समस्या तब शुरू होती है, जब अंग्रेजी सामाजिक बहिष्करण की वजह बन जाती है। लुटियन का उच्च वर्ग वस्तुत: यह यकीन करता है कि उसे इस भाषायी रंगभेद का संचालक होने तथा शेष भारत को इसका पीडि़त अथवा अभ्यर्थी मानने का अधिकार हासिल है। वैसी स्थिति में इस भाषा को पक्का साहबों की तरह बोलना इस आत्ममुग्ध वर्ग में प्रवेश एवं सामाजिक स्वीकृति पाने की एकमात्र कसौटी बन जाता है। एक राजनयिक के अपने पूर्व रूप में मैं एक ऐसे अधिकारी का मातहत रह चुका हूं, जो लुटियन के इस उच्च वर्ग की बदतरीन विशिष्टताओं का प्रतिनिधित्व किया करते थे। यदि उनके निकट हिंदी अथवा उर्दू मीडिया का कोई आगंतुक आता, तो वे मुझसे उन्हें निबटा देने का अनुरोध करते। प्रसंगवश मैं यह भी बता दूं कि वे उर्दू को ‘अर्दू’ कहा करते थे। सौभाग्य से अतीत के इन स्मृतिचिह्नों की संख्या घटती जा रही है। जो आज भी बाकी बचे हैं, वे अपने भाषायी पिंजड़े में एकाकी, सांस्कृतिक तथा भाषायी जड़ों से कटे कार्टून जैसे ही जी रहे हैं। वे उस अन्य भारत के उदय से बेपरवाह हैं, जहां अंग्रेजी अहम तो है, पर जहां सरोकार, प्राथमिकताएं तथा प्रतिभाएं उसके उच्चारण की मोहताज नहीं हैं। फिर भी, यह मानना नादानी ही होगी कि नये के इस सशक्तीकरण ने पुराने के प्रति सम्मान को गैरअहम कर दिया है। मैं जब लंदन में नेहरू सेंटर के निदेशक के रूप में पदस्थापित था, तो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सुनील कुमार नामक एक युवा छात्र मुझसे मिलने आये। उनका परिवार बिहार से है, पर सुनील की शिक्षा-दीक्षा इंग्लैंड में हुई और उनके माता-पिता कैलिफोर्निया में रहते हैं। उन्होंने मुझे अपनी दिल्ली यात्रा का एक किस्सा सुनाया. ‘मैंने पड़ोस में ही स्थित कॉफी दुकानों की शृंखला बरिस्टा की एक दुकान में कॉफी पीने की सोची। मैंने जींस के ऊपर कुरता पहन रखा था। दुकान के दरवाजे पर खड़ी होस्टेस ने मुझे हिंदी में टोका, ‘कहां जा रहे हो? यहां कॉफी बहुत महंगी है.’ मैंने हिंदी में ही उससे पूछा, ‘कितने की है?’ ‘बावन रुपये की एक कप,’ उसका जवाब था। तब मैंने अंग्रेजी में उससे पूछा, ‘बावन कितना होता है?’ मेरे अंग्रेजी बोलने के ढंग तथा यह समझ कि मैं अंग्रेजियत में इस कदर रंगा हूं कि मुझे बावन का अर्थ नहीं पता, उसने अपने चेहरे का भाव बदल एक मुस्कान ओढ़ी और मेरा स्वागत कर मुझे अंदर आने दिया’।
यह वाकया कई वर्षों पूर्व हुआ। पर आज भी बहुत कुछ नहीं बदला है और लुटियन के उच्च वर्ग को यह पता है। अंग्रेजी को जरूरत से ज्यादा अहमियत देने का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण असर अपनी भाषा के समानुपाती अवमूल्यन के रूप में सामने आया। बुरी तरह बोली जाती अंग्रेजी भी एक अखिल भारतीय संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार्य समझी जाती, यहां तक की प्रशंसित होती है। यह दूसरी बात है कि पुराने संभ्रांत उस पर हंसते हुए उसे अपनी वरीयता की संपुष्टि समझते हैं। एक ऐसे राष्टï्र के लिए, जिसकी भाषागत विरासत की समृद्धि अनुमान से परे है और जहां शताब्दियों की अवधि में कम-से-कम दो दर्जन भाषाएं अपनी विपुल साहित्यिक संपदा तथा परिष्कृत लिपियां लिये विकसित हुई हों, यह एक त्रासदी से कुछ भी कम नहीं. यह अंग्रेजी में अभिव्यक्त होता घटियापन ही है, जिसकी वजह से अटल बिहारी बाजपेयी ने कभी चुटकी ली थी कि अंग्रेजों ने भारत को स्वतंत्रता आंदोलन की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए छोड़ा कि वे अंग्रेजी भाषा की और अधिक हत्या होते नहीं देख सकते थे। पर अब भारत बदल रहा है।
लुटियन का उच्च वर्ग ऐसे अकेले संभ्रांत लोग का है, जो इसे अथवा इस तथ्य को कि उन्हें अनायास हासिल सामाजिक उच्चता, सर्वोत्तम शैक्षिक संस्थानों और सर्वोत्तम जॉब तक उनकी निर्बाध पहुंच आज चुनौतीग्रस्त है, पूरी तरह आत्मसात नहीं कर सके हैं। इसके सदस्य आज भी अपने नौकरों से एक कृत्रिम हिंदी बोलते हैं, आधुनिकता को केवल पाश्चात्य शर्तों पर परिभाषित करते हैं, प्राचीन भारत के परिष्कार की किसी भी चर्चा को किसी-न-किसी रूप में गैर-धर्मनिरपेक्ष मानते हैं और एक चपाती अथवा तंदूरी चिकन को भी सिर्फ छुरी और कांटे द्वारा ही खाने पर जोर देते हैं। फिर चाहे उनकी मातृभाषा हिंदी ही क्यों न हो, ऐसे लोग हिंदी को भाषायी रूप से इतनी दरिद्र बना दिया जाना चाहते हैं, ताकि यह इस भाषा से उनकी गैरजानकारी के उपयुक्त लगे। अंग्रेजों द्वारा भारत में छोड़ गये ‘संभ्रांत’ क्लबों में उन्हें औपचारिक भारतीय परिधान भी अस्वीकार्य लगा करता है और किसी भी ऐसे व्यक्ति के प्रति उन्हें एक सामान्य वितृष्णा महसूस होती है, जो उनकी ही पृष्ठभूमि से नहीं आता। सच कहूं, तो वे एक सिकुड़ते द्वीप में घिरे हैं, और यदि
वे जल्द ही नहीं बदलते, तो शीघ्र अप्रासंगिक हो चुके होंगे।

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