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खादीधारियों पर भी चले चाबुक

  • एनएच-74 घोटाले पर सख्त हुआ त्रिवेंद्र का रुख
  • आईएएस पंकज और चंद्रेश पर भी आंच
  • एसटीएफ की भूमिका पर अंगुली
  • सिर्फ नौकरशाह,कर्मचारी और किसानों पर केन्द्रित है कार्रवाई
  • एनएचएआई वाले कब आएँगे शिकंजे में

चेतन गुरुंग
देहरादून। उस वक्त कुमायूं के आयुक्त और इन दिनों कृषि सचिव सेंथिल पांडियन को बहुत सुलझे हुए और काबिल नौकरशाहों में शुमार किया जाता है। आयुक्त होने के साथ उनके पास सचिव की दोहरी जिम्मेदारी थी। लिहाजा देहरादून-नैनीताल (मंडल मुख्यालय) वह सडक़ मार्ग से भी खूब आते-जाते थे। नगीना-काशीपुर के बीच उन्होंने देखा सडक़ बहुत खराब रहती है। उनको हैरानी इसलिए होती थी कि ये राजमार्ग था और उसके निर्माण के लिए 180 करोड़ रूपये का मुआवजा बांटा जा चुका था। उन्होंने बैठक बुलाई और एनएच वालों को जम कर डांट लगाईं। ये क्या हाल बना रखा है। सडक़ क्यों नहीं बन रही। एनएच वालों ने बताया कि उन्होंने पैसा तो पूरा खर्च किया लेकिन राज्य सरकार के अफसरों ने जमीन की कीमत 10 गुणा ज्यादा कर दी। जमीन की वास्तविक कीमत 18 करोड़ थी, सो मुआवजा में दी गई राशि से बहुत कम जमीन हाथ लगी है। उस पर क्या सडक़ बनेग। भौंचक्के आयुक्त ने अधिग्रहित जमीन के 20 केस हाथ में लिए और परीक्षण किया। नतीजे के तौर पर सदी का सबसे बड़ा घोटाला सामने आ गया। इस मामले की जांच पिछली हरीश रावत सरकार ने बिठाई थी, लेकिन अब त्रिवेंद्र सरकार इस पर सख्त रुख अपनाती दिख रही है।

…..अब तक छह से ज्यादा पीसीएस अफसरों और कर्मचारियों को जेल भेज चुकी त्रिवेंद्र सरकार ने अब इस मामले उधमसिंह नगर, जहाँ का ये मामला है, के दो पूर्व जिलाधिकारियों डॉ. पंकज पाण्डेय और चंद्रेश यादव को नोटिस दे के जवाब तलब किया है। इस सबके बीच ये सवाल भी प्रमुखता से उठ रहा है कि क्या अरबों रूपये के इस घोटाले में किसी सियासतदां की कोई अहम भूमिका नहीं थी। त्रिवेंद्र सरकार की विश्वसनीयता और बढ़ेगी जब किसी खादी धारी पर भी जांच की आंच आएगी. सेंथिल के मुताबिक उन्होंने शुरुआत में ही परीक्षण के दौरान घोटाले को सूंघ लिया था। उन्होंने सरकार से कह दिया था कि मामला बड़ा है। इसकी जांच वह या कोई भी अफसर नहीं कर सकता है। इसकी जांच सीबीआई करे या फिर एसआईटी.त्रिवेंद्र सरकार ने भलमनसाहत में केंद्र सरकार को सीबीआई जांच के लिए चि_ी भेज दी। पहले तो चि_ी पर कोई कार्रवाई लम्बे समय तक नहीं हुई, जब राज्य सरकार के रिमाइंडर आए तो केन्द्रीय राष्टï्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का जवाब आया कि सीबीआई जांच कराना उत्तराखंड के लिए ठीक नहीं होगा। इसके बाद राज्य सरकार ने चुपचाप एसआईटी का गठन कर जांच खुद कर ली। जांच में पहले तो एसडीएम स्तर के अफसर और छोटे कर्मचारी जेल गए फिर वे किसान जेल गए । जिन्होंने घोटाला कर जमीन को कृषि भूमि को अफसरों संग मिलीभगत कर अकृषि कर करोड़ों कमाए। अब जब अफसर जेल जाने लगे हैं तो किसान भी सामने आके अतिरिक्त मुआवजा राशि सरकार को लौटाने लगे हैं। इससे ये साबित हो गया कि मुआवजा मामले में खूब घोटाले हुए। त्रिवेंद्र ने एनएच-74 घोटाले में जो रुख दिखाया है उससे उनकी और सरकार की साख भले बढ़ी न हो लेकिन गिरी भी नहीं है। उन्होंने जिस तरह नौकरशाहों पर भी घेरा बंदी की है, उससे ये तो साफ हो रहा है कि वह जीरो टालरेंस के अपने वायदे की राह पर आगे बढऩे लगे हैं। हालाँकि अभी भी कई मामले हैं, जिन पर उनसे कड़े कदम की उम्मीद लगाईं जाती है। इनमें शराब महकमे में हुए घोटालों के शातिर अफसरों पर कड़ी कार्रवाई करना प्रमुख रूप से शामिल है। जिन पर करोड़ों की बैंक गारंटी घोटाले के साथ ही सस्ती कीमत पर ही दुकानें बेच डालने के गंभीर आरोप हैं। महकमे के आला अफसरों की छत्रछाया के चलते वे बच गए लेकिन चार्जशीट होने के बावजूद उनको कुर्सी से न हटाया जाना त्रिवेंद्र के जीरो टालरेंस का मजाक कहा जाएगा। मुख्यमंत्री ने आईएएस अफसरों पाण्डेय और यादव के खिलाफ तो सख्ती दिखा दी लेकिन वह शराब के अफसरों के सामने क्यों दंडवत हैं, ये किसी की भी समझ से परे है। सरकार के इस कदम से कोई ना इत्तफाकी रख रहा है कि उसके आदेश पर एसटीएफ ने कई पीसीएस अफसरों को जेल में भेज दिया और आईएएस अफसरों पर भी हाथ डालने से नहीं कतरा रही, फिर क्यों वह किसी खादी धारी के खिलाफ कुछ कार्रवाई नहीं कर पाई। क्या उसके इस रुख को ये मान लिया जाए कि इस घोटाले में कोइ सियासत का खिलाड़ी संलिप्त था ही नही, ऐसा है तो यह बहुत बड़ा आश्चर्य कहा जाएगा। वैसे पाण्डेय और यादव पर कार्रवाई को ले कर भी सवाल उठ रहे हैं। यह पूछा जा रहा है कि न्यायिक अधिकारी के तौर पर किए गए फैसलों को क्या दंडात्मक कार्रवाई की जद में लाया जा सकता है? इसको भ्रष्टाचार के सामान्य मामलों की तरह लिया जा सकता है? इस बीच एनएच के अफसरों पर अभी तक आंच न आने को ले कर केंद्र सरकार पर जम कर अंगुली उठाई जा रही है। आखिर पैसा तो एनएचएआई का था। क्या उसके अफसरों का इस बात का इल्म नहीं था कि पैसा बहुत ज्यादा बतौर मुआवजा दिया जा रहा है। अगर उनको इल्म था तो फिर आर्बिट्रेटर के फैसले के खिलाफ सक्षम अदालत में अपील करने क्यों नहीं गए? खामोशी संग भुगतान क्यों किया? ऐसा तो नहीं कि इस पूरे खेल में वे भी राज्य के अफसरों संग डूबे हुए थे। क्या यह मुमकिन है कि राज्य के अफसर मनमाने तरीके से मुआवजे की रकम एनएच वालों से लेते रहे और वे खजाना खोल के उसको लुटते देखते रहे। माना जा रहा है कि अगर एनएच के अफसरों को भी पूछताछ के दायरे में लाया जाए तो घोटाले में उनकी अहम भूमिका भी सामने आ सकती है। कहा ये जा रहा है कि इस पूरे घोटाले का मास्टर माइंड एक बहुचर्चित पीसीएस अफसर डीपी सिंह था। वह अभी जेल में है। इस बीच जिस तरह मुआवजा गलत ढंग से ले चुके किसान अतिरिक्त मुआवजे की रकम लौटाने सामने आ रहे हैं, उससे घोटाले की पुष्टि पुख्ता ढंग से हो चुकी है। अब टास्क फोर्स को ये देखना भर रह गया है कि किस बन्दे का किस तरह का काम था। घोटाले में उसकी कितनी भूमिका थी। इस बीच टास्क फोर्स के मुखिया एसएसपी सदानंद दाते सीबीआई में चुन लिए गए हैं। ऐसे में अब आगे की जांच में वह दम-खम न रह जाने की आशंका जताई जा रही है। दाते को न दबने और झुकने वाले आईपीएस अफसर के तौर पर शुमार किया जाता था। ये देखने वाली बात होगी कि दाते के स्थान पर सरकार किसको टास्क फोर्स की कप्तानी सौंपती है और नया कप्तान इस जांच को किस तरह प्रभावी तरीके से आगे बढ़ा सकने में सफल होते हैं।

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