You Are Here: Home » BIG NEWS » लोक संसद की कल्पना

लोक संसद की कल्पना

जनतांत्रिक सरकार बनाने के लिए तो चुनाव की व्यवस्था की गयी है, लेकिन इन मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण कैसे किया जा सकता है? मेरे खयाल से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के चिंतक इस कठिनाई से वाकिफ थे। शायद इसलिए गांधी प्रार्थना सभा किया करते थे, हिंदुस्तानी और गुजराती में लिखने पर जोर दिया करते थे, रवींद्रनाथ ठाकुर गीत और उपन्यास लिखा करते थे, और आंबेडकर सभाओं में जाकर लंबा भाषण दिया करते थे, मौलाना आजाद कुरान शरीफ की बातें लिखते और विनोबा के गीता प्रवचन का उर्दू अनुवाद हुआ करता था। आज ये परंपराएं लगभग मर सी गयी हैं। ज्यादातर लोगों ने साहित्य पढऩा बंद कर दिया है। समाज में बहस के बदले गालियां दी जा रही हैं, चिंतन के बदले व्यक्ति-भक्ति हो रही है।

अजय कुमार

सफल लोकतंत्र के लिए समाज के हर स्तर पर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति श्रद्धा का होना जरूरी है। यदि व्यक्ति, परिवार, जाति समूहों और प्रकृति के साथ हमारा लोकतांत्रिक संबंध नहीं होगा, तो फिर राज्य और सरकार के स्तर पर भी इसका होना संभव नहीं है। बलात्कार, भीड़ द्वारा हत्या, धर्म के नाम पर हिंसा, घरेलू हिंसा आदि में यदि बढ़ोतरी हो रही हो, तो फिर हमें समझना चाहिए कि हमारा लोकतंत्र खतरे में है। इस खतरे से निकालने के लिए हमें नयी राजनीतिक संस्थाओं की खोज शुरू करनी चाहिए। कुछ खोज जो स्वतंत्रता संग्राम में हुए थे, उन्हें पुन: जांचने की जरूरत है, कुछ जो अधूरे रह गये थे, उन्हें पूरा करने की जरूरत है।
हमें समझने की जरूरत है कि हमारा समाज किस ओर जा रहा है। यहां बच्चियों के साथ बलात्कार हो रहा है, अस्सी वर्ष के एक बुजुर्ग को कॉलेज के छात्र सामूहिक रूप से पीटने लगते हैं, बालिका सुरक्षा गृह में बलात्कार हो रहा है और बलात्कार करनेवाले लोग ही सुरक्षा के लिए जिम्मेदार थे। आये दिन लड़कियों पर एसिड फेंका जा रहा है, बहुओं को जलाया जा रहा है, दंगे हो रहे हैं, और इन सबके बीच हम जनतंत्र की बात भी कर रहे हैं। हम दावा भी कर रहे हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र हैं हम। यह तो तय है कि यदि समाज में जनतांत्रिक मूल्य नहीं हैं, तो देश जनतांत्रिक नहीं हो सकता है।
अब सवाल है कि जनतांत्रिक सरकार बनाने के लिए तो चुनाव की व्यवस्था की गयी है, लेकिन इन मूल्यों पर आधारित समाज का निर्माण कैसे किया जा सकता है? मेरे खयाल से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के चिंतक इस कठिनाई से वाकिफ थे
। शायद इसलिए गांधी प्रार्थना सभा किया करते थे, हिंदुस्तानी और गुजराती में लिखने पर जोर दिया करते थे, रबींद्र नाथ ठाकुर गीत और उपन्यास लिखा करते थे, और आंबेडकर सभाओं में जाकर लंबा भाषण दिया करते थे, मौलाना आजाद कुरान शरीफ की बातें लिखते और विनोबा के गीता प्रवचन का उर्दू अनुवाद हुआ करता था। आज ये परंपराएं लगभग मर सी गयी हैं। ज्यादातर लोगों ने साहित्य पढऩा बंद कर दिया है। समाज में बहस के बदले गालियां दी जा रही हैं, चिंतन के बदले व्यक्ति-भक्ति हो रही है।
जनतंत्र का आधार जनसंवाद ही हो सकता है और जनसंवाद का राजनीतिक होना उतना ही जरूरी है, जितना उसका सामाजिक होना। खोजना यह है कि इसके लिए ऐसी कौन सी संस्था बनायी जा सकती है, जिससे राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, दार्शनिक संवाद एक साथ हो सके और उसका वर्तमान राजनीति से सीधा संबंध हो। इन प्रक्रियाओं को अलग करना ही शायद आज की समस्या की जड़ में है। क्या इसके लिए ‘लोक संसद’ जैसी किसी संस्था की कल्पना की जा सकती है? यह कल्पना कोई नयी नहीं है। गांधी और जेपी जैसे चिंतकों ने इसकी चर्चा किसी-न-किसी रूप में की है।
इन संस्थाओं का काम क्या हो? इनका पहला काम तो स्थानीय समस्याओं के बारे में विमर्श, उसके उपाय और उसके लिए लोगों को प्रेरित करना, सरकारी नीतियों के बारे में जानकारी लोगों तक ले जाना और उसकी समालोचना और उसके क्रियान्वयन पर ध्यान देना हो। एक तरह से यह माइक्रो प्लानिंग का काम करे। लेकिन, इसके साथ ही समस्याओं का समाधान सामाजिक स्तर पर करना भी इसका काम हो। एक तरह से इसका काम प्लानिंग, निगरानी और क्रियान्वयन तीनों हो।
दूसरा काम ज्ञान के जनतंत्रीकरण का है। आज की एक बड़ी समस्या है कि आम लोगों के पास समान्य ज्ञान का श्रोत केवल मीडिया और सोशल मीडिया ही रह गया है। जो जन-चेतना स्वतंत्रता संग्राम में फैला था, लगभग खत्म हो गया है। इसलिए इन्हें आपस में जुड़े हुए छोटे-छोटे पुस्तकालयों का निर्माण करना चाहिए जिसमें बहस, मुशायरा, सामूहिक साहित्य चर्चा की जा सके। इनका तीसरा बड़ा काम हो चुनावी राजनीति को प्रभावित करना। चुनाव के दौरान पार्टियों के उम्मीदवारों के बारे में लोगों को अवगत कराएं, उन्हें स्थानीय समस्याओं पर अपना नजरिया देने को बाध्य करे और उनके द्वारा किये वादों पर अमल करने के लिए जनमत का दबाव उन पर बनाये रखे। अपने बीच से ही लोगों को पार्टी से इतर जाकर चुनाव लडऩे के लिए प्रेरित करे।
मेरे कहने का मतलब है कि भारतीय जनतंत्र को राजनीतिक पार्टियों के मायाजाल से बचाने की भी जरूरत है क्योंकि ये पार्टियां अब कॉरपोरेट घरानों की तरह काम करती हैं। यह याद रखना जरूरी है कि अपने सामाजिक कार्यों की पूंजी को राजनीतिक पूंजी में बदलने का प्रयास सही नहीं है और सफल भी नहीं हो सकता है। लेकिन, व्यवस्था कुछ ऐसी बनानी होगी कि ये दोनों एक-दूसरे
के साथ प्रारंभ से ही जुड़े रहें और एक-दूसरे के पूरक हों।

All Rights Reserved to Weekand Times . Website Developed by Prabhat Media Creations.