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अटल होने का अर्थ

  • अपने पीछे राजनीति की समृद्ध विरासत छोड़ गए अटल जी
  • राजनीति, कूटनीति और विकास कार्यों में खींची बड़ी लाइन

Sanjay Sharma @WeekandTimes
16 अगस्त। देश और दुनिया की नजर दिल्ली के एम्स पर लगी थी। पीएम मोदी से लेकर तमाम राजनेता बेचैनी से अस्पताल में चहलकदमी कर रहे थे। सभी मौन और निशब्द थे। सभी को मेडिकल बुलेटिन का इंतजार था। यह बुलेटिन थी राजनीति के अजातशत्रु, देश के पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की सेहत की। अचानक शाम 5 बजकर 5 मिनट पर बुलेटिन जारी हुई। कहीं दूर विशाल वट वृक्ष अरअरा कर गिर पड़ा। अटल जी नहीं रहे। राजनीति के एक युग का अवसान हो गया। यह अवसान उनके देह का था, उनके कृतित्व और व्यक्तित्व का नहीं। वह अटल हैं, अमर हैं। अटल जी ने राजनीति, विदेश नीति, राष्टï्रवाद, सांप्रदायिक सौहाद्र्र और विकास के क्षेत्र में जैसी लकीर खींची, उसके समानांतर केवल अटल जी ही नयी रेखा खींच सकते थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों को जोडऩे और जुडऩे में लगा दिया। विरोधी भी उनके कायल रहे। विदेश नीति में उन्होंने दोस्ती भी निभाई और समय आने पर मुंहतोड़ जवाब भी दिया। देशहित के लिए वे कोई भी दुस्साहस दिखा सकते थे और दिखाया भी। अमेरिका समेत तमाम देशों के विरोध को दरकिनार कर पोखरण में परमाणु विस्फोट कराकर भारत को परमाणु शक्ति संपन्न देश बना दिया। कश्मीर मुद्दे पर गले मिलकर हल निकालने की कोशिश की तो सडक़ों व नदियों को जोडऩे की परिकल्पना साकार कर देश के विकास को रफ्तार दी। अटल जी अपने पीछे समृद्ध विरासत छोड़ गए हैं, कुछ सवाल भी। अटल जी की इस विरासत को कौन आगे बढ़ाएगा?


…अटल बिहारी वाजपेयी विराट व्यक्तित्व के धनी थे। वे कवि, कुशल राजनेता, कूटनीतिज्ञ, देशभक्त और मित्रों के परम मित्र थे। विश्व बंधुत्व की भावना उनके हृदय में हिलोरे मारती थीं। 93 साल की उम्र में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पंचतत्व में विलीन हो गए। उनका पूरा व्यक्तित्व संघर्षों में तप कर कुंदन बना। बतौर राजनेता अटल जी ने हर मुमकिन ऊंचाई को छूआ। प्रधानमंत्री के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा करने वाले वे पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। ये अटल जी ही थे जिन्होंने दो सीटों वाली भाजपा को शिखर तक पहुंचा दिया। जनता में उनकी सहज स्वीकार्यता के कारण ही आरएसएस को लालकृष्ण आडवाणी को पीछे रखकर वाजपेयी को आगे बढ़ाना पड़ा था। अटल जी भारत के तीन बार प्रधानमंत्री रहे । पहले 13 दिन तक, फिर 13 महीने और उसके बाद 1999 से 2004 तक का कार्यकाल उन्होंने पूरा किया। अटल जी ने साबित कर दिया कि देश में गठबंधन सरकारों को भी सफलतापूर्वक चलाया जा सकता है। यह अटल जी का व्यक्तित्व था कि उन्होंने भारतीय जनमानस में दक्षिणपंथ को रचा-बसा दिया और भाजपा अपने दम पर पहली बार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बहुमत की सरकार बना सकी। अटल जी अपने कार्यकाल मेंं कई महत्वपूर्ण और साहसिक फैसले लिए। जिन पर चलकर भारत के विकास को पंख लगे।
अटल जी ने सडक़ों के जरिए भारत को जोडऩे की योजना शुरू की। उन्होंने चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और मुंबई को जोडऩे के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज सडक़ परियोजना लागू की, साथ ही ग्रामीण अंचलों के लिए प्रधानमंत्री ग्रामीण सडक़ योजना लागू की। उनके इस फैसले ने देश के आर्थिक विकास को रफ्तार दी। यही नहीं उन्होंने नदियों को जोडऩे की योजना का खाका भी बनाया। अटल जी ने देश में निजीकरण को रफ्तार दी। विदेशी निवेश के रास्ते खोले। उन्होंने बीमा कंपनियों में विदेशी निवेश की सीमा को 26 फीसदी तक कर दिया था, जिसे मोदी सरकार ने बढ़ाकर 49 फीसदी कर दिया है। जनसंचार क्रांति में भी अटल जी का योगदान अहम है। आम जनता तक संचार सुविधाओं को पहुंचाने का काम उन्होंने किया। 1999 में अटल जी ने भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के एकाधिकार को खत्म करते हुए नई टेलीकॉम नीति लागू की। इसके चलते लोगों को सस्ती दरों पर फ़ोन कॉल्स की सुविधा मिली और मोबाइल फोन का दौर शुरू हुआ। शिक्षा के क्षेत्र में छह से 14 साल के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का अभियान शुरू किया गया। मई 1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया। 1974 के बाद भारत का यह पहला परमाणु परीक्षण था। इस परीक्षण के बाद अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा और कई पश्चिमी देशों ने भारत के खिलाफ आर्थिक पांबदी लगा दी लेकिन अटल जी झुके नहीं और अपने कूटनीतिक कौशल का ऐसा कमाल दिखाया कि 2001 के आते-आते अधिकांश देशों ने सभी प्रतिबंध हटा लिए। यही से पहली बार भारत ने रूस की जगह अमेरिका को तरजीह देनी शुरू की। इसी विदेश नीति पर चलते हुए आज भारत और अमेरिका के संबंध बेहद मधुर हो चुके हैं। अटल जी कहा करते थे कि मित्रों को बदला जा सकता है लेकिन पड़ोसी को नहीं, लिहाजा उन्होंने पाकिस्तान से मधुर संबंध बनाने की हर मुमकिन कोशिश की। 1999 में दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू की थी। उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ मिलकर लाहौर दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। इतना ही नहीं, अटल जी अपनी इस लाहौर यात्रा के दौरान मीनार-ए-पाकिस्तान भी गए। तब तक कोई कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी मीनार-ए-पाकिस्तान जाने का साहस नहीं जुटा पाया था। मीनार-ए-पाकिस्तान वह स्थान है जहां पाकिस्तान को बनाने का प्रस्ताव 23 मार्च, 1940 को पास किया गया था। लेकिन पाकिस्तान ने भारत की इस उदारता का प्रतिफल कारगिल घुसपैठ कर दी। इसके बाद अटल जी ने पाक को सबक सिखाया। कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी। हालांकि इसके बाद भी अटल जी ने पाकिस्तान को संबंध सुधारने का एक और मौका दिया। आगरा में अटल और परवेज मुर्शरफ की मुलाकात हुई, लेकिन संबंध सुधरे नहीं। सांप्रदायिक सौहार्द पर अटल जी पूरा विश्वास करते थे। यही वजह है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद ध्वंस की उन्होंने खुलकर निंदा की और गुजरात में हुए दंगे के दौरान नरेंद्र मोदी को राजधर्म के पालन का पाठ भी पढ़ाया। वे लेखक, पत्रकार और कवि थे। वे विरोधियों को भी अपना बना लेते थे। उनका व्यक्तित्व इतना विराट था कि एक बार जो उनसे मिलता था, उन्हीं का हो जाता। वे कहते थे लोकतंत्र में शत्रुता का कोई स्थान नहीं होना चाहिए लेकिन अपने जीवन काल में ही वे राजनीति के गिरते स्तर को लेकर चिंतित थे। अपने भाषण में उन्होंने यह आशंका जाहिर भी की थी कि आने वाले दिनों में राजनीति का स्तर इतना गिर जाएगा कि विरोधी दलों के नेता एक-दूसरे से शत्रुवत व्यवहार करने लगेंगे। आज उनकी यह आशंका सही साबित हो रही है। लेकिन उनका अपना व्यक्ति विराट था। बकौल अटल जी, मेरे प्रभु! मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना, गैरों को गले न लगा सकूं, इतनी रुखाई कभी मत देना। और अब जब अटल जी अनंत यात्रा पर जा चुके हैं, उम्मीद बाकी है। खुद अटल जी के शब्दों में, मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं।

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