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सीबीआई जांच हो तो खुलासा भी हो

  • नौकरशाहो की सफाई से घोटालो में मोड़
  • सीबीआई की  जांच पर उठाने लगी उगली

चेतन गुरुंग @ Weekandtimes

देहरादून। उधमसिंह नगर में एनएच-74 के निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण के दौरान मुआवजा बंटवारे में हुए घोटाले में जब एसआईटी ने दो पूर्व कलेक्टरों डॉ. पंकज पाण्डेय और चंद्रेश यादव को नोटिस भेजा और सरकार ने भी स्पष्टीकरण दोनों से मांग लिया तो खलबली का आलम सचिवालय और मीडिया के साथ ही सियासी दुनिया में भी खूब रहा। दोनों छुट्टी पर गए तो ये तक कहा गया कि वे भूमिगत हो गए, हालांकि, दोनों एक-दो दिन बाद ही दफ्तर में मिल गए, और सरकार को आरोपों के जवाब भी सौंप दिए। दोनों ऑन द रिकॉर्ड कुछ भी बोलने पर राजी नहीं है, और यही बोल रहे कि उनको जो कहना है सरकार को लिखित में कह दिया है। बाकी जांच में वे सहयोग को पूरी तरह तैयार हैं। सरकार के सूत्रों के मुताबिक दोनों ने जो स्पष्टीकरण सरकार को दिए हैं, उनमें कहा गया है कि उनके कार्यकाल में जब एक पैसे का भुगतान बतौर मुआवजा किसी को नहीं हुआ तो फिर करोड़ों का घोटाला उन्होंने कैसे कर दिया? उनके इस जवाब से उस एसआईटी जांच पर सवाल उठाना लाजिमी है कि उसने आखिर किस बिना पर दोनों वरिष्ठ आईएएस अफसरों को निशाने पर लिया है? क्या उसके पास ठोस सुबूत हैं कि दोनों वाकई घोटाले में शामिल थे। ऐसा लग रहा है कि एसआईटी इतने बड़ेे मामले की जांच के लिए सक्षम नहीं है। इसकी जांच सीबीआई से होनी चाहिए। जो बिना किसी दबाव के दूध का दूध और पानी का पानी करेगी।

……त्रिवेंद्र सरकार तो चाहती भी थी कि सीबीआई जांच करे लेकिन जिस एनएचएआई का अरबों रुपया प्रोजेक्ट में लगा है, उसके मंत्री नितिन गडकरी ने साफ कह दिया कि सीबीआई जांच न तो होनी चाहिए न ये उत्तराखंड के लिए ठीक रहेगा। जिस घोटाले को उत्तराखंड के इतिहास का सबसे बड़ा बताया जा रहा है आखिर उसकी जांच सीबीआई से कराने में केंद्र सरकार को क्या ऐतराज हो सकता है? क्या उसको अपनी ही जांच एजेंसी पर यकीन नहीं है कि वह सही जांच नहीं करेगी। किसी बेगुनाह को फंसा देगी.गडकरी और एनएचएआई के इस रुख को ले कर अब शक जताया जाने लगा है तो इसलिए कि केंद्र में वह मोदी सरकार है जिसका नारा न खाऊंगा न खाने दूंगा है। फिर क्यों सीबीआई जांच से वह पीछे हट रही या घबरा रही.वीक एंड टाइम्स की जांच में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उसके मुताबिक ऐसा लग रहा है कि एसआईटी की जांच में कहीं कमी रह रही है। साथ ही उसको बहुत ज्यादा तवज्जो दे दी गई। सोशल मीडिया भी उसके कसीदे काढ़ रही और जांच में आ रही कमियों पर पर्दा डाला जा रहा है। आईएएस लॉबी को अब खुद को एकजुट हो के इस जांच के खिलाफ आवाज उठाने का मौका भी मिल गया है। आईएएस अफसरों का तर्क है कि जमीनों से जड़ेे मामले बहुत विशेषज्ञता वाले होते हैं। पुलिस के अफसर या फिर ज्यादातर दारोगाओं के लिए इसकी पेचीदगियों को समझ पाना और सुलझा पाना आसान तो कतई नहीं है। ये ऐसा ही है जैसे आईएएस अफसरों से आईपीएस अफसरों की तरह काम लेने और आईपीसी, सीआरपीसी के एक्ट को समझने की उम्मीद की जाए। सरकार को पंकज और चंद्रेश ने जो सफाई दी है, उसमें कहा गया है कि उन्होंने बतौर आर्बिट्रेटर जो फैसले दिए, उसके खिलाफ बाद में जिला जज या फिर हाई कोर्ट में अपील हो गई, जो कि सामान्य प्रक्रिया है। इसके चलते एक पैसे का भुगतान किसी को भी मुआवजे के तौर पर हुआ ही नही। फिर कैसे उन्होंने अरबों का घोटाला कर डाला। बतौर आर्बिट्रेटर उन्होंने जो फैसले दिए, वे न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है। उसकी जांच एसआईटी कैसे कर रही? क्या अदालती फैसलों की जाँच का पुलिस कर सकती है? आईएएस एसोसिएशन के एक पदाधिकारी का ये सवाल है। एक सवाल अहम है कि जब आरोपों के दायरे में आए दोनों आर्बिट्रेटर ने कोई भुगतान नहीं कराया तो फिर सरकार को किसान जो पैसा वापिस कर रहे हैं, वह कौन से हैं? किसके वक्त का वह पैसा है। जो उनको मुआवजे के तौर पर मिले। इस बारे में पूछे जाने पर दोनों आरोपी आईएएस अफसरों में से एक ने कहा कि एसएलएओ ने बहुत बड़ा भुगतान खुद ही कर दिया था। उसके खिलाफ न किसान न एनएचएआई आर्बिट्रेशन में आया। इस मामले में हैरानी की बात ये है कि चंद्रेश ही वह कलेक्टर थे, जिन्होंने एक मार्च 2017 को उस वक्त के कुमायूं के आयुक्त और बाद में जांच अधिकारी रहे सेंथिल पांडियन को रिपोर्ट दी थी कि एनएच-74 मुआवजा मामले में बहुत बड़े घोटाले की गंध आ रही है। कृषि भूमि को अकृषि में दिखा कर बड़ा भारी खेल हुआ है। इस तरह की आशंका जताई थी उन्होंने इस रिपोर्ट की प्रति वीक एंड टाइम्स के पास है। ऐसे में ये सवाल उठाना लाजिमी है कि क्या वाकई चंद्रेश की भूमिका इस घोटाले में है या बहुत अहम है? उनके कुछ तर्क, जो सफाई में सरकार को दिए हैं, के मुताबिक उन्होंने जो फैसले बतौर आर्बिट्रेटर किए भी थे, वे सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग के मद्दे नजर थे। जिसमें मार्केट वैल्यू के मुताबिक मुआवजा दिलाना था। सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि मुआवजा डीएम की तरफ से तय सर्किल रेट के मुताबिक नहीं बल्कि मार्केट वैल्यू के मुताबिक दिया जाएगा। एक आला नौकरशाह के अनुसार जिस अफसर ने खुद सरकार से शिकायत की हो और पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराने की बात की हो, वह खुद घोटाले में शामिल होगा, लगता नहीं। एसआईटी जांच पर इसलिए भी अंगुली उठने लगी है कि कुछ आरोपियों को उसने अब क्लीन चिट दे दी है। ये कहते हुए कि उनकी भूमिका घोटाले में नहीं थी। कई महीने वे जेल में गुजार चुके हैं। जमाने भर का दाग माथे पर लगा चुके हैं। अब उनको बेदाग बताया जाना एसआईटी के पहलू में आई नाकामी मानी जाएगी। ऐसा लग रहा है कि एसआईटी के पास विशेषज्ञता न होना या फिर कुछ दबाव इसकी वजह हो सकती है। एसआईटी जांच पर मौजूदा आर्बिट्रेटर और पूर्व आईएएस अफसर आरसी पाठक ने भी अंगुली उठा दी है कि क्या उसको न्यायिक प्रक्रिया को रोकने का है है? उन्होंने सरकार को चि_ी लिख के पूछा है कि क्या सरकार ने एसआईटी को आर्बिट्रेटर कोर्ट की फाइल उठा कर ले जाने का अधिकार भी दे दिया है। पाठक को लिखने-पढऩे वाले नौकरशाहों में शुमार किया जाता था। इस बीच कांग्रेस ये सवाल उठा रही है कि इस मामले में अभी तक किसी भी राजनीतिज्ञ से पूछताछ क्यों नहीं हो रही है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के अनुसार जांच सीबीआई से हो और कोई भी जिम्मेदार शख्स, चाहे वह नौकरशाह हो या फिर राजनीतिज्ञ बचना नहीं चाहिए। अब ये जांच आगे क्या मोड़ लेती है, देखना दिलचस्प रहेगा।

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