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त्रिवेंद्र के लिए अब कठिन वक्त

जितना मैं उनको जानता हूँ या फिर मिल के अंदाज हुआ, उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर बहुत ज्यादा चिंता नहीं है। ठीक है कि सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट भी नहीं है, भले बोलने वाले बोलते रहते हैं, लेकिन अब उनके लिए कुछ मामले परेशानी पैदा कर सकते हैं। इनमें एनएच-74 घोटाले की जांच एसआईटी से कराने और उसमें कलेक्टरों (आईएएस) को भी दायरे में ले लिए जाने के कारण नौकरशाहों में असंतोष, हाई कोर्ट के फरमान पर देहरादून में अवैध कब्जों और अतिक्रमण पर सरकार के कडक़ रुख के चलते कारोबारियों और लोगों में उपजा असंतोष शामिल है। आईएएस अफसरों में जांच को ले कर इतनी नाराजगी है कि उनकी एसोसिएशन की बैठक इस बारे में हुई और खुद मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश तक सरकार की कार्रवाई से नाखुश हैं।

चेतन गुरुंग

त्रिवेंद्र सिंह रावत जब मुख्यमंत्री बने थे तो बहुत उम्मीदें बांधी गई थीं। माना जा रहा था कि उनके लिए सरकार चलाना बहुत आसान रहेगा। अंतरिम सरकार के मुखिया नित्यानंद स्वामी और भगत सिंह कोश्यारी या फिर बीसी खंडूड़ी तथा डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक की तरह चुनौतियां उनको नहीं झेलनी पडेंगी। रावत को भरी-पूरी बहुमत वाली सरकार मिली है। ऊपर अमित शाह हैं। जिनके पास तक पहुंचना विरोधियों के लिए तो आसान नहीं। दूसरी तरफ शाह कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी पसंद के मुख्यमंत्री के खिलाफ कोई उनके सामने मुंह खोलने की जुर्रत भी करे। ये त्रिवेंद्र के हक में जानी वाली बात है। सियासी तौर पर देखा जाए तो त्रिवेंद्र मौज में सरकार चला रहे हैं। मुझे उनके करीबी और कुछ खास स्टाफ के लोग हम बात बता रहे थे। त्रिवेंद्र जब किसी कद्दावर कहे जाने वाले मंत्री या पार्टी के कथित बड़े नेता से भी मिल रहे होते हैं तो पूरी तरह प्रभुत्व के अंदाज में दिखते हैं। बात करते हैं। ये बड़ी और अहम बात है। मैंने बीजेपी राज के कुछ मुख्यमंत्रियों को देखा है, जो मंत्रियों और संगठन के लोगों के आगे कई बार दबाव में दिखते थे। इतना कि संगठन में अहम कुर्सी पर बैठे लोग और कुछ मंत्री तो उनसे इच्छित आदेश करा लेते थे। इसके चलते वे बाहरी दुनिया में ये सन्देश प्रसारित करने में सफल रहे कि वे बाहुबली मंत्री हैं। मुख्यमंत्री भी उनके आगे कुछ नहीं हैं। हकीकत ये है कि जब खंडूड़ी मुख्यमंत्री थे तो यही त्रिवेंद्र उनसे कभी नहीं दबे। वे कैबिनेट की बैठक में खुल के बोलते थे।
त्रिवेंद्र के अलावा जो भी मुख्यमंत्री रहे, उनके पास कभी विशुद्ध बहुमत नहीं रहा। ऐसे में उनको हमेशा दबाव में काम करना पड़ा। उनको हमेशा आशंका रहती थी। कहीं कोई नाराज हो के उनसे छिटक के दूसरे धड़े में न चला जाए। हाई कमान भी खेल करता रहता था। अगर दिल्ली की गतिविधियों पर करीबी नजर न रखें तो सत्ता कब छिन जाए पता ही न चले। ऐसे हालात में खंडूरी और निशंक को तो बहुत ही संभल कर और सतर्कता के साथ मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी निभानी पड़ी थी।
एक मिसाल दूं। निशंक को जिस दिन हटाने के लिए दिल्ली में बैठक हुई, उस दिन उनको भनक तक नहीं लगी थी। वह तो उस दिन टिहरी दौरे पर थे। सुबह मेरी उनसे मुलाकात हुई थी। उस दिन रविवार था। मैंने नाश्ते की मेज पर काफी घंटे बिशन सिंह चुफाल के साथ गुजारे थे। निशंक से मिलने के बाद मैं उनके पास उनके सरकारी आवास पर चला गया था, जो यमुना कॉलोनी में था। चुफाल प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष थे। मैं तब हैरत में पड़ गया जब मुझे दिल्ली से पत्रकार मित्र हृदयेश का फोन आया। हृदयेश ने छूटते ही कहा-सर मुख्यमंत्री गया। मुझे लगा निशंक के टिहरी जाने की बात कर रहे हैं। मैंने कहा हां गए। हृदयेश ने कहा-अरे सर मैं मुख्यमंत्री बदलने की बात कर रहा हूं। मैंने चौंक के पूछा कैसे हुआ? किसने बताया। फिर सारी कहानी पता चली। दिल्ली में आपातकालीन बैठक हुई थी। उसमें आडवाणी, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी के साथ ही चुनींदा बड़े लोग ही मौजूद थे। खंडूरी के नाम पर सहमति बनी। मुझे यकीन इसलिए नहीं हो रहा था कि विधानसभा चुनाव (2012) को छह महीने ही रह गए थे। खंडूरी को हटा के ही निशंक को लाया गया था। फिर इतना बड़ा राजनीतिक कदम उठाया जा रहा हो। निशंक-चुफाल को ही पता न हो। ताज्जुब होना लाजिमी था। मैंने निशंक को फोन किया और पूछा कि क्या ऐसा कुछ है कि उनको हटाया जा रहा है। खंडूरी को लाया जा रहा है। निशंक ने कहा-बिल्कुल नहीं। ऐसा कुछ नहीं हो रहा। चुफाल ने कहा-भाई साहब ऐसा होता तो कम से कम मुझे तो कुछ अहसास कराया जाता। खैर निशंक अगले दिन हटा दिए गए। फिर खंडूरी को जरूरी है बोल के मुख्यमंत्री बना के मुख्य धारा में लाया गया। इतिहास बताता है कि खंडूरी कतई जरूरी नहीं थे। ऐसा होता तो वह कोटद्वार की जंग न हारते। वह न हारते तो बीजेपी पांच साल के लिए सत्ता से बाहर न होती।
त्रिवेंद्र के जेहन में ये सब मिसालें होंगीं। जितना मैं उनको जानता हूँ या फिर मिल के अंदाज हुआ, उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर बहुत ज्यादा चिंता नहीं है। ठीक है कि सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट भी नहीं है, भले बोलने वाले बोलते रहते हैं लेकिन अब उनके लिए कुछ मामले परेशानी पैदा कर सकते हैं। इनमें एनएच-74 घोटाले की जांच एसआईटी से कराने और उसमें कलेक्टरों (आईएएस) को भी दायरे में ले लिए जाने के कारण नौकरशाहों में असंतोष, हाई कोर्ट के फरमान पर देहरादून में अवैध कब्जों और अतिक्रमण पर सरकार के कडक़ रुख के चलते कारोबारियों और लोगों में उपजा असंतोष शामिल है। आईएएस अफसरों में जांच को ले कर इतनी नाराजगी है कि उनकी एसोसिएशन की बैठक इस बारे में हुई और खुद मुख्यमंत्री के अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश तक सरकार की कार्रवाई से नाखुश हैं। ओमप्रकाश को मुख्यमंत्री के करीबियों और विश्वासपात्रों में शुमार किया जाता है। इससे ज्यादा संकट सरकार के लिए अवैध कब्जों और अतिक्रमण के खिलाफ ध्वस्तीकरण की कार्रवाई साबित हो सकती है। ये कितना बड़ा मुद्दा है, इसको ऐसे समझे। दून उद्योग व्यापार मंडल और प्रांतीय व्यापार मंडल में न सिर्फ ज्यादातर लोग बीजेपी से जुड़े हुए हैं बल्कि उनके आकाओं में शुमार होने वाले अनिल गोयल और उमेश अग्रवाल तो बीजेपी के प्रमुख नेताओं में से हैं.वे भी देहरादून में चल रहे अतिक्रमण और अवैध कब्जों के खिलाफ सरकार के अभियान का मुखर विरोध कर रहे हैं। सरकार के खिलाफ आन्दोलन करने जा रहे हैं। आम लोग भी सरकार से इसलिए नाखुश है कि उनके मकान और दुकान ध्वस्त किये गए। भले उन्होंने दशकों से अवैध कब्जा जमाया हुआ था। जाहिर है कि सरकार को इससे भले वाहवाही मिली लेकिन बीजेपी को उस लोक सभा चुनाव में इससे नुक्सान पहुँच सकता है। जो अब सात महीने दूर है।
स्थानीय निकाय चुनाव में भी हालात ऐसे ही रहने की उम्मीद है। ध्वस्तिकरण के मामले में तो त्रिवेंद्र कुछ नहीं कर सकते हैं लेकिन एनएच-74 घोटाले में भी उन पर अंगुली उठ रही है कि अभी तक क्यों एक भी सियासी व्यक्ति पूछताछ के दायरे में नहीं आया। आखिर सीबीआई जांच कराने से केन्द्रीय मंत्री और बीजेपी के बड़े नेता नितिन गडकरी को क्या दिक्कत हो सकती है। उन्होंने जांच तक कराने से इनकार किया है। इसके साथ ही त्रिवेंद्र के लिए शिक्षकों की नाराजगी भी चुनावों में भारी पड़ सकती है। जो लगातार आन्दोलन में हैं। रोजाना सरकार को गरियाते रहते है। इतना काफी नहीं है शायद पहाड़ों में भारी बारिश से बहुत कुछ तबाह हो चुका है। सरकार के लिए वहां राहत कार्य करना आसान साबित नहीं हो रहा है। इसके चलते लोगों में सिस्टम और सरकार को ले कर नाराजगी तेजी से बढ़ी है। ऐसा न हो कि लोकसभा चुनाव में ये बीजेपी के खिलाफ वोटिंग के तौर पर झलके। ये देखना अहम रहेगा कि त्रिवेंद्र इस कठिन चुनौती से किस तरह और कितनी जल्दी बाहर निकल आते हैं।

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