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नाम में ही सब रखा है

  • मुगलसराय का नाम दीनदयाल रखने पर सियासत गर्म
  • विपक्ष का दावा मुद्दों से भटका रही भाजपा
  • भाजपा ने कहा-महापुरूषों के नाम से मिलेगी प्रेरणा

Sanjay Sharma @WeekandTimes
शेक्सपियर ने कहा था नाम में क्या रखा है। गुलाब को चाहे जिस नाम से पुकारो गुलाब ही रहेगा। लेकिन नाम में बहुत कुछ रखा है, ऐसा न होता तो राजनीतिक दल नाम की सियासत न करते। जिलों, कस्बों, प्रतिष्ठानों के नाम बदलने का खेल नया नहीं है। इसमें कांग्रेस, बसपा, सपा और भाजपा सब शामिल हैं। पर ऐसा लगता है राजनीति में सबकुछ नाम में ही समाहित है। जैसे-जैसे 2019 करीब आ रहा है राजनीतिक पार्टियां मुद्दे बनाकर उनको हवा देने में जुट गई हैं। हाल ही में यूपी के मुगलसराय स्टेशन व नगर का नाम पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर रखने पर विपक्षी दलों के निशाने पर आ गई है भाजपा। हालांकि भाजपा ही अकेली पार्टी नहीं है जो नाम बदलने या किसी सरकारी संस्थान का नाम अपनी पार्टी से जुड़े महापुरूषों के नाम रखने का क्रम कर रही है। इससे पहले कांग्रेस, सपा, बसपा या अन्य दलों की सरकारों ने भी इस तरह के उपक्रम किए हैं। मुद्दा ये नहीं है किसके नाम पर क्या नाम रखा जा रहा है मुद्दा ये है चार साल की मोदी सरकार ने ये समय क्यों चुना! सवाल तो उठेंगे ही क्योंकि चुनाव आने वाले हैं।


…हालांकि भाजपा ही अकेली पार्टी नहीं है जो नाम बदलने या किसी सरकारी संस्थान का नाम अपनी पार्टी से जुड़े महापुरूषों के नाम रखने का क्रम कर रही है। इससे पहले कांग्रेस, सपा, बसपा या अन्य दलों की सरकारों ने भी इस तरह के उपक्रम किए हैं। मुद्दा ये नहीं है किसके नाम पर क्या नाम रखा जा रहा है मुद्दा ये है चार साल की मोदी सरकार ने ये समय क्यों चुना! सवाल तो उठेंगे ही क्योंकि चुनाव आने वाले हैं।
विपक्ष कह रहा है कि अपनी नाकामी को छुपाने के लिए भाजपा सरकारें स्टेशनों, हवाई अड्डïों, सरकारी संस्थानों व शहरों का नाम बदल रही है ताकि जनता के ध्यान को असली मुद्दों से भटका दिया जाए। जबकि भाजपा की कह रही जिस भी महापुरूष ने समाज के लिए कुछ अच्छा किया है उसके नाम पर किसी भी चीज का नामांतरण करना उचित है। भाजपा के निशाने पर सबसे ज्यादा कांग्रेस ही रहती है। भाजपा कहती रहती है कि कांग्रेस ने तो अपने ही दल के बड़े नेताओं का दरकिनार कर पूरे देश में सिफ गंाधी परिवार के नाम पर ही सब संस्थानों का नाम रखा ऐसा लगता है इन लोगों के अलावा देश के निमार्ण में किसी का योगदान ही नहीं था। अगस्त 2017 में केंद्र ने उत्तर प्रदेश सरकार की सिफारिश पर मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर भारतीय जनसंघ के नेता रहे दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर करने की अपनी संस्तुति दे दी थी। योगी सरकार ने उपाध्याय की विरासत को पुनर्जीवित करने की कोशिश के तहत यह प्रस्ताव दिया था। तर्क यही दिया गया था कि उपाध्याय की मुत्यु 1968 में इसी जंक्शन पर हुई थी। हालांकि, इस बदलाव के पीछे सरकार की सियासी वजहें भी हैं। मुगलसराय पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म स्थान भी है। अब कुंभ से पहले इलाहाबाद का नाम भी प्रयागराज करने की चर्चा है।
विशलेषकों के अनुसार राजनीतिक दलों को नाम बदलने का फायदा मिलता रहा है। जब तक कांग्रेस का शासन था तब तक गांधी, नेहरू के नाम पर फायदा लिया गया। बसपा ने अपने आदर्श पुरुषों के नाम आगे बढ़ाए। बीजेपी भी यही कर रही है। नाम रखने से एक खास वर्ग का झुकाव उस पार्टी और सरकार की ओर होता है। बांबे से मुंबई, कलकत्ता से आम जन ने कोलकाता, गुडग़ांव से गुरुग्राम, मद्र्रास का से चेन्नई और बैंगलोर से बंगलुरु होते देखा है। हाल ही में हरियाणा सरकार ने यमुनानगर जिले के मुस्तफाबाद का नाम बदलकर सरस्वती नगर रख दिया है। तर्क दिया गया यहां से सरस्वती नदी बहती थी। इससे पहले साइबर सिटी गुडग़ांव का नाम बदलकर गुरुग्राम कर दिया गया था। दावा किया गया कि यह द्रोणाचार्य का शहर है, इसलिए गुरुग्राम नाम ज्यादा अच्छा होगा। इसके खिलाफ उद्योग जगत में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। इस बदलाव के बाद दलित समाज, खासतौर पर बहुजन
समाज पार्टी के नेताओं ने सरकार से मांग की थी कि यहां एक स्टेशन का नाम एकलव्य के नाम पर रखा जाए, लेकिन उनकी वह मांग पूरी नहीं की गई। सितंबर 2016 में दिल्ली नगर पालिका परिषद (एनडीएमसी) ने ‘7-रेस कोर्स रोड’ का नाम बदलकर ‘लोक कल्याण मार्ग’ कर दिया था। इसी मार्ग पर प्रधानमंत्री का निवास है।
नाम के नाम पर सियासत करने में बहुजन समाज पार्टी काफी आक्रामक रही है। मायावती ने लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी का नाम बदलकर अपनी पार्टी के आदर्श पुरुष छत्रपति शाहूजी महाराज के नाम पर रख दिया था। इसका नाम बदले जाने पर देश-विदेश में आलोचना हुई। अखिलेश यादव ने 2012 में फिर से इसका पुराना नाम बहाल कर दिया। मायावती ने अपने शासनकाल में कई जिलों के नाम दलित उत्थान का काम करने वाले उन लोगों के नाम पर रखे जिन्हें बसपा के पोस्टरों में जगह मिलती है। लेकिन अखिलेश यादव ने फिर से पुराने नाम कर दिए। वर्ष 2012 में अखिलेश ने महामाया नगर का नाम हाथरस, कांशीराम नगर का नाम कासगंज, रमाबाई नगर का नाम कानपुर देहात और प्रबुद्ध नगर का नाम शामली कर दिया। इसी प्रकार छत्रपति शाहूजी महाराज नगर का नाम बदलकर अमेठी किया, जो उसका पुराना नाम था। इसी क्रम में पंचशील नगर का नाम बदलकर हापुड़ और ज्योतिबा फूले नगर का नाम अमरोहा किया गया। कांग्रेस पार्टी जितनी पुरानी पार्टी है उसकी नामकरण करने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है। कांग्रेस शासनकाल में लगभग हर स्थान-भवन का नाम नेहरू-गांधी परिवार पर रखा गया। यहां तक कि विश्व प्रसिद्ध कनॉट प्लेस का नाम बदल कर 12 जनवरी, 1996 को राजीव चौक कर दिया गया। वो अलग बात हैं कि एरिया का नाम तो बदल दिया गया, लेकिन आज तक लोग इसे कनॉट प्लेस ही बोलते आ रहे हैं। ऐसा नहीं नाम राजनीतिक वजहों से ही बदले जाते हैं। हालांकि कुछ नामों क ो जनता की मांग पर बदलना ठीक भी रहा। जैसे हरियाणा सरकार ने लोगों की मांग पर ऐसे गांवों के नाम बदलकर अच्छा किया है, जिन्हें बताने में लोगों को शर्म महसूस होती थी। फरीदाबाद के गंदा गांव को अजीत नगर बना दिया गया है। हिसार के चमारखेड़ा को सुंदरखेड़ा नाम दिया गया है। यूपी में भी नाम बदलने की परंपरा पुरानी हैै। काशी को 1956 में बनारस को बदलकर वाराणसी कर दिया गया। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर का नाम मराठा शासनकाल के दौरान इंधूर रखा गया था लेकिन ब्रिटिश शासन काल में इसे बदलकर इंदौर कर दिया गया। गोवा की राजधानी पणजी का नाम पहले पंजिम हुआ करता था। इस शहर से पुर्तगालियों का राज खत्म होने के बाद नाम बदल दिया गया। वर्ष 2001 में पश्चिम बंगाल की राजधानी कलकत्ता का नाम बदलकर कोलकाता किया गया था। कोच्चि केरल के एर्नाकुलम जिले एक शहर है। वर्ष 1996 में इसका नाम बदला गया था। साल 1991 में केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम का नाम बदलकर तिरुवनंतपुरम कर दिया गया था। तिरु-अनंत-पुरम मलयाली भाषा के शब्द हैं जिसका मतलब होता है भगवान अनंत का शहर। मुंबई से करीब 150 किलोमीटर दूर महाराष्टï्र के शहर पुणे को पहले पूना कहा जाता था लेकिन 1977 में इसके नाम बदला गया। कुछ लोगों का कहना है कि इसका नाम पुण्य गिरी के नाम पर पड़ा है। अगस्त 1996 में मद्रास का नाम बदल कर चेन्नई कर दिया गया था। तमिलनाडु सरकार ने तमिल भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए शहर का नाम बदला गुजरात के बड़ौदा का नाम साल 1974 में बदल कर बड़ोदरा किया गया।

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