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पीएम साहब! सच को समझिए भ्रष्टाचार अब भी जारी…

आम आदमी पर अफसरों का होता है दबाव…

Sanjay Sharma @WeekandTimes

रोज अखबारों में छपता रहता है कि फलां प्रदेश के फलां जिले में घूसखोर अफसर रंगे हाथों पकड़ा गया, इस तथ्य के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में आयोजित एक आम सभा में दावा किया कि अब दिल्ली से सरकारी योजनाओं के जरिए भेजा गया एक रुपया पूरा का पूरा आम लोगों तक पहुंचता है। पीएम के इस बयान के बाद क्या यह मान लिया जाए कि केंद्र सरकार की सरकारी योजनाएं और उनसे संबंधित विभाग पूरी तरह भ्रष्टाचार से मुक्तहो गए हैं। प्रधानमंत्री लोगों से इस बात की हामी भी भरवाते हैं कि सरकारी योजनाओं के लाभान्वितों को फायदा लेने के लिए रिश्वत नहीं देनी पड़ी। फिर ये जो खबरें छप रही हैं ये क्या हैं? ऐसा लगता है कि पीएम या तो यह सब जानते नहीं है या जानना नहीं चाहते। दावा चाहे जो किया जाए पर पूरे देश में सरकारी योजनाओं में भ्रष्टïाचार बदस्तूर जारी है। योजनाएं ही नहीं ठेकों से लेकर हर छोट-बड़े काम में ऊपर से लेकर नीचे तक पैसों की बंदरबांट हो रही है। पीएम के सामने जो लोग यह कहते हैं कि उन्हें सारी योजनाओं का लाभ बिना कोई घूस दिए मिले हैं, वे वही लोग हैं जिन्हें अफसर सिखा-पढ़ाकर तैयार करते हैं कि उन्हें क्या कहना है।


…पीएम साहब को समझना चाहिए अफसरों और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी में गरीब ग्रामीण जनता की इतनी कुव्वत है कि वह कह सके कि उन्हें रिश्वत देनी पड़ी या धक्के खाने के बाद ही फायदा मिल सका। लाभान्वित को उसी क्षेत्र में रहना है। इसलिए वह अफसर से दुश्मनी तो मोल नहीं लेगा। यह मान भी लिया जाए कि सरकारी योजनाओं का फायदा लेने वाले लोगों ने वाकई में रिश्वत नहीं दी तो इसके मायने यही हुए कि केंद्र और राज्यों के सरकारी विभाग भ्रष्टाचार से मुक्त हो गए हैं। भ्रष्टाचार देश की जड़ों को खोखला कर रहा है। रिपोर्टों में बेरोजगारी के बाद भ्रष्टाचार को दूसरे नंबर पर बताया गया है। केंद्र और राज्यों के सत्ताधारी नेता ऐसी रिपोर्टों को नकार देते हैं।
सत्तारूढ़ दल चाहे जो दावे करे पर नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे भगौड़ों की हकीकत पर पर्दा नहीं डाल सकता। सरकारी बैंक प्रबंधन की मिलीभगत से हजारों करोड़ डूबने पर जीरो भ्रष्टाचार का दावा उल्टा पड़ता नजर आता है। पनामा पेपर लीक दूसरा बड़ा उदाहरण है। पड़ोसी देश पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का नाम इसमें आने पर उन्हें जेल जाना पड़ा। इसके विपरीत पनामा सूची में शामिल एक भी भारतीय का बाल तक बांका नहीं हुआ। कारण साफ है कि पनामा पेपर कांड में शामिल प्रभावशालियों का संबंध बॉलीवुड और उद्योग जगत से है। सीबीआई हो या प्रवर्तन निदेशालय, किसी भी एजेंसी में इतना दम नहीं कि सरकार के इशारे के बगैर किसी बड़ी कार्रवाई का निर्णय अपने स्तर पर कर सके। ये बड़े-बड़े आर्थिक अपराधी देश से रफ्फूचक्कर हो गए। हमारी जांच एजेंसियां हाथ मलती रह गईं । अब जब वह उन्हें देश लाने के लिए जतन कर रहे तब बहुत देर हो चुकी है। सबसे बड़ी बात यह है कि देश के सत्तारुढ़ दल के मुखिया इस पर मौन ही रहते हैं।
सरकार के इरादे भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कितने दृढ़ हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय लोकपाल बिल अभी तक विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर कई बार लताड़ लगा चुका है। केंद्र की ओर से दलील दी गई कि संसद में संख्या बल के आधार पर कोई प्रतिपक्ष का नेता ही नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। इससे पता चलता है कि केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार से लडऩे के इरादे कितने दमदार हैं। इसी तरह ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2017 कि रिपोर्ट के मुताबिक भारत विश्व के सर्वाधिक भ्रष्ट देशों में शुमार है। विश्व के 180 देशों में भारत का भ्रष्टाचार में 81वां स्थान है। इस रिपोर्ट को भी केंद्र और राज्यों के सत्तारूढ़ दलों ने खारिज कर दिया। भ्रष्टाचार के विरूद्ध हुंकार भरने वाली केंद्र सरकार फ्रांस से राफेल विमान के अनुबंध पर जांच तक कराने को तैयार नहीं है। जब तक भ्रष्टाचार के मामले पर पर्दा डाला जाता रहेगा तब तक सत्ता में कोई भी दल हो, सबकी नीयत पर संदेह की उंगलियां उठती रहेंगी। प्रधानमंत्री के केवल सिखाए हुए लोगों से हां भरवाने भर से देश भ्रष्टाचार मुक्त हो गया है, ऐसा नहीं है। इस कैंसर को अगर मिटाना है तो राजनीतिक पूर्वाग्रह से मुक्ति, ईमानदारी और पारदर्शिता लानी होगी।

सरकार के इरादे भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कितने दृढ़ हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय लोकपाल बिल अभी तक विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर कई बार लताड़ लगा चुका है। केंद्र की ओर से दलील दी गई कि संसद में संख्या बल के आधार पर कोई प्रतिपक्ष का नेता ही नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।

 

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