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निजाम बदला पर जलवा कायम

  • W.T.I.T. सोल्युशन पर मेहरबानी की बारिश
  • सरकारी महकमों में ठेका देने की होड़
  • पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के खासमखास जैन के बेटे की है कम्पनी
  • करोड़ों का धंधा मिलता रहा है

चेतन गुरुंग @ Weekandtimes

देहरादून। पिछली कांग्रेस सरकार में मुयमंत्री के तौर पर हरीश रावत नाकाम साबित हुए। लोगों के साथ ह्रश्वयार से मिलना, नामों से पुकारने का भी लाभ उनको नहीं मिला। लोग हैरान इसलिए ज्यादा हुए, जिनमें समीक्षक ज्यादा थे कि रावत दो सीटों से लडऩे के बावजूद विधानसभा नहीं पहुंच पाए। उनका कद कांग्रेस में या है, ये इससे समझा जा सकता है कि आज भी कांग्रेस में उनकी अहमियत जरा भी कम नहीं हुई है। वह राष्टï्रीय महासचिव बनाए गए हैं। एक सवाल ये उठता रहा है कि फिर आखिर रावत कहां चूक गए? सबकी इस मामले में एक राय है। रावत अपने निजी सिपहसालार सही नहीं चुन पाए। हकीकत ये है कि ये उनके सेनापति ही थे, जिन्होंने हरीश की रात-दिन की मेहनत पर पानी फेर दिया। रंजीत रावत और राजीव जैन इनमें प्रमुख नाम कहे जा सकते हैं। लगता है कि मौजूदा जीरो टालरेंस वाली बीजेपी की त्रिवेंद्र सरकार ने पिछली हरीश सरकार से कोई सबक नहीं लिया है। पिछली सरकार में सोशल मीडिया के नाम पर जमकर सरकारी महकमों से ठेके लेने और मोटा भुगतान वसूलने में डल्यूटीआईटी सोल्यूशंस कपनी ने सबको कहीं पीछे छोड़ दिया था। ऐसा सोचा जा रहा था कि सरकार बदल जाने और बीजेपी की आने के बाद इस कपनी को झटके लगेंगे। ये महज खुशफहमी साबित हुई। आज भी ये कपनी न सिर्फ जम कर ठेके हासिल कर रही बल्कि मुंह-मांगी कीमत सरकार से वसूल कर रही। अब ये जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर इस कपनी में ऐसी या खास बात है। किसके कारण ये कपनी ऐसे रेसकोर्स के घोड़े की तरह दौड़ रही है।

…..पड़ताल से पता चला कि इस कम्पनी के निदेशकों में अक्षय जैन भी शामिल हैं। ये उन्हीं राजीव जैन के सुपुत्र हैं, जो हरीश रावत सरकार के अवसान के जिम्मेदारों में शुमार किए जाते हैं। वह निदेशक है। अक्षय के साथ ही अंकित शर्मा, आकाश शर्मा तथा ओम प्रकाश शर्मा भी कम्पनी के निदेशकों में शुमार हैं। ये कोई छिपी हुई बात नहीं कि पिछली सरकार में इस कम्पनी ने राज किया। सरकार में पक ड़ के चलते, उस वक्त बने रिश्तों को अब अपने हिसाब से कम्पनी इस सरकार में भुना रही है। आलम ये है कि इस सरकार में भी हर महकमे में होड़ सी है। इस कम्पनी को सोशल मीडिया की कमान सौंपने की। सूचना महकमा ज्यादा ही आगे दिखाई दे रहा है। कम्पनी को जिन महकमों ने सोशल मीडिया का काम सौंपा उनमें सूचना, एमडीडीए, पुलिस, पर्यटन, सिडकुल खास है।
इन सबने मिल के करोड़ों का काम दिया और भुगतान किये। कम्पनी फेसबुक, यू ट्यूब, ट्विटर अकाउंट बनाने और संचालित करने के साथ ही वेब साईट पर विज्ञापन देने, वेब साईट वीडियो ऐड बनाने का काम करती है। इस काम के लिए उसने मनमानी कीमत वसूली। ज्यादातर बड़े ठेके कांग्रेस राज में दिए गए। इस काम को तरीके से अंजाम दिया गया। सूत्रों के मुताबिक हर महकमे में कुछ अफसरों की भूमिका कम्पनी को मुनाफा पहुंचाने या फिर उसके हक में संदिग्ध रही है। इसके चलते कई जगह वह अकेली कंपनी है, जो सूचीबद्ध है। काम करने के लिए इस तरह उसका एक छत्र राज बना हुआ है। वह फेसबुक पेज प्रमोशन का काम भी करती है और बूस्टिंग भी करती है। लाइक्स और बूस्टिंग के लिए कीमत तय है। वीक एंड टाइम्स के पास दस्तावेज उपलब्ध हैं। महकमों की तरफ से कम्पनी के साथ जो करार हुए हैं, वह बेहद साधारण किस्म के हैं। मसलन जरूरत पड़ी तो कम वक्त में भी विज्ञापन बना के देने होंगे,100 रूपये के स्टाम्प पेपर पर अनुबंध किया जाएगा। सरकार की तरफ से प्रतिबंधित साइट्स पर विज्ञापन नहीं दिए जाएंगे।
आईटी एक्ट से सम्बंधित कानून का पालन करना होगा। भुगतान बजट की उपलब्धता पर होगा। अब भला ऐसी शर्तों को मानने में भला किसी फार्म को क्या ऐतराज होगा। खास तौर पर जब मोटा माल आ रहा हो। करोड़ों में ठेके मिल रहे हों। कोई प्रतिद्वंद्वी न हो। आरोप ये है कि डब्ल्यूटीआईटी को फायदा पहुंचाने वाले मानक बनाए जाते हैं। एक किस्म से डिजायनर नियम, ऐसे नियम, जिसके चलते किसी और कम्पनी को काम ही न मिल सके। ताजा मसला सिडकुल से जुड़ा है। सूत्रों के मुताबिक सरकार की महत्वाकांक्षी इन्वेस्टर्स समिट के लिए सिडकुल की तरफ से सोशल मीडिया में हर तरह का काम देखने का ठेका एक बार फिर जैन की कम्पनी को देने की तैयारी चल रही है। कम्पनी ने अपने प्रस्ताव के साथ फाइल सिडकुल को सौंप दी है। वह इससे पहले एक मोटा काम सिडकुल के लिए कर चुकी है। अब जो नया प्रस्ताव सोशल मीडिया के लिए दिया गया है, उसमें तकरीबन डेढ़ करोड़ रुपये का प्रस्ताव कम्पनी ने सिडकुल को दिया है। सूत्रों के मुताबिक सिडकुल की प्रबंध निदेशक सौजन्या इस मामले में जल्दबाजी नहीं करना चाहती हैं। इसलिए अभी फाइल पर कोई फैसला नहीं हुआ है। पहली नजर में ठेके हासिल करना कोई जुर्म या साजिश नहीं दिखती, लेकिन इसकी खोजबीन तरीके से की जाए तो पता चलता है कि हर ठेके के पीछे एक कहानी है। इसके खुलासे के बाद ये सवाल उठता है कि आखिर आज के प्रतिद्वंद्विता के दौर में कैसे एक ही कम्पनी पर सरकार मेहरबानी इस तरह खुल के कर सकती है।
ताज्जुब इस बात पर है कि कम्पनी पर ऐसे नौकरशाहों ने पैसा लुटाया है, जिनकी निजी प्रतिष्ठा बहुत अच्छी है। क्या उन्होंने स्वेच्छा के साथ डब्ल्यूटीआईटी को समर्थन दिया है, या फिर उन पर कोई दबाव रहा होगा। ये मुमकिन है कि राजीव जैन के मुख्यमंत्री रावत के साथ साए की तरह रहने और भरोसेमंद होने के कारण अफसरों और महकमों ने उनके बेटे की कम्पनी को ठेके सौंपे। अब इसमें कुछ खेल था या नहीं, इसका खुलासा सतर्कता जांच या फिर एसआईटी जांच में हो सकता है। वैसे सरकार को इस तरह की जांच से इन दिनों कोई ऐतराज नहीं है। अब जब इस मामले में वीक एंड टाइम्स पड़ताल कर रहा है तो सरकार के महकमों में खलबली शुरू हो गई है। हैरानी की बात ये है कि ये कम्पनी मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों का भी सोशल मीडिया का काम देख रही है। ऐसे में देखने वाली बात होगी कि सरकार इस कम्पनी पर कोई कार्रवाई करती भी है या नहीं।

 

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