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नौकरशाही बनाम सियासत

ज्यादातर मंत्रियों का अपने महकमों के बारे में कम ज्ञान होना और मेहनत से जी चुराना राज्य को भारी पड़ रहा है। जब राज्य बना तो मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी बनाए गए। स्वामी के पास प्रशासनिक अनुभव का नितांत अभाव था। वह सियासत में थे, लेकिन कभी मंत्री नहीं रहे थे। वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद में उप सभापति थे। जब उत्तराखंड बना तब तक वह कार्यवाहक सभापति हो चुके थे। वह सीधी सरकार के सीईओ बना दिए गए थे। उनको पार्टी के किसी भी धड़े ने कभी बतौर मुख्यमंत्री स्वीकार ही नहीं किया। भगत सिंह कोश्यारी तब बहुत शक्तिशाली हो चुके थे। डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक भी खुद को मुख्यमंत्री के तौर पर मजबूत दावेदार मानने लगे थे। नया और छोटा राज्य था। सबकी उम्मीदें और महत्वाकांक्षाएं उबाल पर थीं। हर कोई मुख्यमंत्री बनना चाह रहा था। ऐसे में कमजोर नेतृत्व क्षमता वाले स्वामी का सहारा सिर्फ नौकरशाह रह गए थे। यहीं से नौकरशाही के सरकार में हावी रहने का दौर खामोशी संग शुरू हो गया था। नौकरशाह मुख्यमंत्री के खास हो गए तो मंत्री भी उन पर निर्भर रहने लगे। मंत्रियों में अगर निशंक को हटा दें तो ज्यादातर में प्रतिभा कहीं नहीं दिखती थी। कोश्यारी उर्जा मंत्री बनाए गए थे, लेकिन उनके पास सियासी अनुभव ज्यादा था।

चेतन गुरुंग

उत्तराखंड में शुरू से ही ये हल्ला रहा है कि यहां नौकरशाही हावी है। मंत्रियों की तो छोडिय़े मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक अपने आदेशों को मनवा नहीं पाते हैं। उनके घुटने छिल जाते हैं, कोई वाजिब आदेश भी मनवाने में। उत्तराखंड जब से बना ये बहस चलती रही है। ये सच भी है। इस सबके बावजूद मेरा निजी अनुभव है कि नौकरशाही का जलवा इस पर भी निर्भर करता है कि सियासी हालात और मंत्रियों की अपनी काबिलियत कैसी है। बेशक उत्तराखंड में नौकरशाही लगातार हावी रही है। इसकी बहुत बड़ी वजह यहां शुरुआत से ही सरकार का नेतृत्व कमजोर कन्धों को सौंप देना है।
ज्यादातर मंत्रियों का अपने महकमों के बारे में कम ज्ञान होना और मेहनत से जी चुराना राज्य को भारी पड़ रहा है। जब राज्य बना तो मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी बनाए गए। स्वामी के पास प्रशासनिक अनुभव का नितांत अभाव था। वह सियासत में थे, लेकिन कभी मंत्री नहीं रहे थे। वह उत्तर प्रदेश विधान परिषद में उप सभापति थे। जब उत्तराखंड बना तब तक वह कार्यवाहक सभापति हो चुके थे। वह सीधी सरकार के सीईओ बना दिए गए थे। उनको पार्टी के किसी भी धड़े ने कभी बतौर मुख्यमंत्री स्वीकार ही नहीं किया। भगत सिंह कोश्यारी तब बहुत शक्तिशाली हो चुके थे। डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक भी खुद को मुख्यमंत्री के तौर पर मजबूत दावेदार मानने लगे थे।नया और छोटा राज्य था। सबकी उम्मीदें और महत्वाकांक्षाएं उबाल पर थीं। हर कोई मुख्यमंत्री बनना चाह रहा था। ऐसे में कमजोर नेतृत्व क्षमता वाले स्वामी का सहारा सिर्फ नौकरशाह रह गए थे। यहीं से नौकरशाही के सरकार में हावी रहने का दौर खामोशी संग शुरू हो गया था। नौकरशाह मुख्यमंत्री के खास हो गए तो मंत्री भी उन पर निर्भर रहने लगे। मंत्रियों में अगर निशंक को हटा दें तो ज्यादातर में प्रतिभा कहीं नहीं दिखती थी। कोश्यारी ऊर्जा मंत्री बनाए गए थे, लेकिन उनके पास सियासी अनुभव ज्यादा था। सरकारी कम, वह सियासी काबिलियत के बूते स्वामी को हटा के मुख्यमंत्री बन भी गए। जब उत्तराखंड के पहले विधान सभा चुनाव हुए तो बीजेपी अप्रत्याशित और सनसनीखेज रूप से उनकी ही अगुवाई में हार गई। वह दौर था जब शुरुआत में डॉ. रघुनन्दन सिंह टोलिया और राकेश शर्मा की जम कर चली। फिर मुख्य सचिव के तौर पर अजय विक्रम सिंह और मधुकर गुप्ता सरकार के चेहरे बन के उभरे। वे जो चाहते, वही होता था।
अजय विक्रम कुछ ही महीने रहे। फिर वह केंद्र में चले गए। मधुकर गुप्ता और टोलिया एक ही बैच के थे। 1971 के, एक-दूसरे की भरपूर इज्जत करते थे। दोनों में भरपूर तालमेल था। मंत्रियों पर दोनों का कद और प्रतिष्ठा बहुत भारी साबित हुई। सरकार पर नौकरशाही के हावी होने का दौर तभी शुरू हो गया था। जो आगे भी खूब चला। ये बात अलग है कि टोलिया में मंत्रियों से टक्कर लेने का गुण नहीं था। फिर भी ये कहा जा सकता है कि उनके नाम का ही दबाव मंत्रियों पर काफी था। ये कहना पूरी तरह गलत होगा कि हमेशा और हर बार नौकरशाही ही मंत्रियों और सियासी लोगों पर हावी रही। सच ये है कि ये घड़ी के पेंडुलम की तरह रहा है। कुछ मंत्रियों और नेताओं का भी जलवा रहा है। जिनमें क्षमता और काबिलियत थी, उन पर कभी भी नौकरशाह हावी नहीं रह पाए। इंदिरा हृदयेश जब मंत्री थीं तो उनका जलवा एनडी मंत्री परिषद में सबसे ज्यादा रहा। नौकरशाही तो छोडिय़े खुद मंत्री तक उनसे निर्देश और सलाह लिया करते थे। मीडिया तक में उनका खासा दबदबा रहा। वह दौर था जब तकरीबन पूरी मीडिया उनके आगे नतमस्तक रही। सरकार के खिलाफ भले लिख लें लेकिन पीडब्ल्यूडी के बारे में कुछ भी उल्टा लिखना तब पत्रकारों के वश की नहीं रह गई थी। तब बड़े अखबारों के पत्रकारों को मैंने पुल के निर्माण की खबर भी बाई लाइन लिखते देखा था। सिर्फ इंदिरा को खुश करने के मकसद से, ये मंत्रालय वही देख रही थीं। इंदिरा को भी अपनी ताकत को ले कर गलत फहमी हो गई थी। एक बार मैंने एक रिपोर्ट लिखी तो सुबह-सुबह मुझ पर फोन पर उलझ पड़ीं कि रिपोर्ट गलत है। कैसे छाप दीं। विधायक निधि खर्च न कर पाने से जुड़ी खबर थी। उससे पहले ऐसी खबरें कभी छपी नहीं थीं। फिर इंदिरा की क्षमता को चुनौती देने वाली खबर उस दौर में छपना बहुत हैरत अंगेज समझी जाती थीं। मैंने छापी। अगले दिन उनके हवाले से ये भी लिख दिया कि सरकार की जिस रिपोर्ट को मैंने लिखा उसको खुद सबसे शक्तिशाली मंत्री ने गलत ठहरा दिया। सरकार की ही किरकिरी हुई। बाद में सत्र के दौरान विधानसभा में हम दोनों उनके मंत्री वाले एंटी रूम में बैठे और रिपोर्ट के बारे में फिर विस्तार से चर्चा की। मेरे मन में उनको ले कर कोई गिला-शिकवा नहीं था। उन्होंने भी पुराने संबंधों का जिक्र करते हुए आपसी रिश्तों में आई कड़वाहट को खत्म किया।
मैं कहूंगा कि वह आज तक की सबसे शक्तिशाली मंत्री थीं। तब मुख्यमंत्री एनडी से ज्यादा सरकार में उनका सिक्का चला करता था। मुख्य सचिव को तो वह आए दिन तलब करती रहती थीं। बाद में किसी मंत्री के वश का नहीं रहा कि मुख्य सचिव को तलब कर सके । खुद उनके सचिव ही नहीं आते हैं। बुलाए जाने पर, नौकरशाहों ने बाद में एक व्यवस्था और करा ली। दूसरे महकमों के मंत्री अगर बुलाते हैं तो न जाने की सुविधा ले ली। रही-सही कसर भी पूरी हो गई। एनडी राज में ही बाकी मंत्रियों की कद्र नहीं थी। तब होता वही था जो एम रामचंद्रन चाहते थे। जो पहले मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव, फिर अपर मुख्य सचिव और बाद में मुख्य सचिव बने। उनके बाद अगर सर्वाधिकार सम्पन्न नौकरशाह हुए तो वह प्रभात कुमार सारंगी थे। मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी की सरकार चलाने और गिरवाने में सारंगी की अहम भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है। सारंगी के दौर में मुख्य सचिव संस्था निर्जीव और महत्वहीन हो गई थी। राकेश शर्मा भी खूब छाए। इन नामों के अलावा भी कई नौकरशाह अपनी छाप छोडऩे और सरकार में दबदबा कायम रखने में सफल रहे। मौजूदा दौर के आरके सुधांशु, मीनाक्षी सुन्दरम, शैलेश बगौली, दिलीप जावलकर, दरबान सिंह गर्ब्याल, चंद्रशेखर भट्ट,अरविन्द सिंह हयांकी, चंद्रेश यादव, पंकज पाण्डेय, हरबंस चुग पिछली कांग्रेस सरकार में अच्छा असर रखते थे।
त्रिवेंद्र सरकार में बगौली को छोड़ बाकी सेवारत नौकरशाहों की दशा ठीक नहीं है। सब के सब साइड लाइन हैं। ये जरूर है कि गब्र्याल-भट्ट रिटायर हो के बढिय़ा पुनर्वास पा चुके हैं। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के राज में चंद को छोड़ बाकी नौकरशाह हावी नहीं दिखते हैं। बड़ा सच ये भी है कि आज के नौकरशाह काम करते और करने के मूड में दिखते भी नहीं हैं। एनएच-74 घोटाले की एसआईटी जांच और मीनाक्षी सुन्दरम के कार्यकाल के दौरान एमडीडीए के कामकाज का स्पेशल ऑडिट कराने के फैसले के बाद नौकरशाही हाथ रोक के काम करने लगी है। मेरा अनुभव कहता है कि नौकरशाही पर नियंत्रण जरूरी है। वह उस गाड़ी की तरह है,जिसकी रफ्तार ड्राईवर की कुशलता पर निर्भर करता है। अच्छा ड्राईवर हो तो गाड़ी बिना झटके के आराम से दौड़ती है। नहीं तो धक्के खा-खा के एक दिन किसी गड्ढे में फंस के रह जाती है। मुझे लगता है आज कल यही हो रहा है।

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